NASA ने Voyager-1 को 5 सितंबर 1977 को बृहस्पति और शनि का अध्ययन करने के लिए लॉन्च किया था। करीब 49 साल बाद यह इंटरस्टेलर स्पेस में सफर कर रहा है और वैज्ञानिकों को अब भी अंतरिक्ष से जुड़ा डेटा भेज रहा है।
वॉशिंगटन डी.सी.: अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA का अंतरिक्ष यान वॉयजर-1 (Voyager-1) एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने जा रहा है, जो मानव अंतरिक्ष अभियानों के इतिहास में पहली बार होगी।
18 नवंबर 2026 को यह पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी पर पहुंच जाएगा। करीब 49 साल से अंतरिक्ष में सफर कर रहा वॉयजर-1 उस समय पृथ्वी से लगभग 16.09 अरब मील यानी 25.89 अरब किलोमीटर दूर होगा। यह दूरी एक प्रकाश-दिन के बराबर मानी जाती है।
इस उपलब्धि के साथ वॉयजर-1 पृथ्वी से इतनी दूरी तय करने वाला पहला मानव निर्मित अंतरिक्ष यान बन जाएगा। हालांकि, इतनी लंबी यात्रा के बीच यान को तकनीकी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। अक्टूबर में लगातार दो निर्धारित संचार सत्रों के दौरान उसका रेडियो सिग्नल नहीं मिल पाया था।
एक प्रकाश-दिन की दूरी पर पहुंचेगा यान
वॉयजर-1 अब पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी हासिल करने के करीब है। नासा के अनुसार, 18 नवंबर को यह यान पृथ्वी से लगभग 16.09 अरब मील यानी 25.89 अरब किलोमीटर दूर होगा। यह दूरी एक प्रकाश-दिन के बराबर है।
प्रकाश-दिन दूरी मापने की एक इकाई है। प्रकाश एक सेकंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है। इसी गति से 24 घंटे में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है, उसे एक प्रकाश-दिन कहा जाता है। यह लगभग 25.9 अरब किलोमीटर के बराबर है। वहीं, प्रकाश-वर्ष उस दूरी को कहते हैं, जितनी दूरी प्रकाश एक साल में तय करता है।
वॉयजर-1 के इस मुकाम पर पहुंचने का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यह पृथ्वी से एक प्रकाश-दिन की दूरी तय करने वाला पहला मानव निर्मित अंतरिक्ष यान होगा। नासा के मुताबिक, इस समय यान लगभग 38,000 मील प्रति घंटे यानी करीब 61,155 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।
अब संदेश भेजने और जवाब पाने में लगेंगे दो दिन
अभी भी Voyager-1से संपर्क करने में कई घंटे लगते हैं, लेकिन एक प्रकाश-दिन की दूरी पर पहुंचने के बाद यह समय और बढ़ जाएगा। पृथ्वी से भेजा गया रेडियो संदेश यान तक पहुंचने में करीब 24 घंटे लेगा। इसके बाद यान की ओर से भेजा गया जवाब पृथ्वी तक पहुंचने में भी लगभग 24 घंटे लगाएगा। इस तरह किसी निर्देश और उसकी पुष्टि के बीच करीब 48 घंटे का अंतर हो सकता है।
नासा की वॉयजर परियोजना प्रबंधक सुजैन डॉड ने इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि यदि कोई वॉयजर को संदेश भेजना चाहे, तो उसे संदेश भेजने के बाद जवाब के लिए दो दिन इंतजार करना होगा। इतनी दूरी पर यान के साथ तत्काल संवाद संभव नहीं रहेगा। इसलिए मिशन टीम को निर्देश भेजते समय अधिक सावधानी बरतनी होगी और किसी भी तकनीकी समस्या के समाधान के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
क्या है डीप स्पेस नेटवर्क?
वॉयजर-1 जैसे दूर स्थित अंतरिक्ष यानों से संपर्क बनाए रखने के लिए नासा डीप स्पेस नेटवर्क (DSN) का इस्तेमाल करता है। यह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में स्थापित विशाल रेडियो एंटेना का नेटवर्क है। इसके प्रमुख केंद्र अमेरिका के कैलिफोर्निया, स्पेन और ऑस्ट्रेलिया में हैं।
ये एंटेना अंतरिक्ष में भेजे गए यानों से आने वाले रेडियो सिग्नल प्राप्त करते हैं। इनके जरिए वैज्ञानिक यान की स्थिति पर नजर रखते हैं, उससे मिला वैज्ञानिक डेटा हासिल करते हैं और उसे नए निर्देश भी भेजते हैं। अरबों किलोमीटर दूर मौजूद अंतरिक्ष यान से संपर्क बनाए रखने में इस नेटवर्क की अहम भूमिका है।
अक्टूबर में सामने आई थी दिक्कत
ऐतिहासिक दूरी हासिल करने की तैयारी के बीच वॉयजर-1 को अक्टूबर में संचार से जुड़ी एक परेशानी का सामना करना पड़ा। नासा के मुताबिक, 18 और 19 अक्टूबर को यान से संपर्क स्थापित करने के लिए दो निर्धारित प्रयास किए गए थे। इन दोनों प्रयासों के बीच करीब 24 घंटे का अंतर था, लेकिन नासा का डीप स्पेस नेटवर्क यान का रेडियो सिग्नल प्राप्त नहीं कर पाया। उस समय वॉयजर-1 पृथ्वी से लगभग 16 अरब मील यानी करीब 24 अरब किलोमीटर दूर था।
इसके बाद 20 अक्टूबर को यान का सिग्नल दोबारा मिल गया। खास बात यह रही कि मिशन टीम यान को समस्या की जांच के लिए निर्देश भेज पाती, उससे पहले ही संचार बहाल हो गया। नासा के अनुसार, इसके बाद से वॉयजर-1 के साथ संपर्क बना हुआ है और इस तरह की कोई दूसरी रुकावट सामने नहीं आई है।
इस घटना का मतलब यह नहीं था कि वॉयजर-1 पूरी तरह बंद हो गया था या अंतरिक्ष में उसका सफर रुक गया था। दरअसल, पृथ्वी पर मौजूद संचार नेटवर्क निर्धारित समय पर उसका रेडियो सिग्नल नहीं पकड़ पाया था। संपर्क बहाल होने के बाद इंजीनियर यान से जानकारी हासिल कर सके और उसकी तकनीकी स्थिति की जांच शुरू की।
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थ्रस्टर में आई थी गड़बड़ी
नासा की शुरुआती जांच में पता चला कि वॉयजर-1 के थ्रस्टर के एक समूह ने काम करना बंद कर दिया था। इसके बाद यान के बैकअप थ्रस्टर अपने आप सक्रिय हो गए।
थ्रस्टर छोटे रॉकेट इंजन की तरह काम करते हैं। इनका इस्तेमाल अंतरिक्ष यान की दिशा और उसकी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। वॉयजर-1 को अपना एंटीना पृथ्वी की ओर बनाए रखना होता है, ताकि वह यहां से भेजे गए निर्देश प्राप्त कर सके और अपने उपकरणों से जुटाया गया वैज्ञानिक डेटा वापस भेज सके। थ्रस्टर यान की दिशा स्थिर रखने में मदद करते हैं।
वॉयजर-1 में एक स्वचालित सुरक्षा व्यवस्था भी है, जिसे फॉल्ट प्रोटेक्शन सिस्टम कहा जाता है। जब यान के ऑनबोर्ड कंप्यूटर को लगता है कि किसी सक्रिय सिस्टम में गड़बड़ी है, तो यह व्यवस्था बैकअप सिस्टम को चालू कर सकती है। इसका उद्देश्य यान को सुरक्षित और स्थिर स्थिति में रखना है। इस दौरान उसकी सामान्य गतिविधियां रुक सकती हैं, जिससे पृथ्वी पर मौजूद इंजीनियर समस्या को समझ सकें और आगे की कार्रवाई तय कर सकें।
घटती ऊर्जा के बीच नासा का ‘बिग बैंग‘ अभियान
संचार में आई रुकावट के अलावा वॉयजर-1 के सामने एक बड़ी चुनौती उसकी घटती ऊर्जा भी है। करीब पांच दशक से अंतरिक्ष में काम कर रहे इस यान को बिजली रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) से मिलती है। यह सिस्टम रेडियोधर्मी प्लूटोनियम के क्षय से निकलने वाली गर्मी को बिजली में बदलता है।
समय के साथ प्लूटोनियम से मिलने वाली ऊर्जा घटती जाती है। नासा के अनुसार, वॉयजर मिशन के दोनों यानों की उपलब्ध विद्युत शक्ति हर साल लगभग चार वॉट कम हो रही है। इसलिए इंजीनियरों को बिजली बचाने के लिए कुछ गैर-जरूरी उपकरण और सिस्टम बंद करने पड़ रहे हैं। इसका मकसद बचे हुए वैज्ञानिक उपकरणों को अधिक समय तक चालू रखना है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए नासा ने सितंबर 2026 में वॉयजर-1 पर एक विशेष ऊर्जा-बचत अभियान पूरा किया। इसे ‘बिग बैंग’ नाम दिया गया। इस अभियान के तहत इंजीनियरों ने यान के तीन उपकरणों को बंद किया और उनकी जगह कम बिजली इस्तेमाल करने वाले तीन विकल्प लगाए। यह प्रक्रिया शुरुआती सितंबर में पूरी हुई।
इस बदलाव को एक साथ करना जरूरी था, क्योंकि संबंधित उपकरण यान को बेहद ठंडे अंतरिक्ष वातावरण में काम करने लायक तापमान पर बनाए रखने में भी मदद करते हैं। इंजीनियरों को बिजली की खपत कम करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना था कि यान के जरूरी हिस्सों में पर्याप्त गर्मी बनी रहे।
49 साल पहले शुरू हुआ था वॉयजर-1 का सफर
वॉयजर-1 को 5 सितंबर 1977 को नासा ने अंतरिक्ष में लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य बृहस्पति और शनि जैसे बाहरी ग्रहों का अध्ययन करना था। इसका जुड़वां अंतरिक्ष यान वॉयजर-2 भी इसी साल लॉन्च किया गया था। दोनों यानों को बाहरी ग्रहों की ऐसी अनुकूल स्थिति के दौरान भेजा गया था, जिससे वे एक के बाद एक कई ग्रहों के पास से गुजरकर उनका अध्ययन कर सकें।
अपने शुरुआती मिशन के दौरान वॉयजर-1 ने बृहस्पति और शनि का अध्ययन किया। इसने इन ग्रहों, उनके छल्लों, चुंबकीय क्षेत्रों और चंद्रमाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भेजी। वहीं, वॉयजर-2 ने बृहस्पति और शनि के अलावा यूरेनस और नेपच्यून का भी अध्ययन किया। दोनों यानों ने मिलकर 48 चंद्रमाओं, ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों और छल्लों से जुड़ी जानकारी जुटाई।
वॉयजर-1 ने अगस्त 2012 में हेलियोपॉज को पार किया था। यह वह सीमा है, जहां सूर्य से निकलने वाली सौर हवा और उसके प्रभाव वाला क्षेत्र समाप्त होता है। इस सीमा को पार करने के बाद यान इंटरस्टेलर स्पेस में पहुंच गया। ऐसा करने वाला यह पहला मानव निर्मित अंतरिक्ष यान बना। इसके जुड़वां यान वॉयजर-2 ने नवंबर 2018 में हेलियोपॉज पार किया था।
अब भी डेटा भेज रहा है वॉयजर-1
वॉयजर-1 को 1977 में 10 वैज्ञानिक उपकरणों के साथ लॉन्च किया गया था। इन उपकरणों का इस्तेमाल बाहरी ग्रहों और अंतरिक्ष के अलग-अलग पहलुओं का अध्ययन करने के लिए किया गया। शुरुआती ग्रहों के अध्ययन के बाद कुछ उपकरण बंद कर दिए गए थे। ऊर्जा की कमी के कारण हाल के वर्षों में भी दो वैज्ञानिक उपकरण बंद करने पड़े हैं।
इसके बावजूद यान के कुछ वैज्ञानिक उपकरण अब भी काम कर रहे हैं। इनमें कॉस्मिक रे सबसिस्टम, मैग्नेटोमीटर और प्लाज्मा वेव सबसिस्टम शामिल हैं। ये उपकरण उच्च ऊर्जा वाले कणों, चुंबकीय क्षेत्रों और प्लाज्मा तरंगों से जुड़ी जानकारी जुटाते हैं।
इनसे मिलने वाले आंकड़े वैज्ञानिकों को सूर्य के प्रभाव वाले क्षेत्र से बाहर के अंतरिक्ष को समझने में मदद करते हैं। वॉयजर-1 अब भी इंटरस्टेलर स्पेस यानी तारों के बीच मौजूद अंतरिक्ष क्षेत्र से डेटा भेज रहा है।
गोल्डन रिकॉर्ड में दर्ज है पृथ्वी का संदेश
वॉयजर-1 और वॉयजर-2 की एक और खासियत है कि दोनों अपने साथ गोल्डन रिकॉर्ड लेकर गए हैं। यह करीब 12 इंच की सोने की परत चढ़ी तांबे की डिस्क है। इसमें पृथ्वी से जुड़ी ध्वनियां, तस्वीरें, संगीत और 55 भाषाओं में अभिवादन शामिल हैं।
इस रिकॉर्ड को इस विचार के साथ तैयार किया गया था कि भविष्य में यदि कोई बुद्धिमान सभ्यता इन यानों तक पहुंचे, तो उसे पृथ्वी और यहां के जीवन के बारे में कुछ जानकारी मिल सके। इसमें प्राकृतिक ध्वनियों, मानव जीवन और अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़े संदेश शामिल किए गए हैं।


