तमिलनाडु ने 22 सितंबर को ब्रेकफास्ट स्कीम का विस्तार कक्षा 6 से 8 तक किया था। दो दिन बाद तिरुवल्लूर में नाश्ते में छिपकली मिलने और 36 छात्रों के बीमार होने का मामला सामने आया।
चेन्नई: स्कूल में सुबह का नाश्ता बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और पोषण के लिए होता है, अस्पताल जाने के लिए नहीं। लेकिन तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में गुरुवार को सरकारी स्कूल के छात्रों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ।
कोट्टैयूर के एक सरकारी स्कूल में ‘कामराजर ब्रेकफास्ट स्कीम’ के तहत परोसे गए नाश्ते में कथित तौर पर छिपकली मिलने के बाद कई छात्रों की तबीयत बिगड़ गई। शुरुआती रिपोर्ट में 36 छात्रों के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी सामने आई। छात्रों को उल्टी और चक्कर जैसी शिकायतों के बाद तिरुवल्लूर सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया। मामले की जांच शुरू कर दी गई है।
घटना ऐसे समय सामने आई है जब राज्य सरकार ने महज दो दिन पहले ही अपनी मुफ्त नाश्ता योजना का दायरा कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए बढ़ाया है। विस्तार के बाद योजना के तहत कक्षा 1 से 8 तक के करीब 34.64 लाख छात्र और 44,984 सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल शामिल हो गए हैं।
ऐसे में तिरुवल्लूर की घटना केवल एक स्कूल की रसोई में हुई कथित लापरवाही का मामला नहीं रह जाती। यह सवाल भी सामने आता है कि इतने बड़े स्तर पर चल रही भोजन योजना में खाने की गुणवत्ता और सुरक्षा की निगरानी कितनी प्रभावी है?
नाश्ता करते ही बिगड़ी तबीयत
तिरुवल्लूर जिले के कोट्टैयूर स्थित पंचायत यूनियन मिडिल स्कूल में गुरुवार, 24 सितंबर की सुबह छात्रों को सरकारी नाश्ता योजना के तहत भोजन परोसा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, नाश्ता करने के कुछ देर बाद कई छात्रों ने उल्टी और चक्कर आने की शिकायत की।
बच्चों की तबीयत बिगड़ने की सूचना मिलते ही उन्हें इलाज के लिए तिरुवल्लूर सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया। शुरुआती जानकारी में 36 छात्रों के अस्पताल पहुंचने की बात सामने आई।
घटना ने तब गंभीर रूप ले लिया, जब परोसे गए भोजन में कथित तौर पर छिपकली मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बाद स्कूल में भोजन वितरण रोक दिया गया और पूरे मामले की जांच शुरू की गई। प्रशासन और संबंधित विभाग यह पता लगाने में जुटे हैं कि छिपकली भोजन में किस स्तर पर पहुंची और क्या छात्रों की तबीयत खराब होने का सीधा संबंध इसी से था।
फिलहाल जांच पूरी होने से पहले इसे निश्चित तौर पर फूड पॉइजनिंग का मामला कहना जल्दबाजी होगी। भोजन के नमूनों की जांच और अधिकारियों की रिपोर्ट से ही घटना की वास्तविक वजह स्पष्ट हो सकेगी।
योजना का उद्देश्य पोषण या बीमारी?
तमिलनाडु की सुबह की भोजन योजना का मूल उद्देश्य बच्चों को स्कूल में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और भूख के कारण पढ़ाई प्रभावित होने की समस्या को कम करना है। योजना को पहले छोटे स्तर पर शुरू किया गया था और बाद में इसका विस्तार सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों तक किया गया।
22 सितंबर को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने योजना का विस्तार कक्षा 6 से 8 तक किया। इसके तहत करीब 15.30 लाख अतिरिक्त छात्रों को शामिल किया गया है। विस्तार के लिए चालू वित्त वर्ष में ₹217.63 करोड़ की अतिरिक्त राशि आवंटित की गई है। कुल मिलाकर योजना का बजट करीब ₹724 करोड़ बताया गया है।
सरकार के अनुसार, योजना का मकसद केवल भोजन देना नहीं बल्कि बच्चों के पोषण, स्कूल में उपस्थिति और पढ़ाई पर ध्यान को बेहतर करना भी है। ऐसे में भोजन में किसी बाहरी वस्तु या जीव के मिलने की घटना योजना की सबसे बुनियादी जरूरत, यानी सुरक्षित भोजन, पर सवाल खड़ा करती है।
कागज पर योजना का विस्तार जितना बड़ा हो, जमीन पर उसकी रसोई व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। आखिर 34 लाख से ज्यादा बच्चों को खाना खिलाने वाली व्यवस्था में “आज की किचड़ी में क्या निकलेगा?” वाला सस्पेंस किसी टीवी शो का हिस्सा तो हो नहीं सकता।
पहले भी नाश्ते में मिली थी छिपकली
तिरुवल्लूर जिले में यह मामला इसलिए ज्यादा गंभीर नजर आता है क्योंकि करीब एक महीने पहले भी इसी तरह की घटना सामने आई थी।
अगस्त में पूनमल्ली के एक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में सुबह के नाश्ते में मृत छिपकली मिलने के बाद छात्रों के बीमार होने की खबर सामने आई थी। उस घटना में अलग-अलग रिपोर्टों में प्रभावित छात्रों की संख्या 9 और 17 बताई गई। विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, कुछ छात्रों ने भोजन करने के बाद मितली और चक्कर की शिकायत की और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
उस मामले में शिक्षकों ने भोजन बांटते समय कंटेनर में छिपकली देखी और नाश्ता बांटना रोक दिया था। भोजन एक सामुदायिक कुकिंग सेंटर में तैयार किया गया था और कई स्कूलों को सप्लाई किया जाना था। घटना की जानकारी मिलने के बाद दूसरे स्कूलों में भी भोजन वितरण रोक दिया गया था। अधिकारियों ने रसोई और स्कूल का निरीक्षण किया तथा जांच की बात कही थी।
यानी एक महीने के भीतर उसी जिले में स्कूल के नाश्ते में छिपकली मिलने की दूसरी घटना सामने आना महज एक संयोग भर मानकर छोड़ना मुश्किल है।
मार्च में भी 44 बच्चे हुए थे प्रभावित
तमिलनाडु में स्कूल के भोजन को लेकर इसी साल एक और बड़ा मामला सामने आ चुका है। मार्च 2026 में कोयंबटूर के कवुंडमपालयम स्थित कॉरपोरेशन मिडिल स्कूल में दोपहर का भोजन करने के बाद 44 छात्रों की तबीयत बिगड़ गई थी।
रिपोर्टों के अनुसार, बच्चों को उल्टी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें हुईं। भोजन की एक प्लेट में मृत छिपकली मिलने की बात सामने आई थी। प्रभावित छात्रों को अस्पताल ले जाया गया और मामले की जांच शुरू की गई।
इस घटना में बाद में तीन भोजन कर्मचारियों को निलंबित किए जाने की जानकारी भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार स्कूल में करीब 408 छात्र पढ़ते थे और बड़ी संख्या में बच्चे सरकारी भोजन योजना का खाना खाते थे।
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2025 में भी सामने आए थे ऐसे मामले
स्कूलों के भोजन में छिपकली मिलने की घटनाएं तमिलनाडु में 2026 से ही शुरू नहीं हुईं। 2025 में भी अलग-अलग जिलों से ऐसी शिकायतें सामने आई थीं।
सितंबर 2025 में कुड्डालोर जिले के एक पंचायत यूनियन मिडिल स्कूल में नाश्ते में छिपकली मिलने की खबर सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, 17 छात्रों ने भोजन किया था और इसके बाद कुछ बच्चों ने मितली और चक्कर की शिकायत की। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था।
जुलाई 2025 में कृष्णागिरि जिले के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में नाश्ते के सांभर में मृत छिपकली मिलने की घटना सामने आई थी। छात्रों को एहतियात के तौर पर चिकित्सा सहायता दी गई थी और अधिकारियों ने मामले की जांच की थी।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर तस्वीर सिर्फ “एक स्कूल में लापरवाही” की नहीं रह जाती। अलग-अलग जगहों पर रसोई, भोजन की तैयारी और वितरण व्यवस्था को लेकर बार-बार शिकायतें सामने आ रही हैं।
दो दिन पहले ही बढ़ा था योजना का दायरा
इस मामले का समय भी ध्यान देने लायक है। तिरुवल्लूर की घटना 24 सितंबर को सामने आई, जबकि 22 सितंबर को तमिलनाडु सरकार ने ब्रेकफास्ट स्कीम को कक्षा 6 से 8 तक विस्तार दिया था।
सरकार के अनुसार, इस विस्तार के साथ करीब 15.30 लाख नए छात्र योजना के दायरे में आए हैं। 7,537 अतिरिक्त स्कूलों को भी जोड़ा गया है। अब कक्षा 1 से 8 तक के करीब 34.64 लाख छात्र इस योजना से लाभान्वित होंगे।
यह विस्तार अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक ऑपरेशन है। जितने अधिक स्कूल और बच्चे योजना में शामिल होंगे, उतनी ही बड़ी सप्लाई चेन, किचन नेटवर्क और निगरानी व्यवस्था की जरूरत होगी।
CJP भी सवालों के घेरे में
घटना के बाद चर्चा का एक राजनीतिक पहलू भी सामने आया है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से सवाल कर रहे हैं कि स्कूलों की स्थिति और भोजन व्यवस्था को लेकर अभियान चलाने वाला संगठन तमिलनाडु की इस घटना पर अबतक चुप क्यों है।
CJP के “School Thik Karo” अभियान में स्कूलों की जांच के लिए बनाए गए चेकलिस्ट में पेयजल, शौचालय, बिजली, सुरक्षित कक्षाओं और परिसर की सुरक्षा के साथ मिड-डे मील को भी शामिल किया गया है। संगठन लोगों से सरकारी स्कूलों का निरीक्षण कर समस्याओं का दस्तावेजीकरण करने की अपील करता है।
हाल के दिनों में CJP की स्कूल संबंधी गतिविधियां मुख्य रूप से राजस्थान के सरकारी और आदिवासी स्कूलों पर केंद्रित दिखाई दी हैं। वहां संगठन की टीमों ने बुनियादी सुविधाओं, स्कूल भवन और रसोई की स्थिति को लेकर मुद्दे उठाए हैं।
यही वजह है कि कुछ आलोचक अब पूछ रहे हैं कि अगर भोजन और स्कूल की बुनियादी व्यवस्था अभियान का हिस्सा है तो तमिलनाडु में सामने आई इस घटना पर भी वैसी ही सक्रियता क्यों नहीं दिखाई गई।
बच्चों को प्लेट में भरोसा चाहिए, सरप्राइज नहीं
स्कूलों में मिलने वाला नाश्ता किसी सरकारी योजना की सिर्फ एक सुविधा नहीं है। लाखों परिवारों के लिए यह बच्चों के दैनिक पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इसमें लापरवाही का असर सिर्फ एक सुबह की परेशानी तक सीमित नहीं रहता।
सरकार ने योजना का दायरा बढ़ाकर लाखों नए बच्चों को इसमें शामिल किया है। अब उसी अनुपात में निगरानी तंत्र को भी मजबूत करने की जरूरत है। क्योंकि बच्चों को स्कूल में सुबह-सुबह पौष्टिक भोजन चाहिए, न कि प्लेट खोलते समय यह डर कि आज नाश्ते में क्या निकलेगा।
और अगर सरकारी योजनाओं का असली उद्देश्य बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाना है, तो यह सुनिश्चित करना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि उस मुस्कान के बाद उन्हें अस्पताल की ओर न जाना पड़े।
