युद्ध, भुखमरी और विस्थापन की कुछ तस्वीरें इतिहास का हिस्सा बन गईं। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर जानिए 8 ऐसी तस्वीरों की कहानी, जिन्हें दुनिया कभी भूल नहीं पाई।
नई दिल्ली: विज्ञापन उद्योग के बेहद चर्चित चेहरे फ्रेडरिक आर. बर्नार्ड ने कहा था – “एक तस्वीर हज़ार शब्दों के बराबर होती है”। कैमरा कुछ सेकंड के लिए किसी घटना को कैद करता है, लेकिन वही तस्वीर दशकों तक लोगों की याद में जिंदा रह सकती है।
युद्ध, भुखमरी, गरीबी, विस्थापन और मानवीय त्रासदियों की कुछ तस्वीरों ने पूरी दुनिया को सिर्फ इसलिए नहीं झकझोरा क्योंकि वे दर्दनाक थीं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उन्होंने उन घटनाओं का चेहरा दुनिया के सामने रख दिया, जिन्हें शायद लोग दूर बैठकर कभी महसूस नहीं कर पाते।
हर साल 19 अगस्त को World Photography Day (विश्व फोटोग्राफी दिवस) मनाया जाता है। इस दिन का संबंध 1839 में फ्रांस सरकार द्वारा डागेरियोटाइप प्रक्रिया की घोषणा से जोड़ा जाता है। 2010 में पहली बार इसे वैश्विक स्तर पर World Photography Day के रूप में मनाया गया, जब दुनियाभर के फोटोग्राफरों ने ऑनलाइन गैलरी के जरिए अपनी तस्वीरें साझा की थीं।
फोटोग्राफी के इतिहास में ऐसी अनगिनत तस्वीरें हैं जिन्होंने समाज, राजनीति और मानवता को प्रभावित किया। इनमें कुछ तस्वीरें इतनी दर्दनाक हैं कि उन्हें देखना भी मुश्किल होता है, लेकिन उनके पीछे छिपी कहानियां जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि वे इतिहास के उन अध्यायों को सामने लाती हैं जिन्हें भूलना दुनिया के लिए महंगा पड़ सकता है।
1. द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल (1993)
यह तस्वीर फोटोग्राफर केविन कार्टर ने 1993 में सूडान के अयोद में खींची थी। एक तरफ भूख से बेहाल एक बच्चा जमीन पर झुका हुआ है और कुछ दूरी पर एक गिद्ध उसे देख रहा है। यही दृश्य केविन कार्टर की उस तस्वीर में कैद हुआ, जिसे बाद में “The Vulture and the Little Girl” के नाम से दुनिया भर में जाना गया।
मार्च 1993 में कार्टर सूडान के अकाल की रिपोर्टिंग के लिए अयोद पहुंचे थे। तस्वीर में दिख रहा बच्चा संयुक्त राष्ट्र के एक फीडिंग सेंटर तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था। बच्चा इतना कमजोर था कि रास्ते में जमीन पर गिर पड़ा और पास ही एक गिद्ध बैठ गया।
तस्वीर 26 मार्च 1993 को The New York Times में प्रकाशित हुई और इसके बाद पूरी दुनिया का ध्यान सूडान में फैली भुखमरी की ओर गया।

इस तस्वीर को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया। लंबे समय तक बच्चे को लड़की माना गया, लेकिन बाद में उसकी पहचान एक लड़के के रूप में हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उसका नाम कोंग न्यॉन्ग था और वह उस घटना से बच गया था।
तस्वीर ने कार्टर को 1994 में Pulitzer Prize for Feature Photography दिलाया। लेकिन इसके साथ ही उन पर नैतिक सवाल भी उठे, लोग पूछने लगे कि उन्होंने बच्चे की मदद क्यों नहीं की।
कहा जाता है कि इस तस्वीर ने केविन के जीवन पर बेहद गहरा आघात किया और 27 जुलाई, 1994 को 33 वर्ष की आयु में आत्महत्या कर ली थी।
2. द बॉय स्टैंडिंग बाई द क्रीमेटरी (1945)
एक छोटा-सा बच्चा नंगे पैर खड़ा है। उसकी पीठ पर एक मृत शिशु बंधा हुआ है। बच्चा सामने की ओर देख रहा है और उसके चेहरे पर कोई स्पष्ट भाव नहीं दिखता। यह तस्वीर द्वितीय विश्व युद्ध और परमाणु बमबारी के बाद की भयावह मानवीय स्थिति की सबसे मार्मिक तस्वीरों में गिनी जाती है।
अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के लिए काम कर रहे फोटोग्राफर Joe O’Donnell ने अक्टूबर 1945 में नागासाकी में यह तस्वीर ली थी, यानी शहर पर 9 अगस्त 1945 को परमाणु बम गिराए जाने के कुछ महीनों बाद। तस्वीर में करीब 10 साल का एक बच्चा अपने मृत छोटे भाई को पीठ पर लेकर शवदाह स्थल पर खड़ा दिखाई देता है।

बताया जाता है कि बच्चा अपने भाई के शव के अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा कर रहा था। तस्वीर में सबसे ज्यादा विचलित करने वाली चीज बच्चे की चुप्पी है। इतने बड़े नुकसान के सामने भी वह रोता हुआ नहीं दिखता।
O’Donnell ने जापान में खींची गई अपनी कई तस्वीरों की प्रतियां लंबे समय तक एक संदूक में छिपाकर रखीं। 1989 में उन्होंने इन्हें सार्वजनिक करना शुरू किया और बाद में उनकी तस्वीरों की प्रदर्शनी और किताब भी सामने आई।
यह तस्वीर युद्ध की कीमत को किसी सैनिक, हथियार या बम के जरिए नहीं, बल्कि एक बच्चे की पीठ पर लदे मृत भाई के जरिए दिखाती है।
3. द टेरर ऑफ वॉर – नेपाम गर्ल (1972)
8 जून 1972 को वियतनाम युद्ध के दौरान ली गई यह तस्वीर दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली युद्ध तस्वीरों में से एक है।
तस्वीर में बच्चे बमबारी के बाद सड़क पर भागते दिखाई देते हैं। बीच में नौ साल की “फैन थी किम फुक” बिना कपड़ों के दर्द से भाग रही है। उसके शरीर पर नेपाम से गंभीर जलने की चोटें थीं।
Associated Press के फोटोग्राफर निक उत ने यह तस्वीर खींची थी। तस्वीर 9 जून को दुनिया भर के अखबारों में प्रकाशित हुई और जल्द ही युद्ध की क्रूरता का प्रतीक बन गई। उत को इसके लिए 1973 Pulitzer Prize for Photography मिला।

तस्वीर की ताकत सिर्फ उस बच्ची के चेहरे पर दिख रहे दर्द में नहीं थी। इसने दुनिया को यह दिखाया कि युद्ध के आंकड़ों के पीछे असल में सिर्फ आम लोग ही मरते और घायल होते हैं।
किम फुक गंभीर रूप से घायल हुईं, लेकिन बच गईं। बाद में उन्होंने युद्ध पीड़ितों के लिए काम किया और शांति की आवाज बनीं।
हाल के वर्षों में इस तस्वीर के वास्तविक फोटोग्राफर को लेकर विवाद भी उठा है, जिसमें एक अन्य फोटोग्राफर न्युयेन थान न्गे (Nguyen Thanh Nghe) का नाम सामने आया। हालांकि Associated Press और निक उत ने इस दावे को खारिज किया है।
4. द बरियल ऑफ एन अननोन चाइल्ड (1984)
भारत की सबसे भयावह औद्योगिक त्रासदियों में से एक की तस्वीरों में रघु राय की तस्वीर विशेष स्थान रखती है। दिसंबर 1984 में भोपाल में Union Carbide के कीटनाशक संयंत्र से जहरीली गैस लीक हुई। इस त्रासदी में हजारों लोगों की मौत हुई और लाखों लोग प्रभावित हुए।
रघु राय घटनास्थल पर पहुंचे और उन्होंने ऐसी तस्वीरें खींचीं, जिन्होंने इस त्रासदी को एक मानवीय चेहरा दिया। उनकी चर्चित ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर “Burial of an Unknown Child” में एक बच्चे का चेहरा मिट्टी के भीतर दिखाई देता है। बच्चे की पहचान कभी निश्चित रूप से स्थापित नहीं हो सकी।
यह तस्वीर इसलिए भी भयावह है क्योंकि इसमें कोई बड़ी भीड़, आग या भगदड़ नहीं दिखाई देती। सिर्फ मिट्टी में दफन एक मासूम चेहरा है, और उसी चेहरे में भोपाल त्रासदी की पूरी भयावहता सिमट जाती है।

इसी घटना की एक रंगीन तस्वीर फोटोग्राफर पाब्लो बार्थोलोम्यू (Pablo Bartholomew) ने भी ली थी। दोनों तस्वीरें भोपाल गैस त्रासदी के प्रतीकों में बदल गईं और बार्थोलोम्यू की तस्वीर ने 1985 में World Press Photo of the Year जीता।
रघु राय का काम यह दिखाता है कि फोटो पत्रकारिता कभी-कभी पूरी घटना को दिखाने के बजाय एक छोटे से दृश्य के जरिए पूरी त्रासदी का अर्थ समझा सकती है।
5. माइग्रेंट मदर (1936)
इतिहास की सबसे प्रसिद्ध तस्वीरों में से एक Migrant Mother है। इसे अमेरिकी फोटोग्राफर डोरोथिया लांग (Dorothea Lange) ने मार्च 1936 में कैलिफोर्निया के निपोमो में लिया था।
तस्वीर में एक मां अपने छोटे बच्चे को गोद में लिए दूर देख रही है। दोनों तरफ उसके दो बच्चे मां के कंधों से अपना चेहरा छिपाए हुए हैं। तस्वीर पहली नजर में किसी युद्ध की नहीं लगती, लेकिन इसके पीछे भीषण आर्थिक संकट की कहानी है।

यह तस्वीर अमेरिका में Great Depression के दौर में गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे प्रवासी कृषि मजदूरों की स्थिति को दिखाती थी। लांग उस समय अमेरिकी सरकार के Farm Security Administration के लिए काम कर रही थीं।
तस्वीर में दिख रही महिला का नाम बाद में फ्लोरेंस ओवेन्स थॉम्पसन (Florence Owens Thompson) के रूप में सामने आया। लांग ने उस परिवार को अचानक देखा था और थोड़ी देर रुककर कई तस्वीरें लीं। अंतिम तस्वीर में उन्होंने मां और बच्चों को फ्रेम के केंद्र में रखा, जिससे मां की चिंता और बच्चों की निर्भरता बेहद स्पष्ट दिखाई देती है।
माइग्रेंट मदर सिर्फ गरीबी की तस्वीर नहीं रही। यह अमेरिका के Great Depression की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गई।
विडंबना यह है कि दशकों तक जिस महिला की तस्वीर दुनिया देखती रही, उसके अपने जीवन में आर्थिक परेशानियां बनी रहीं। यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि किसी की तकलीफ को दुनिया का प्रतीक बना देना और उस व्यक्ति की जिंदगी बदल देना दो अलग चीजें हैं।
6. द हैंड ऑफ अ स्टारविंग चाइल्ड, बियाफ्रा (1968)
नाइजीरियाई गृहयुद्ध के दौरान बियाफ्रा में भुखमरी ने हजारों बच्चों को प्रभावित किया। ब्रिटिश युद्ध फोटोग्राफर डॉन मैकुलिन 1968 में बियाफ्रा पहुंचे और उन्होंने वहां युद्ध के साथ-साथ भुखमरी की भयावह तस्वीरें भी दर्ज कीं।
The Hand of a Starving Child में एक बेहद कमजोर बच्चे का हाथ एक वयस्क के हाथ में दिखाई देता है। दोनों हाथों के आकार का अंतर ही तस्वीर की पूरी कहानी कह देता है। एक तरफ सामान्य वयस्क हाथ और दूसरी तरफ भुखमरी से सिकुड़ा हुआ मासूम हाथ।
मैकुलिन ने बियाफ्रा में सिर्फ लड़ाई नहीं देखी। उन्होंने ऐसे बच्चों को देखा जो भोजन की कमी के कारण धीरे-धीरे मौत के करीब पहुंच रहे थे। बाद में उन्होंने बताया कि एक अस्पताल में सैकड़ों बच्चे भुखमरी से मर रहे थे।

बियाफ्रा की तस्वीरों ने पश्चिमी दुनिया में मानवीय संकट की ओर बड़े पैमाने पर ध्यान खींचा। मैकुलिन के लिए ये तस्वीरें सिर्फ पत्रकारिता नहीं थीं; वे उनके जीवन पर गहरा भावनात्मक असर छोड़ गईं।
7. द डेथ ऑफ एलन कुर्दी (2015)
2 सितंबर 2015 को तुर्की के बोडरम के पास समुद्र तट पर एक छोटा बच्चा मृत मिला। उसका नाम एलन कुर्दी था। वह सीरिया से आए शरणार्थी परिवार का हिस्सा था और अपने परिवार के साथ समुद्र के रास्ते ग्रीस पहुंचने की कोशिश कर रहा था।
तुर्की की फोटो पत्रकार नीलोफर देमिर (Nilüfer Demir) ने समुद्र तट पर उसका शव देखा और तस्वीर खींची। यह तस्वीर कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया में फैल गई।
एलन के साथ उसकी मां और पांच साल के भाई गेलिप की भी समुद्र में मौत हुई थी। परिवार युद्धग्रस्त सीरिया से सुरक्षित जीवन की तलाश में निकला था, लेकिन नाव के पलटने के बाद उनका सफर खत्म हो गया।

तस्वीर में बच्चे का छोटा शरीर समुद्र के किनारे औंधे मुंह पड़ा दिखाई देता है। दृश्य इतना शांत है कि पहली नजर में समुद्र तट सामान्य लगता है। लेकिन उसी शांति में शरणार्थी संकट की सबसे बड़ी त्रासदी छिपी थी।
तस्वीर वायरल होने के बाद यूरोप की शरणार्थी नीति, मानवीय सहायता और समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बहस तेज हुई। एलन कुर्दी का चेहरा उन हजारों शरणार्थी बच्चों का प्रतीक बन गया जो युद्ध और विस्थापन के बीच मारे गए।
8. दि बर्निंग मॉन्क (1963)
अमेरिकी पत्रकार और फोटोग्राफर मल्कम ब्राउन (Malcolm Browne) ने साइगॉन में बौद्ध भिक्षु थिच क्वांग डुक के आत्मदाह की तस्वीर खींची थी। वह दक्षिण वियतनाम में बौद्धों के साथ हो रहे कथित धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न के विरोध में आत्मदाह कर रहे थे।
तस्वीर में भिक्षु सड़क के बीच शांत मुद्रा में बैठे दिखाई देते हैं और उनके शरीर में आग लगी हुई है। आसपास लोग खड़े हैं, लेकिन तस्वीर का केंद्र उनका असाधारण रूप से शांत चेहरा और आग की लपटें हैं।

Browne को इस तस्वीर के लिए 1964 Pulitzer Prize for International Reporting मिला और यह तस्वीर 1963 की World Press Photo of the Year भी बनी।
इस तस्वीर ने अमेरिका और दुनिया में दक्षिण वियतनाम की सरकार की नीतियों को लेकर चर्चा तेज कर दी। अमेरिकी राष्ट्रपति John F. Kennedy ने भी तस्वीर की ताकत को स्वीकार किया था। ब्राउन ने बाद में बताया कि उन्हें पहले से संकेत मिला था कि उस सुबह कुछ महत्वपूर्ण होने वाला है, इसलिए वे वहां मौजूद थे।
The Burning Monk सिर्फ मृत्यु का दृश्य नहीं है। यह विरोध, आस्था और राजनीतिक दमन के खिलाफ एक चरम मानवीय प्रतिक्रिया का दस्तावेज बन गया।
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