Thursday, 05 November 2026
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UN New World Map: बदलेगा दुनिया का नक्शा! अफ्रीका को बड़ा दिखाने पर 164 देशों का समर्थन, जानिए अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

अफ्रीका को नक्शे पर छोटा दिखाने वाली पुरानी धारणा बदल सकती है। UN के 164 देशों ने ‘Correct the Map’ प्रस्ताव का समर्थन किया है। जानिए नया नक्शा कितना अलग होगा और यह फैसला क्यों अहम है।

नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: दुनिया का नक्शा तो सदियों से हमारी किताबों, स्कूलों और स्क्रीन पर एक जैसा दिखाई देता रहा है, लेकिन अब उसे देखने का तरीका बदल सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार, 4 सितंबर को एक ऐसे प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य दुनिया के नक्शे पर महाद्वीपों और देशों के आकार को वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाना है।

इस प्रस्ताव के केंद्र में अफ्रीका है, जिसका आकार लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे मर्केटर प्रोजेक्शन वाले नक्शों में वास्तविकता की तुलना में काफी छोटा दिखाई देता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने “Correct the Map: Rebalancing global cartographic representation and promoting equitable representation of the world’s regions, particularly Africa” नाम के प्रस्ताव को 164 वोटों के समर्थन से पारित किया।

इस फैसले के बाद चर्चा Equal Earth Projection की हो रही है। यह 2018 में विकसित किया गया एक “equal-area” यानी ऐसा नक्शा-प्रक्षेपण है, जिसमें अलग-अलग भूभागों के वास्तविक क्षेत्रफल के बीच का अनुपात बरकरार रखने की कोशिश की जाती है।

164 देशों ने किया समर्थन, अमेरिका अकेला विरोधी

UN General Assembly में ‘करेक्ट दि मैप’ प्रस्ताव को 164 देशों ने समर्थन दिया। अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया और छह देशों ने परहेज किया। यह प्रस्ताव टोगो की अगुवाई में अफ्रीकी देशों की पहल के तौर पर सामने आया था और इसे अफ्रीकी संघ का समर्थन प्राप्त था। भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।

अमेरिका ने हालांकि इस पहल को लेकर आपत्ति जताई। अमेरिकी प्रतिनिधि ने मतदान से पहले इसे गैर-जरूरी बताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र को वास्तविक वैश्विक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अमेरिकी पक्ष ने इस तरह के प्रस्ताव को संस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करने वाला बताया।

दूसरी ओर प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि नक्शा केवल किसी जगह को दिखाने का माध्यम नहीं है। जिस तरह किसी क्षेत्र को दृश्य रूप से बड़ा या छोटा दिखाया जाता है, उसका असर लोगों की भौगोलिक समझ और दुनिया के बारे में उनकी धारणा पर पड़ सकता है।

आखिर Mercator Map में क्या गड़बड़ है?

इसके लिए हमें करीब 450 साल पीछे जाना होगा।

प्रसिद्ध फ्लेमिश मानचित्रकार गेरहार्ड मर्केटर ने 1569 में वह प्रोजेक्शन तैयार किया था जिसे आज मर्केटर प्रोजेक्शन के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के महाद्वीपों का क्षेत्रफल सही दिखाना नहीं था। इसे खास तौर पर समुद्री नेविगेशन के लिए विकसित किया गया था। नक्शे पर दिशाओं और कोणों को इस तरह बनाए रखना नाविकों के लिए बेहद उपयोगी था।

समस्या तब पैदा होती है जब इसी प्रोजेक्शन को दुनिया के महाद्वीपों के वास्तविक आकार की तुलना करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

मर्केटर प्रोजेक्शन में जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से दूर यानी ध्रुवों की ओर जाता है, उसका दृश्य आकार बढ़ता जाता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं।

इसी वजह से यूरोप, उत्तर अमेरिका, ग्रीनलैंड और रूस आर्कटिक महासागर जैसे उत्तरी हिस्से नक्शे पर अपने वास्तविक क्षेत्रफल से काफी बड़े दिखाई दे सकते हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्रों का आकार अपेक्षाकृत छोटा नजर आता है।

सबसे चर्चित उदाहरण अफ्रीका और ग्रीनलैंड का है।

मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग समान लग सकता है। लेकिन वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है। यानी नक्शे पर दिखाई देने वाला दृश्य अनुपात वास्तविक भौगोलिक अनुपात से बहुत अलग है।

क्या मर्केटर नक्शा गलत था?

आपको बता दें कि मर्केटर का उद्देश्य अलग था। इसे समुद्री नेविगेशन को आसान बनाने के लिए बनाया गया था और उस काम के लिए इसके गुण आज भी उपयोगी हैं। समस्या तब होती है जब नेविगेशन के लिए बनाए गए प्रोजेक्शन को दुनिया के अलग-अलग भूभागों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल पृथ्वी गोल है और नक्शा सपाट। इसलिए ग्लोग को पूरी तरह सपाट कागज या स्क्रीन पर उतारते समय किसी न किसी प्रकार की विकृति होना ही है। कोई भी सिंगल वर्ल्ड मैप एक साथ आकार, क्षेत्रफल, दूरी और दिशा को पूरी तरह सही नहीं रख सकता।

यही वजह है कि अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन बनाए गए हैं।

अफ्रीका के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह पहल सिर्फ नक्शा बनाने की तकनीक तक सीमित नहीं है। अफ्रीकी संघ और इसके समर्थकों का कहना है कि दशकों से इस्तेमाल किए जा रहे नक्शों ने अफ्रीका की वास्तविक भौगोलिक विशालता को लोगों की सामूहिक कल्पना में छोटा कर दिया है।

अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इसके बावजूद मर्केटर प्रोजेक्ट पर या ग्रीनलैंड के मुकाबले उतना विशाल दिखाई नहीं देता जितना वास्तविकता में है।

टोगो, जिसने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया, का तर्क है कि नक्शों की यह दृश्य विकृति (Visual Distortion) सिर्फ एक तकनीकी समस्या (Technical Issue) नहीं है। इसका असर शिक्षा, संस्कृति, भू-राजनीति और लोगों की वैश्विक समझ पर भी पड़ सकता है।

विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने इस पहल को “Correct the Map” अभियान से जोड़ा है। उनके मुताबिक नक्शे शिक्षा और लोगों की कल्पना को प्रभावित करते हैं और इसलिए उनमें मौजूद असंतुलित रीप्रेजेंटेशन को ठीक करना जरूरी है।

क्या इससे यूरोप और अमेरिका सच में “छोटे” हो जाएंगे?

यह इस खबर से जुड़ी सबसे आम गलतफहमी है।

यूरोप, अमेरिका या उत्तरी अमेरिका का वास्तविक आकार बिल्कुल नहीं बदल रहा। पृथ्वी पर महाद्वीपों का क्षेत्रफल जैसा है, वैसा ही रहेगा। बदलाव केवल उनके दो आयामी नक्शे पर दिखाई देने वाले आकार में होगा।

नई प्रोजेक्शन में अफ्रीका का आकार अपेक्षाकृत बड़ा और अमेरिका तथा उत्तरी अमेरिका का आकार अपेक्षाकृत छोटा नजर आएगा क्योंकि नक्शा क्षेत्रफल को वास्तविक अनुपात में दिखाने की कोशिश करता है।

इसलिए “Africa grows” या “Europe shrinks” का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जमीन बढ़ या घट रही है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि नक्शे पर दिखाई देने वाला अनुपात अधिक वास्तविक होगा।

क्या अब हर जगह नया नक्शा इस्तेमाल होगा?

UN General Assembly का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यानी सदस्य देशों को अपने सभी नक्शों, किताबों, डिजीटल मंचों या नेविगेशन प्रणाली को तुरंत बदलना अनिवार्य नहीं है। मर्केटर प्रोजेक्शन पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

लेकिन प्रस्ताव का राजनीतिक और शैक्षिक महत्व बड़ा है। UN ने सदस्य देशों को ज्यादा सटीक और equitable map projections के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया है।

इसका असर धीरे-धीरे स्कूल की किताबों, शैक्षणिक मानचित्रों, मीडिया ग्राफिक्स, संस्थागत मानचित्र और डिजिटल मैपिंग सिस्टम पर पड़ सकता है।

यानी ऐसा नहीं होगा कि अगले दिन Google Maps खोलते ही हर जगह नया नक्शा दिखाई देने लगे। अलग-अलग कंपनियां और संस्थाएं अपनी जरूरत और तकनीकी जरूरतों के आधार पर प्रोजेक्शन का चुनाव करेंगी।

नेविगेशन में मर्केटर की उपयोगिता बनी रहेगी

इस फैसले के बाद मर्केटर प्रोजेक्शन पूरी तरह खत्म नहीं होने वाला।

मर्केटर की सबसे बड़ी ताकत नेविगेशन से जुड़ी है। इसके जरिए दिशा और कोण को इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है कि समुद्री यात्राओं के लिए यह बेहद उपयोगी साबित हुआ।

इसलिए दुनिया के वास्तविक क्षेत्रफल को समझाने के लिए Equal Earth या किसी अन्य equal-area projection का इस्तेमाल बढ़ सकता है, लेकिन navigation जैसे विशेष कामों के लिए मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल जारी रह सकता है।

यानी आने वाले समय में दुनिया में एक ही नया नक्शा हर जगह लागू होने के बजाय अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग प्रोजेक्शनों का इस्तेमाल अधिक स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

फ्रांस ने भी किया नए बदलाव का समर्थन

UN में प्रस्ताव पारित होने से पहले और उसके बाद फ्रांस ने भी मर्केटर प्रोजेक्शन से आगे बढ़ने का संकेत दिया।

फ्रांस के विदेश मंत्री Jean-Noël Barrot ने प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि देश मर्केटर प्रोजेक्शन को छोड़कर ऐसे मानचित्र की ओर बढ़ेगा जो वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही ढंग से दर्शाते हों।

हालांकि फ्रांस ने Equal Earth को सीधे अपनाने के बजाय Eckert IV projection का इस्तेमाल करने की बात कही है। यह भी एक ऐसी प्रोजेक्शन है जो क्षेत्रफल को ज्यादा संतुलित तरीके से दिखाती है और Equal Earth के करीब मानी जाती है।

इससे एक बात साफ होती है कि UN का प्रस्ताव किसी एक मैप को दुनिया का अनिवार्य नया पैमाना घोषित नहीं करता। मुख्य जोर Relative Area को ज्यादा सही तरीके से दिखाने वाले प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने पर है।

भविष्य की चुनौतियां

अब अगली चुनौती इस प्रस्ताव को वास्तविक इस्तेमाल तक पहुंचाने की होगी।

टोगो ने संकेत दिया है कि वह African Union, UNESCO और Mapping Technology से जुड़ी कंपनियों के साथ मिलकर आगे की कार्यान्वयन पर काम करना चाहता है। Togo में अगले वर्ष इस मुद्दे पर संबंधित संस्थाओं और प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ बैठक की योजना है।

सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या स्कूलों और सरकारी संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक वैश्विक मानचित्र धीरे-धीरे बदलेंगे। इसके अलावा Digital Mapping Platforms और Media Organisations भी इस बहस का हिस्सा बन सकते हैं।

हालांकि यूएन रिज़ोल्यूशन बाध्यकारी नहीं है, लेकिन 164 देशों का समर्थन यह संकेत जरूर देता है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में ज्यादा Accurate Cartographic Representation की मांग को गंभीरता से लिया जा रहा है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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