जब तिहाड़ जेल में बंद 250 JNU छात्रों ने बिना सुरंग, हथियार या हिंसा के जेल से निकलकर प्रशासन को हैरत में डाल दिया। जानिए पूरी कहानी।
नई दिल्ली: भारत की सबसे बड़ी और सबसे सुरक्षित जेलों में गिनी जाने वाली Tihar Jail का इतिहास कई चर्चित अपराधियों, गैंगस्टरों और हाई-प्रोफाइल कैदियों से भरा पड़ा है।
लेकिन तिहाड़ के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी दर्ज है, जो किसी खूंखार अपराधी या गैंग से नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के छात्रों से जुड़ा हुआ है। यह कहानी मई 1983 की है, जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के लगभग 250 छात्रों ने शातिर तरीके से तिहाड़ जेल से बाहर निकलकर जेल प्रशासन को हैरान कर दिया था।
चार दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस घटना को भारत के सबसे अनोखे और चर्चित जेल ब्रेक में गिना जाता है। इसकी खास बात यह थी कि इसमें शामिल लोग अपराधी नहीं थे, बल्कि छात्र आंदोलन से जुड़े युवा थे, जिन्हें एक विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किया गया था।
तिहाड़ जेल पर लिखी किताबों और बनी वेब सीरीज़ की वजह से यह घटना लगातार चर्चा का विषय बनी रहती है। यह जानना दिलचस्प है कि आखिर वह पूरा मामला क्या था और कैसे सैकड़ों छात्रों ने देश की सबसे सुरक्षित जेलों में से एक को चुनौती दे दी थी।
1980 का दशक और छात्र राजनीति
1980 के दशक में JNU सिर्फ एक विश्वविद्यालय नहीं था, बल्कि देश की सबसे सक्रिय राजनीतिक और वैचारिक बहसों का केंद्र माना जाता था। यहां छात्र राजनीति का प्रभाव काफी मजबूत था और कैंपस में विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठन सक्रिय रहते थे।
1983 में विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। उस समय प्रशासन ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जिनका छात्र संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया।
छात्रों का आरोप था कि विश्वविद्यालय प्रशासन लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्र भागीदारी को सीमित करने की कोशिश कर रहा है।
विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे तेज होते गए। धरने, नारेबाजी और प्रदर्शन शुरू हो गए। विश्वविद्यालय परिसर में तनाव का माहौल बनने लगा। स्थिति तब और बिगड़ी जब छात्रों और प्रशासन के बीच टकराव बढ़ गया और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
जब एक साथ गिरफ्तार हुए सैकड़ों छात्र
विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की और लगभग 250 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए छात्रों में कई छात्र नेता और आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता भी शामिल थे। उन्हें दिल्ली की Tihar Jail भेजा गया।
आज के समय में यह सामान्य बात लग सकती है, लेकिन उस दौर में इतने बड़े पैमाने पर छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेजना असाधारण घटना मानी गई थी। इनमें से अधिकांश छात्रों का किसी अपराध या जेल से कोई संबंध नहीं था। वे पहली बार जेल का अनुभव कर रहे थे। लेकिन जेल पहुंचने के बाद भी उनका विरोध समाप्त नहीं हुआ।
जेल के भीतर भी जारी रहा आंदोलन
Tihar Jail में बंद किए जाने के बाद छात्रों ने खुद को साधारण कैदियों की तरह स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि वे किसी अपराध के कारण नहीं, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने की वजह से जेल में हैं।
जेल के भीतर भी छात्र लगातार समूहों में चर्चा करते रहे। वे आंदोलन की रणनीतियों पर बात करते, नारे लगाते और गिरफ्तारी को अन्यायपूर्ण बताते रहे।
जेल प्रशासन के लिए भी यह स्थिति अलग थी। आमतौर पर Tihar Jail में अपराधियों को संभालने का अनुभव था, लेकिन यहां एक साथ सैकड़ों शिक्षित, संगठित और राजनीतिक रूप से सक्रिय छात्र मौजूद थे।
यही वह परिस्थिति थी, जहां से आगे चलकर तिहाड़ के इतिहास की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक जन्म लेने वाली थी।
जेल से निकलने की योजना
छात्रों के बीच यह भावना मजबूत हो रही थी कि उन्हें अनुचित तरीके से जेल में रखा गया है। बताया जाता है कि इसी दौरान छात्रों ने सामूहिक रूप से जेल से बाहर निकलने का विचार बनाया।
यह किसी फिल्मी कहानी जैसा जेल ब्रेक नहीं था। न छात्रों ने कोई सुरंग खोदी, न हथियारों का इस्तेमाल किया, न किसी प्रहरी को बंधी बनाया।
घटना के पीछे किसी हिंसक साजिश की बजाय छात्रों की सूझबूझ और उस समय की जेल व्यवस्था की कमियां जिम्मेदार थीं। दरअसल, Tihar Jail में उस समय मुलाकात के लिए आने वाले लोगों के हाथ पर एक विशेष स्याही वाली मुहर लगाई जाती थी।
मई के महीने में गर्मी इतनी अधिक थी कि पसीने की वजह से यह मुहर आसानी से दूसरे हाथों पर भी छप सकती थी। जेल में बंद JNU छात्रों ने इसी व्यवस्था की कमजोरी को पहचान लिया। मुलाकात के दौरान उन्होंने आगंतुकों के हाथों पर लगी मुहर को अपने हाथों पर स्थानांतरित करना शुरू किया।
धीरे-धीरे कई छात्रों के हाथों पर वैसी ही मुहर आ गई, जैसी बाहर से आए अभिभावकों या रिश्तेदारों के हाथों पर होती थी। जब मुलाकात करने आए लोग वापस बाहर जाने लगे, तो कई छात्र भी उनके बीच मिल गए।
जेल प्रशासन को कब मिली जानकारी?
प्रशासन को फरार हुए छात्रों का पता तुरंत नहीं चला। जब जेल अधिकारियों ने बाद में बंदियों की गिनती की, तब उन्हें एहसास हुआ कि बड़ी संख्या में छात्र गायब हैं। शुरुआत में अधिकारियों को यह समझने में भी समय लगा कि आखिर इतने लोग एक साथ बाहर कैसे निकल गए।
जांच में सामने आया कि मुलाकातियों के हाथों पर लगाई जाने वाली मुहर पूरी घटना की सबसे कमजोर कड़ी बन गई थी।
किसके खिलाफ किया था छात्रों ने प्रदर्शन?
ये सभी छात्र JNU में तत्कालीन कुलपति पी.एन. श्रीवास्तव के खिलाफ चल रहे आंदोलन से जुड़े थे। विश्वविद्यालय में प्रशासनिक फैसलों और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के विरोध में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। इसी आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया था।
छात्रों मे कई चर्चित नाम भी शामिल
इस छात्र आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए 250 विद्यार्थियों में कई चर्चित नाम भी शामिल थे। इनमें से एक अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी थे।
उनके साथ ही भारत की वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी इस आंदोलन का हिस्सा थीं, जो उस समय विश्वविद्यालय के ‘फ्री थिंकर्स’ समूह से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थीं।
मीडिया में मच गया था हड़कंप
1983 में JNU छात्रों की Tihar Jail से सामूहिक फरारी ने राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उस दौर के अखबारों और राजनीतिक हलकों में इसे सिर्फ एक जेल ब्रेक नहीं, बल्कि प्रशासनिक चूक और छात्र आंदोलन की असाधारण घटना के रूप में देखा गया।
कई रिपोर्टों में सवाल उठाया गया कि देश की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली Tihar Jail से इतनी बड़ी संख्या में छात्र आखिर कैसे बाहर निकल गए। वहीं, कुछ विश्लेषकों ने इसे छात्रों की संगठन क्षमता और विरोध की राजनीति का प्रतीक बताया।
इस घटना ने तिहाड़ जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर बहस छेड़ दी थी और लंबे समय तक सुर्खियों में बनी रही।
क्या यह तिहाड़ का सबसे बड़ा “जेल ब्रेक” था?
संख्या के लिहाज से देखा जाए तो 1983 में JNU छात्रों द्वारा किया गया तिहाड़ जेल से सामूहिक पलायन तिहाड़ के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे असामान्य जेल फरारी घटनाओं में गिना जाता है। विभिन्न स्रोतों में फरार छात्रों की संख्या 170 से लेकर लगभग 250 तक बताई गई है।
खास बात यह थी कि इसमें कोई पेशेवर अपराधी शामिल नहीं था, बल्कि सभी विश्वविद्यालय के छात्र थे। हालांकि तिहाड़ के लंबे इतिहास में अन्य फरारी की घटनाएं भी हुई हैं, लेकिन एक साथ इतनी बड़ी संख्या में कैदियों का बिना हिंसा, सुरंग या हथियारों के जेल से निकल जाना बेहद दुर्लभ था।
इसी वजह से यह घटना आज भी तिहाड़ के सबसे चर्चित जेल ब्रेक में शामिल मानी जाती है।
साहित्य और वेब सीरीज़ में भी घटना का ज़िक्र
1983 के JNU छात्रों के तिहाड़ जेल से सामूहिक पलायन का उल्लेख हाल के वर्षों में कई पुस्तकों और स्क्रीन रूपांतरणों में किया गया है। सबसे प्रमुख नाम “Black Warrant: Confessions of a Tihar Jailer” है, जिसे पूर्व तिहाड़ जेल अधिकारी सुनील गुप्ता (Sunil Gupta) और पत्रकार सुनीत्रा चौधरी (Sunetra Choudhury) ने लिखा है।
इस पुस्तक में तिहाड़ जेल की कई वास्तविक घटनाओं के साथ 1983 के इस चर्चित जेल ब्रेक का भी जिक्र मिलता है।
इसी पुस्तक पर आधारित नेटफ्लिक्स सीरीज़ “Black Warrant” बनाई गई है, जिसका निर्देशन विक्रमादित्य मोटवानी और सत्यांशु सिंह ने किया। सीरीज़ में तिहाड़ जेल के इतिहास की कई चर्चित घटनाओं के साथ JNU छात्रों की फरारी का प्रसंग भी दिखाया गया है।
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