ग्लोरिया स्टीनम का निधन अमेरिकी नारीवादी आंदोलन के एक बड़े अध्याय का अंत है। 92 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली स्टीनम के भारत कनेक्शन और संघर्ष की पूरी कहानी जानें
नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: अमेरिका के आधुनिक महिला अधिकार आंदोलन की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शामिल पत्रकार, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ग्लोरिया स्टीनम का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। ग्लोरिया स्टीनम फाउंडेशन की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक उन्होंने बुधवार, 2 सितंबर को न्यूयॉर्क स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। वह कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण कमजोर चल रही थीं। उनके निधन की आधिकारिक जानकारी 3 सितंबर को सामने आई। मृत्यु की वजह अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
छह दशकों से ज्यादा समय तक स्टीनम अमेरिकी महिला आंदोलन की प्रमुख आवाज बनी रहीं। समान वेतन, प्रजनन अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव और महिलाओं की सामाजिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को उन्होंने पत्रकारिता, लेखन और जमीनी संगठन के जरिए उठाया।
वह Ms. Magazine की सह-संस्थापक थीं और 1970 के दशक में अमेरिकी नारीवादी आंदोलन के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में शामिल हो गई थीं।
उनकी जिंदगी की कहानी सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। 1950 के दशक में भारत में बिताया उनका समय उनके विचारों के विकास में बेहद अहम रहा। दिल्ली के मिरांडा हाउस में रहना, ग्रामीण इलाकों में काम करना और गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलना उनके लिए ऐसा अनुभव बना, जिसने आगे चलकर उनकी नारीवादी सोच को नई दिशा दी।
टोलेडो में जन्म
ग्लोरिया मैरी स्टीनम का जन्म 25 मार्च 1934 को अमेरिका के ओहायो राज्य के टोलेडो में हुआ था। उनके पिता घूम-घूमकर प्राचीन वस्तुओं की बिक्री करते थे, इसलिए उनका बचपन एक जगह टिककर नहीं बीता। नियमित स्कूल जाने के बजाय उन्होंने शुरुआती वर्षों में काफी कुछ खुद पढ़कर सीखा।
1944 में उनके माता-पिता अलग हो गए। उस समय ग्लोरिया सिर्फ 10 साल की थीं। इसके बाद उन्होंने अपनी मां की देखभाल में भी बड़ी भूमिका निभाई। उनकी मां पहले पत्रकार रह चुकी थीं, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। इस पारिवारिक अनुभव ने भी स्टीनम की आगे की जिंदगी पर असर डाला।
उन्होंने स्मिथ कॉलेज में पढ़ाई की और 1956 में स्नातक किया। कॉलेज के बाद उनका जीवन सामान्य अमेरिकी करियर की दिशा में नहीं गया। उन्हें चेस्टर बाउल्स एशियन फेलोशिप मिली, जिसने उन्हें भारत आने का अवसर दिया। यही यात्रा आगे चलकर उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल हुई।
भारत में बिताया समय बना उनकी सोच का आधार
1950 के दशक के अंत में स्टीनम भारत पहुंचीं। उन्होंने दिल्ली के मिरांडा हाउस में समय बिताया और बाद में देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा की। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक उन्होंने दिल्ली के अलावा कोलकाता, दक्षिण भारत और मुंबई की भी यात्राएं कीं। भारत में उन्होंने ग्रामीण इलाकों और गांधीवादी सामाजिक आंदोलनों को करीब से देखा।
भारत उनके लिए सिर्फ एक विदेशी यात्रा नहीं था। बाद के वर्षों में उन्होंने बताया कि यहां महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक भूमिका को देखकर उनके विचार बदले। उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि महिलाएं केवल परिवार की भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक आंदोलनों की सक्रिय भागीदार भी हो सकती हैं।
भारत में रहते हुए उनका संपर्क गांधीवादी अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता देवकी जैन जैसे लोगों से हुआ। उन्होंने विनोबा भावे से जुड़े भूदान आंदोलन के काम को भी करीब से देखा और ग्रामीण स्तर पर संगठन बनाने की प्रक्रिया को समझा। इस अनुभव ने उन्हें जमीनी स्तर पर बदलाव की ताकत का एहसास कराया।
यही वजह है कि स्टीनम के भारतीय अध्याय को उनके नारीवादी विचारों की शुरुआती प्रयोगशाला के तौर पर देखा जाता है। वह बाद में कहती थीं कि भारत में उन्होंने ‘फेमिनिज्म’ शब्द जाने बिना ही महिलाओं की असमानता और उनके संघर्षों को समझना शुरू कर दिया था।
कमलादेवी चट्टोपाध्याय से मुलाकात
भारत के जिन लोगों ने स्टीनम की सोच को प्रभावित किया, उनमें स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय का नाम खास है। स्टीनम ने बाद के वर्षों में कमलादेवी के साथ अपनी मुलाकात और उनके काम को बेहद महत्वपूर्ण बताया।
1976 में स्टीनम और देवकी जैन ने नई दिल्ली में कमलादेवी चट्टोपाध्याय का इंटरव्यू भी किया था। कमलादेवी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रही थीं और महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण तथा भारतीय हस्तशिल्प आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका थी।
भारत में महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते देखना स्टीनम के लिए खास अनुभव था। उन्होंने बाद में इस बात का उल्लेख किया कि अमेरिका में उन्होंने महिलाओं के इतिहास को जिस तरह जाना था, भारत में उन्हें उससे अलग तरह की महिला नेतृत्व की परंपरा देखने को मिली।
पत्रकार से महिला अधिकारों की आवाज तक
भारत से लौटने के बाद स्टीनम ने न्यूयॉर्क में पत्रकारिता शुरू की। लेकिन महिला पत्रकारों के सामने उस समय मौजूद लैंगिक भेदभाव ने उन्हें खुद भी परेशान किया। राजनीति और गंभीर विषयों पर लिखने की इच्छा के बावजूद उन्हें अक्सर फैशन, भोजन और महिलाओं से जुड़े हल्के विषयों पर असाइनमेंट दिए जाते थे।
1963 में उन्हें एक ऐसा असाइनमेंट मिला जिसने उनके पत्रकारिता करियर को नया मोड़ दिया। उन्होंने अंडरकवर जाकर प्लेबॉय क्लब में ‘बनी’ के रूप में काम किया और वहां महिला कर्मचारियों की स्थिति पर रिपोर्ट लिखी। यह रिपोर्ट चर्चित हुई, हालांकि स्टीनम ने बाद के वर्षों में माना कि इस अनुभव को उनके खिलाफ भी इस्तेमाल किया गया।
1969 में एक गर्भपात अधिकार सुनवाई को कवर करना उनके जीवन का एक और निर्णायक क्षण बना। इसी दौरान उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से अपने उस अनुभव के बारे में बात की, जो उन्होंने 22 साल की उम्र में लंदन में अवैध गर्भपात के रूप में झेला था। इसके बाद महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दे उनके पत्रकारिता जीवन के केंद्र में आते गए।
National Women’s Political Caucus की स्थाप्ना
1971 में स्टीनम ने बेट्टी फ्रीडन, शर्ली चिशोल्म और बेला अबजग के साथ National Women’s Political Caucus की स्थापना की। इसका उद्देश्य महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना और उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक प्रभावशाली भूमिका दिलाना था।
स्टीनम ने धीरे-धीरे कॉलेज परिसरों, सामुदायिक केंद्रों, रैलियों और महिला संगठनों के बीच जाकर बोलना शुरू किया। शुरुआत में वह सार्वजनिक मंच पर बोलने को लेकर सहज नहीं थीं, लेकिन बाद में वह महिला आंदोलन की सबसे लोकप्रिय वक्ताओं में शामिल हो गईं।
उनका मानना था कि बदलाव केवल कानून बदलने से नहीं आएगा। महिलाओं को अपनी आवाज, संगठन और राजनीतिक शक्ति भी विकसित करनी होगी।
‘Ms. Magazine’ ने बदल दी पत्रकारिता
1972 में स्टीनम ने अन्य सहयोगियों के साथ Ms. Magazine की शुरुआत की। उस समय महिलाओं के लिए ऐसी पत्रिका की कल्पना ही अलग थी, जिसमें घरेलू जीवन और फैशन के बजाय गर्भपात, लैंगिक भेदभाव, कामकाजी महिलाओं के अधिकार, राजनीति और सामाजिक असमानता जैसे विषय प्रमुख हों।
शुरुआत में पत्रिका को लेकर काफी आलोचना हुई। कुछ लोगों ने भविष्यवाणी की कि यह ज्यादा समय तक नहीं चलेगी। लेकिन Ms. धीरे-धीरे अमेरिकी नारीवादी आंदोलन की महत्वपूर्ण आवाज बन गई।
स्टीनम 2001 तक पत्रिका से जुड़ी रहीं। इसके बाद भी वह इसकी सलाहकार बनी रहीं।
पितृसत्ता पर व्यंग्य भरा लेखन
स्टीनम की लेखनी की खासियत यह थी कि वह गंभीर सामाजिक मुद्दों को कभी-कभी व्यंग्य और कल्पना के जरिए सामने लाती थीं। इसका सबसे चर्चित उदाहरण 1978 में प्रकाशित उनका लेख ‘If Men Could Menstruate’ है।
इस व्यंग्यात्मक लेख में उन्होंने कल्पना की कि अगर पुरुषों को मासिक धर्म होता तो समाज इसे किस तरह देखता। उनका तर्क था कि जिस प्रक्रिया को महिलाओं के मामले में शर्म और कमजोरी से जोड़ दिया जाता है, वही पुरुषों से जुड़ने पर शायद ताकत, गर्व और विशेषाधिकार का प्रतीक बना दी जाती।
लेख का उद्देश्य यह दिखाना था कि शरीर से ज्यादा समाज की बनाई हुई धारणाएं लैंगिक असमानता को मजबूत करती हैं। यह लेख अक्टूबर 1978 के Ms. Magazine में प्रकाशित हुआ था।
समान वेतन से लेकर प्रजनन अधिकार तक लड़ाई
स्टीनम की सक्रियता कई मुद्दों तक फैली हुई थी। उन्होंने महिलाओं के लिए समान वेतन, कार्यस्थल पर बराबरी, प्रजनन स्वतंत्रता, गर्भपात के अधिकार, घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लगातार उठाया।
वह Equal Rights Amendment के समर्थन में भी सक्रिय रहीं। 1978 में वॉशिंगटन में इसके समर्थन में हुए मार्च में उनकी प्रमुख भूमिका रही।
उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह विचार था कि महिलाओं की समानता केवल निजी जीवन का मुद्दा नहीं है। यह अर्थव्यवस्था, राजनीति, कानून, स्वास्थ्य और सार्वजनिक संस्थानों से भी जुड़ा हुआ सवाल है।
निजी जिंदगी में भी तोड़ी परंपराएं
स्टीनम ने लंबे समय तक शादी और मातृत्व को अपनी जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना। उन्होंने कभी बच्चे नहीं किए और कहा कि उन्हें इस फैसले पर कोई पछतावा नहीं था।
हालांकि, 2000 में 66 वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश कार्यकर्ता और कारोबारी डेविड बेल से शादी की। डेविड बेल अभिनेता क्रिश्चियन बेल के पिता थे। कुछ साल बाद डेविड को ब्रेन लिम्फोमा हुआ और 2003 में उनका निधन हो गया।
स्टीनम की किताब ‘My Life on the Road’ 2015 में प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने लगातार यात्राओं, अलग-अलग समुदायों से मुलाकात और जमीनी स्तर पर लोगों से बातचीत को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
आखिरी वर्षों तक जारी रहा काम
उम्र बढ़ने के बावजूद स्टीनम ने सार्वजनिक जीवन से खुद को पूरी तरह अलग नहीं किया। वह नई पीढ़ी की महिला कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करती रहीं और लैंगिक समानता के मुद्दों पर बोलती रहीं।
उनके जीवन पर 2020 में फिल्म ‘The Glorias’ भी बनी, जिसमें अलग-अलग उम्र की स्टीनम का किरदार कई अभिनेत्रियों ने निभाया। फिल्म का निर्देशन जूली टेमर ने किया था।
स्टीनम ने अपनी अंतिम किताब भी पूरी कर ली थी, जिसे उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित किया जाना है। उनकी जिंदगी के आखिरी दौर तक उनका लेखन और सार्वजनिक सक्रियता जारी रही।
निधन पर उमड़ा शोक
स्टीनम के निधन की खबर सामने आने के बाद अमेरिका और दुनिया के कई हिस्सों से श्रद्धांजलियां आईं। पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने उन्हें ऐसी नेता बताया जिन्होंने युवा महिलाओं के लिए रास्ते खोले। पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने उनकी सक्रियता को आशावाद से जुड़ा बताया और कहा कि उनकी आवाज आने वाली पीढ़ियों के लिए बनी रहनी चाहिए।
ओपरा विनफ्रे ने कहा कि आज जो महिलाएं अपने अधिकार, सम्मान, समान वेतन और अपने शरीर पर फैसले के अधिकार की मांग कर सकती हैं, उनकी स्थिति में स्टीनम के संघर्ष की बड़ी भूमिका है। पूर्व हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी, पूर्व प्रथम महिला जिल बाइडन, अभिनेत्री जेन फोंडा, बारबरा स्ट्रीसैंड, लेखिका रोक्सेन गे और कई अन्य लोगों ने भी उन्हें याद किया।
स्टीनम की मित्र और सामाजिक कार्यकर्ता अबिगेल डिज्नी ने कहा कि उनके हर काम की जड़ में दयालुता थी और यही भावना उनकी राजनीतिक सक्रियता में भी दिखाई देती थी।
92 साल की उम्र में ग्लोरिया स्टीनम का निधन अमेरिकी नारीवादी आंदोलन के एक लंबे अध्याय का अंत है, लेकिन उनके उठाए सवाल आज भी राजनीति, कार्यस्थल, परिवार और समाज में बराबरी की बहस के केंद्र में हैं। भारत में बिताया उनका शुरुआती समय इस विरासत का वह हिस्सा है, जो बताता है कि एक युवा पत्रकार की यात्रा कैसे धीरे-धीरे उसे दुनिया की सबसे पहचानी जाने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ताओं में बदल सकती है।
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