Wednesday, 14 October 2026
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CEC ज्ञानेश कुमार पर अवमानना कार्रवाई की मांग, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की कथित अनदेखी का आरोप

अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग में कुछ अहम फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। इन दावों के बीच ECI ने आपसी मतभेद की बात से इनकार किया है।

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर इस कार्रवाई की अनुमति मांगी है। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज में मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के अन्य सदस्यों को दरकिनार करते हुए ऐसे फैसले लिए, जो सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों में तय संस्थागत व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं।

यह मांग ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

अटॉर्नी जनरल से क्यों मांगी गई अनुमति?

सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने के लिए कानून में एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही या तो अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल की पहल पर शुरू की जा सकती है या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से दायर याचिका के लिए उनकी लिखित सहमति जरूरी होती है।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालत की अवमानना जैसे गंभीर आरोपों पर सीधे मुकदमा शुरू करने से पहले एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए। खासकर तब, जब शिकायत किसी ऐसे व्यक्ति की ओर से आती है जो खुद इस मामले में पक्षकार नहीं है।

इसी कानूनी प्रावधान के तहत अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल को पत्र भेजकर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है। यदि अटॉर्नी जनरल लिखित सहमति देते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, सहमति मिलना अपने आप में दोष सिद्ध होने का मतलब नहीं है; इसके बाद अदालत मामले के तथ्यों और कानूनी आधार पर आगे की कार्यवाही तय करती है।

ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए गए?

ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में मीडिया रिपोर्टों और चुनाव आयोग से जुड़े बताए गए आंतरिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में कुछ महत्वपूर्ण फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।

पत्र के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मौकों पर कुछ प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और नाम दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया से जुड़े फैसले शामिल बताए गए हैं। इसके अलावा चुनावी सॉफ्टवेयर और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित निर्णयों को लेकर भी सवाल उठाए गए।

ब्रजेश सिंह का कहना है कि इन मामलों में अपनाई गई प्रक्रिया आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था और निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं थी। पत्र में इन घटनाक्रमों को लेकर दस्तावेजी रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की आपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि और चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष देखना महत्वपूर्ण है।

14 बार की गई आपत्ति का पूरा मामला

द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां मुख्य रूप से मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में बदलाव और डिजिटल सिस्टम से संबंधित थीं।

रिपोर्ट के अनुसार, पहला मुद्दा Form-6 में किए गए बदलाव का था। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में SIR से जुड़ा सवाल जोड़ा गया था। जोशी ने मई में कहा था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी होगा। बाद में संधू ने भी इस बदलाव को कथित तौर पर “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए इसे हटाने की मांग की।

दूसरा मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस के केंद्रीकरण से जुड़ा था। दोनों आयुक्तों ने राज्य और जमीनी स्तर के चुनाव अधिकारियों की डिजिटल पहुंच सीमित होने को लेकर चिंता जताई।

तीसरा मामला पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों का था। संधू ने सवाल उठाया कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ अपील किसके अधिकार से दायर की गई।

चौथा मामला गोवा के 97 मतदाताओं से जुड़ा था, जिन्हें स्थानीय अधिकारियों ने पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर संबंधी समस्या के कारण उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।

SIR पर बढ़ा विवाद

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) चुनावी मतदाता सूचियों की व्यापक समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और पात्र तथा अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है।

SIR की शुरुआत बिहार में जून 2025 में हुई थी और बाद में इसे दूसरे राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए जाने की प्रक्रिया के दायरे में आए।

SIR को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पुनरीक्षण जरूरी है।

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सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ

अवमानना की मांग करने वाले अधिवक्ता ने चुनाव आयोग की संरचना और उसकी स्वतंत्रता से जुड़े पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया है।

इनमें टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ और अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ प्रमुख हैं। अनूप बरनवाल मामले में 2023 की संविधान पीठ ने कहा था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संवैधानिक व्यवस्था की मूल विशेषता हैं। अदालत ने संसद की ओर से कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था दी थी।

इसके बाद संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 बनाया। इसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं में मुख्य रूप से चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

23 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय दी। इसके बाद मामले को उचित संविधान पीठ के गठन पर विचार के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया।

2023 के नियुक्ति कानून पर क्या हुआ?

इस मामले का मुख्य विवाद 2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में किए गए बदलाव को लेकर है। नए कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस बदलाव को लेकर चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं।

मामले में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अपने अलग मत में कहा कि केवल चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी स्वतंत्रता सार्वजनिक रूप से दिखाई भी देनी चाहिए। उनके अनुसार, नियुक्ति प्रक्रिया में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे संस्था की निष्पक्षता और स्वायत्तता को लेकर भरोसा बना रहे।

वहीं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने की जरूरत पर जोर दिया। दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग मत सामने आने के बाद मामला आगे की सुनवाई के लिए बड़ी पीठ के गठन के सवाल पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया है।

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी नेताओं ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की और SIR के आधार पर हुए बदलावों को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मौजूदा CEC के कार्यकाल में भविष्य में चुनाव नहीं कराने की मांग की।

इसके अलावा विपक्ष की ओर से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की बात भी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार, इस साल मार्च और अप्रैल में भी ऐसे नोटिस दिए जा चुके हैं।

आगे की कार्यवाई पर होगी नजर

अब इस पूरे मामले में तीन समानांतर प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण होंगी। पहली, अटॉर्नी जनरल ब्रजेश सिंह के अनुरोध पर क्या रुख अपनाते हैं। दूसरी, चुनाव आयोग के भीतर सामने आए 14 लिखित आपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों और प्रक्रियाओं पर आगे कोई न्यायिक या प्रशासनिक जांच होती है या नहीं। तीसरी, 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ क्या रुख अपनाती है।

इसके साथ SIR की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और प्रक्रिया का पालन इस विवाद के केंद्र में है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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