क्यों खास है छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार? जानिए सावन की हरियाली से जुड़े इस पर्व पर कृषि औजारों और पशुधन की पूजा, गेड़ी, पारंपरिक खेलों और पकवानों की पूरी कहानी।
रायपुर: सावन की बारिश के बाद जब खेतों में हरियाली उतरती है, धान के पौधे लहलहाने लगते हैं और गांवों में खेती-किसानी की रफ्तार बढ़ जाती है, तब छत्तीसगढ़ में एक ऐसा त्योहार आता है जो सीधे मिट्टी, किसान और प्रकृति से जुड़ा है। बुधवार, 12 अगस्त को छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार मनाया जा रहा है। इसे राज्य का पहला और प्रमुख पारंपरिक त्योहार माना जाता है।
हरेली सिर्फ पूजा-पाठ या उत्सव का दिन नहीं है। यह खेती में इस्तेमाल होने वाले औजारों के प्रति सम्मान, पशुधन के प्रति कृतज्ञता, अच्छी फसल की कामना और प्रकृति के साथ इंसान के रिश्ते को सामने लाने वाला पर्व है।
इस दिन किसान अपने हल, कुदाल, फावड़ा और दूसरे कृषि उपकरणों को साफ कर उनकी पूजा करते हैं। गाय-बैल और दूसरे पशुओं को भी नहलाकर सजाया जाता है। वहीं गांवों में गेड़ी, पारंपरिक झूले और लोक खेल इस त्योहार की रौनक बढ़ाते हैं।
लेकिन हरेली की कहानी केवल आज की तस्वीर तक सीमित नहीं है। इसके पीछे छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, आदिवासी परंपराएं, मानसून, पशुधन और प्रकृति के प्रति आभार की सदियों पुरानी भावना जुड़ी हुई है।
क्या है हरेली तिहार?
‘हरेली’ शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। सावन के मौसम में जब बारिश के कारण खेत और आसपास का इलाका हरा-भरा हो जाता है, उसी प्राकृतिक बदलाव को यह पर्व उत्सव में बदल देता है। यह मूल रूप से कृषि और प्रकृति से जुड़ा पर्व है और इसे सावन महीने की अमावस्या के आसपास मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ में इसे खेती-किसानी के प्रमुख त्योहारों में गिना जाता है। राज्य के कई ग्रामीण और कृषि-प्रधान इलाकों में इसका विशेष महत्व है। छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड भी हरेली को राज्य के क्षेत्रीय त्योहारों में शामिल करता है।
हरेली उस समय आती है जब खरीफ की खेती का शुरुआती काम काफी हद तक पूरा हो चुका होता है। खेतों में बीज बोने और पौध तैयार होने के बाद किसान अपनी मेहनत, जमीन और उन औजारों को याद करते हैं जिनकी मदद से खेती का काम आगे बढ़ता है।
छत्तीसगढ़ के ‘पहले त्योहार’ की पहचान
हरेली को छत्तीसगढ़ का प्रथम तिहार यानी पहला प्रमुख त्योहार भी माना जाता है। इसे केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति की तरह देखा जाता है।
छत्तीसगढ़ के कृषि त्योहार खेती के अलग-अलग चरणों से जुड़े हुए हैं। बीज बोने से लेकर पौध के उगने और फसल के तैयार होने तक अलग-अलग अवसरों पर प्रकृति और कृषि से जुड़े अनुष्ठान होते हैं। हरेली इसी क्रम में उस समय आती है जब खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है।
यही वजह है कि हरेली को सिर्फ एक धार्मिक पर्व के रूप में देखना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देता है। यह दरअसल कृषि जीवन और प्रकृति के बीच संबंध का उत्सव है।
कृषि औजारों की होती है पूजा
हरेली की सबसे प्रमुख परंपराओं में कृषि उपकरणों की पूजा शामिल है। किसान अपने खेती से जुड़े औजारों को साफ करते हैं। इनमें हल यानी नांगर, कुदाल, फावड़ा, गैंती, टंगिया, सब्बल और दूसरे पारंपरिक उपकरण शामिल हो सकते हैं। पूजा से पहले इन औजारों को धोकर साफ किया जाता है और फिर उन्हें सम्मान के साथ रखा जाता है।
इस परंपरा का भाव काफी सीधा है। किसान के लिए खेती सिर्फ जमीन और बारिश पर निर्भर नहीं होती। उसके पीछे लगातार शारीरिक श्रम, औजार और पशुधन की भी भूमिका होती है। इसलिए हरेली के दिन उन साधनों को सम्मान दिया जाता है जो सालभर खेती में काम आते हैं।
पशुधन के लिए भी खास दिन
हरेली में सिर्फ इंसान और खेती के औजार ही केंद्र में नहीं होते। गाय, बैल और दूसरे पशुधन भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ग्रामीण इलाकों में परिवार अपने पशुओं को नहलाते हैं, उन्हें साफ करते हैं और कई जगह उन्हें सजाते भी हैं। बैलों की पूजा की जाती है क्योंकि पारंपरिक खेती में बैल लंबे समय तक किसान के सबसे महत्वपूर्ण श्रम-सहयोगी रहे हैं।
कुछ ग्रामीण परंपराओं में बैलों को विशेष रूप से तैयार कर उन्हें पूजा जाता है और उन्हें लौंदी या बाटी जैसे आटे से बने छोटे खाद्य पदार्थ भी खिलाए जाते हैं। इन्हें अरंडी के पत्ते के साथ देने की परंपरा भी कुछ क्षेत्रों में मिलती है।
इस परंपरा के पीछे एक व्यापक विचार है, कि जिस पशु ने खेत में किसान का साथ दिया, उसके प्रति भी आभार व्यक्त किया जाए।
बीमारी और नकारात्मक शक्तियों से बचाव की मान्यता
हरेली की कुछ पारंपरिक मान्यताएं स्वास्थ्य और सुरक्षा से भी जुड़ी हैं। कुछ समुदायों में हरेली का उद्देश्य लोगों और पशुधन को बीमारी, बुरी नजर, अशुभ प्रभाव और कथित नकारात्मक शक्तियों से बचाने की कामना से भी जुड़ा रहा है।
कई ग्रामीण परंपराओं में औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल भी इस पर्व से जुड़ा रहा है। कुछ क्षेत्रों में राउत या यादव समुदाय से जुड़े चरवाहे जंगल से विभिन्न पौधे और जड़ी-बूटियां लाकर पारंपरिक औषधीय मिश्रण तैयार करते हैं। इसके बाद उसे गांव के लोगों में बांटा जाता है।
हरेली और गेड़ी का रिश्ता
अगर हरेली के दिन किसी एक चीज की सबसे ज्यादा चर्चा होती है तो वह है गेड़ी।
गेड़ी बांस से बनाया जाने वाला पारंपरिक उपकरण है, जिस पर खड़े होकर लोग जमीन से कुछ ऊंचाई पर चलते हैं। हरेली के दौरान बच्चे और युवा गेड़ी पर चलते, दौड़ते और कई जगह प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते हैं।
गेड़ी की परंपरा का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। पुराने ग्रामीण इलाकों में बारिश के दौरान कच्ची सड़कें और गलियां कीचड़ से भर जाती थीं। ऐसी स्थिति में ऊंची गेड़ी पर चलना पैरों को कीचड़ से बचाने का एक तरीका भी माना जाता रहा है।
आज भले ही गांवों में पक्की सड़कें काफी बढ़ गई हों, लेकिन गेड़ी अब भी हरेली की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनी हुई है।
इसी वजह से हरेली के दिन गांवों में गेड़ी दौड़ और उससे जुड़ी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। बच्चों और युवाओं के लिए यह सिर्फ खेल नहीं बल्कि अपनी स्थानीय परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है।
रहचुली झूला और गांव की रौनक
हरेली की एक और खास पहचान रहचुली झूला है। समय के साथ मनोरंजन के साधन बदले हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक झूलों और खेलों की लोकप्रियता अब भी कायम है।
बच्चे और युवा गेड़ी का आनंद लेते हैं, जबकि महिलाएं और परिवार पारंपरिक सावन झूलों और दूसरे ग्रामीण खेलों में हिस्सा लेते हैं। इस तरह हरेली धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर सामुदायिक मेल-जोल का अवसर भी बन जाती है।

कौन-कौन से खेल खेले जाते हैं?
हरेली के दौरान पारंपरिक छत्तीसगढ़ी खेलों का भी आयोजन होता है। इनमें पिट्ठूल, भौंरा, कबड्डी, खो-खो और फुगड़ी जैसे खेल शामिल हैं। कई जगह गेड़ी दौड़ भी आकर्षण का केंद्र रहती है।
इन खेलों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये त्योहार को अगली पीढ़ी से जोड़ते हैं। बच्चे सिर्फ किताबों में स्थानीय संस्कृति के बारे में नहीं पढ़ते, बल्कि उसे खेल और उत्सव के जरिए अनुभव भी करते हैं।
हरेली के पारंपरिक पकवान
किसी भी छत्तीसगढ़ी त्योहार की तरह हरेली भी खान-पान के बिना अधूरी मानी जाती है।
इस दिन घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें गुड़हा चीला, गुलगुला भजिया, ठेठरी, खुरमी, फरा, मुठिया और अइरसा जैसे पकवान शामिल हैं।
गुड़ और चावल या आटे से बने पारंपरिक पकवानों का इस्तेमाल पूजा और प्रसाद के रूप में भी किया जाता है। इस तरह त्योहार स्थानीय कृषि उपज और पारंपरिक भोजन संस्कृति से भी जुड़ जाता है।
घर और गांव की सफाई
हरेली के दिन केवल पूजा ही नहीं होती, बल्कि घर और आसपास के इलाके की सफाई पर भी जोर दिया जाता है।
कुछ ग्रामीण परंपराओं में गौठान और पशुशालाओं की सफाई, कृषि औजारों की सफाई और घर के आसपास की जगह को व्यवस्थित करने की परंपरा है। पूजा के लिए मिट्टी से स्थान तैयार करने और कृषि उपकरणों को वहां रखने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में मिलती है।
इस लिहाज से हरेली में स्वच्छता, पशु देखभाल और कृषि उपकरणों के रखरखाव का व्यावहारिक पक्ष भी मौजूद है।
आदिवासी संस्कृति में हरेली का महत्व
हरेली की जड़ें छत्तीसगढ़ की आदिवासी और कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं। बस्तर और छत्तीसगढ़ की कई आदिवासी समुदायों की जीवनशैली में प्रकृति, जंगल, पेड़-पौधे, पशु और कृषि का गहरा संबंध है। यहां त्योहारों और लोक परंपराओं में प्राकृतिक दुनिया के प्रति आभार और उसके साथ सामंजस्य की भावना दिखाई देती है।
हरेली भी इसी सोच का एक उदाहरण है। हालांकि समय के साथ यह त्योहार अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में मनाया जाने लगा है। कुछ जगहों पर अलग देवी-देवताओं की पूजा होती है तो कहीं कृषि और पशुधन केंद्र में रहते हैं।
आधुनिक समय में कैसे बची हुई है परंपरा?
आज कृषि में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ गया है। ट्रैक्टर और आधुनिक उपकरणों ने पारंपरिक हल और बैलों पर निर्भरता कम की है। गांवों की सड़कें पहले से बेहतर हुई हैं और बच्चों के मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं।
इसके बावजूद हरेली में पुराने औजारों की पूजा, गेड़ी, पारंपरिक खेल, झूले और स्थानीय व्यंजन अब भी दिखाई देते हैं।
यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। परंपरा स्थिर नहीं रही, लेकिन उसका मूल भाव आज भी कायम है।
आज गेड़ी केवल कीचड़ से बचने का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक है। कृषि औजारों की पूजा सिर्फ उपयोगी वस्तुओं का सम्मान नहीं, बल्कि किसान की मेहनत की पहचान है। और हरेली की हरियाली सिर्फ बारिश से आई हरियाली नहीं, बल्कि धरती के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
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