‘बैंडिट क्वीन’ फूलन देवी की जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही। 11 साल की उम्र में विवाह, चंबल के बीहड़ों और बेहमई कांड से लेकर संसद और हत्या तक की पूरी कहानी जानिए।
जालौन/ नई दिल्ली: एक ऐसी लड़की, जिसका बचपन गरीबी, सामाजिक भेदभाव और घरेलू हिंसा के बीच बीता, आगे चलकर देश की सबसे चर्चित डकैतों में शामिल हुई और फिर उसी देश की संसद तक पहुंची। फूलन देवी की जिंदगी किसी सीधी रेखा में आगे बढ़ने वाली कहानी नहीं थी। इसमें शोषण था, हिंसा थी, बदले था, अपराध था, जेल थी और अंत में राजनीति के जरिए अपनी पहचान बदलने की कोशिश भी थी।
10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के घूरा का पुरवा गांव में जन्मी फूलन देवी आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक इतिहास की सबसे विवादित शख्सियतों में गिनी जाती हैं। कभी उन्हें ‘बैंडिट क्वीन’ कहा गया तो कभी वंचित और पिछड़े समुदायों के प्रतिरोध का प्रतीक माना गया।
वहीं, बेहमई हत्याकांड ने उनके जीवन पर ऐसा दाग छोड़ा, जिससे उनकी कहानी को केवल संघर्ष और पीड़ित होने की कहानी के रूप में देखना संभव नहीं है। 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में उनकी हत्या के साथ उनकी जिंदगी खत्म हुई, लेकिन उनके जीवन से जुड़े सवाल आज भी खत्म नहीं हुए हैं।
गरीब परिवार में हुआ जन्म
फूलन देवी का जन्म एक बेहद गरीब मल्लाह परिवार में हुआ था। उनके पिता देवीदीन और मां मूला देवी खेती और छोटे-मोटे काम के सहारे परिवार चलाते थे। परिवार के पास बहुत कम जमीन थी और गांव की सामाजिक संरचना में भी उनका परिवार प्रभावशाली स्थिति में नहीं था।

उनके बचपन का एक बड़ा विवाद जमीन को लेकर था। परिवार की जमीन के हिस्से को लेकर उनके चचेरे भाई मायादीन के साथ विवाद हुआ। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव के जरिए उनके परिवार को नुकसान पहुंचाया गया। छोटी उम्र में ही फूलन ने इस विवाद का विरोध करना शुरू कर दिया था।
11 साल की उम्र में हुई शादी
फूलन की जिंदगी का अगला बड़ा मोड़ उनकी बेहद कम उम्र में हुई शादी थी। करीब 11 वर्ष की उम्र में उनकी शादी पुट्टीलाल नाम के व्यक्ति से कर दी गई, जो उनसे काफी बड़ा था। बाद में यह संबंध टूट गया और फूलन अपने मायके लौट आईं।
उनके जीवन पर लिखे गए विभिन्न स्रोतों में इस विवाह के दौरान शारीरिक और यौन हिंसा के आरोपों का उल्लेख मिलता है। इन घटनाओं ने उनके जीवन और मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाला। कम उम्र में विवाह और घरेलू हिंसा ने उस सामाजिक व्यवस्था की कठोरता को सामने रखा जिसमें एक लड़की के पास अपने जीवन को लेकर फैसले लेने के विकल्प बेहद सीमित थे।
मायके लौटने के बाद भी उनके संघर्ष खत्म नहीं हुए। जमीन के विवाद और गांव की राजनीति के बीच फूलन का पुलिस और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से टकराव बढ़ता गया।
चंबल के बीहड़ों तक पहुंचने की कहानी
1970 के दशक के अंत तक फूलन का जीवन उन्हें चंबल और यमुना के बीहड़ों की दुनिया तक ले गया। डकैत गिरोहों से उनके जुड़ने की कहानी भी कई संस्करणों में मिलती है।

एक प्रचलित विवरण के मुताबिक, फूलन का अपहरण डकैत बाबू गुज्जर के गिरोह ने किया था। बाद में गिरोह के सदस्य विक्रम मल्लाह ने बाबू गुज्जर की हत्या कर दी और फूलन उसके साथ रहने लगीं। विक्रम के साथ फूलन ने डकैत गिरोह की गतिविधियों में हिस्सा लिया।
विक्रम मल्लाह और ठाकुर समुदाय से जुड़े श्रीराम और लाला राम के बीच गिरोह के नियंत्रण को लेकर संघर्ष हुआ। बाद में विक्रम की हत्या कर दी गई और फूलन को बेहमई ले जाया गया। फूलन के अपने बयान और उनके जीवन पर आधारित कई विवरणों में आरोप लगाया गया कि वहां उनके साथ सामूहिक बलात्कार और अमानवीय व्यवहार हुआ। हालांकि बेहमई के स्थानीय लोगों और कुछ अन्य पक्षों ने इन घटनाओं के कुछ हिस्सों को चुनौती दी है।
यही विवादित और हिंसक दौर आगे चलकर फूलन देवी की जिंदगी की सबसे चर्चित घटना की पृष्ठभूमि बना।
1981 का बेहमई कांड
14 फरवरी 1981 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात क्षेत्र के बेहमई गांव में वह घटना हुई जिसने फूलन देवी का नाम पूरे देश में पहुंचा दिया।
उस दिन हथियारबंद गिरोह गांव में पहुंचा। प्रत्यक्षदर्शियों और बाद में सामने आए विवरणों के अनुसार, गिरोह ने गांव के पुरुषों को उनके घरों से बाहर निकाला। कई लोगों को एक जगह इकट्ठा किया गया और इसके बाद गोलीबारी हुई।
इस घटना में 20 पुरुषों की मौत हुई। मृतकों में ज्यादातर राजपूत समुदाय से थे। लंबे समय तक इसे 22 लोगों की हत्या के रूप में भी रिपोर्ट किया जाता रहा, लेकिन अदालत में चले मामले और बाद के दस्तावेजों में 20 मौतों का आंकड़ा सामने आया।

इस हत्याकांड को फूलन के साथ कथित सामूहिक बलात्कार का बदला बताया गया। लेकिन पुलिस और स्थानीय लोगों की ओर से एक दूसरा दावा भी सामने आया कि फूलन और उनके साथियों का मकसद प्रतिद्वंद्वी डकैतों लाला राम और श्रीराम को ढूंढना था, जो कथित तौर पर बेहमई में छिपे थे।
43 साल बाद आया फैसला
बेहमई हत्याकांड का मुकदमा दशकों तक जारी रहा। मामले में सुनवाई को दौरान अदालत ने कुल 35 लोगों को आरोपी माना। इनमें से कई आरोपी पुलिस मुठभेड़ या मुकदमे के दौरान मारे गए। फूलन देवी खुद इस मामले में मुकदमे का सामना नहीं कर सकीं क्योंकि 1994 में जेल से उनकी रिहाई हो गई थी।
14 फरवरी 2024 को इस घटना के 43 साल बाद कानपुर देहात की अदालत ने आरोपी श्याम बाबू को उम्रकैद की सजा सुनाई। एक अन्य आरोपी, जिसे घटना के समय नाबालिग माना गया था, को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। यह बेहमई मामले में पहली दोषसिद्धि थी।
आत्मसमर्पण और जेल की जिंदगी
बेहमई के बाद फूलन देवी चंबल के बीहड़ों में एक कुख्यात नाम बन गईं। पुलिस उनके पीछे थी और उनके गिरोह की तलाश लगातार जारी थी।
आखिरकार 1983 में फूलन देवी ने मध्य प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण किया। उनका आत्मसमर्पण उस समय राष्ट्रीय स्तर की बड़ी खबर बना।
इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया। करीब 11 वर्षों तक वह जेल में रहीं और इस दौरान उनके खिलाफ दर्ज मामलों में मुकदमे की प्रक्रिया पूरी तरह आगे नहीं बढ़ सकी।
फूलन की कहानी में यह दौर बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि बीहड़ों की ‘बागी’ महिला अब राज्य की हिरासत में थी। एक तरफ उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप थे, दूसरी तरफ पिछड़े और वंचित समुदायों के एक हिस्से में उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी।
1994 में बदली जिंदगी
1994 में उत्तर प्रदेश की राजनीति ने फूलन देवी के जीवन की दिशा बदल दी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उनके खिलाफ कई मामलों को वापस लेने का फैसला किया और इसके बाद फूलन जेल से बाहर आईं। बेहमई मामले में भी उनके खिलाफ कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी।

जेल से बाहर आने के बाद फूलन ने अपनी सार्वजनिक छवि को एक नए रूप में पेश करना शुरू किया। अब वह हथियार लेकर बीहड़ों में घूमने वाली डकैत नहीं थीं। अब उन्होंने राजनीति की दिशा में गे बढ़ने का फैसला कर लिया था।
वह समाजवादी पार्टी में शामिल हुईं और गरीबों, पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली नेता के रूप में सामने आईं।
संसद तक पहुंची ‘बैंडिट क्वीन’
1996 का लोकसभा चुनाव फूलन देवी के जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
एक समय जिस महिला को पुलिस पूरे देश में तलाश रही थी, वही कुछ वर्षों बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए संसद पहुंच गई। यह भारतीय राजनीति की उन असाधारण घटनाओं में शामिल है जहां अपराध, सामाजिक पहचान, जाति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक ही कहानी में दिखाई देते हैं।

फूलन देवी ने संसद में महिलाओं और गरीबों के मुद्दे उठाने की कोशिश की। उनके समर्थकों के लिए वह उस तबके की आवाज थीं जिसे लंबे समय से सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा से दूर रखा गया था।
1998 में वह मिर्जापुर सीट से चुनाव हार गईं, लेकिन 1999 में उन्होंने दोबारा चुनाव जीत लिया और अपनी मृत्यु तक लोकसभा सांसद रहीं।
राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान तक का सफर
फूलन देवी की जिंदगी पर किताबें लिखी गईं और 1994 में शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ रिलीज हुई, जिसमें सीमा बिस्वास ने उनकी भूमिका निभाई।
फिल्म ने फूलन की कहानी को भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में ला दिया। हालांकि फूलन देवी खुद फिल्म के चित्रण से संतुष्ट नहीं थीं। उनकी जिंदगी को लेकर लिखी गई किताबों और फिल्म में उनके अनुभवों को लेकर कई विवाद रहे।
फूलन देवी की हत्या ने देश को झकझोर दिया
फूलन देवी की जिंदगी का अंत भी उतना ही हिंसक था जितना उनका अतीत। 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली स्थित उनके आवास के बाहर उन पर गोलीबारी की गई। वह उस समय लोकसभा की मौजूदा सदस्य थीं। हमलावरों ने उन पर गोलियां चलाईं और उनकी मौके पर ही मौत हो गई। उनकी उम्र सिर्फ 37 वर्ष थी।

हत्या के कुछ समय बाद शेर सिंह राणा ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और दावा किया कि उसने बेहमई हत्याकांड का बदला लेने के लिए फूलन देवी की हत्या की थी।

बाद में राणा को इस हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया। फूलन देवी की हत्या ने देश में जाति, बदला और राजनीति के संबंध को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी।
आज भी प्रासंगिक है फूलन देवी की कहानी?
फूलन देवी की कहानी को 2026 में सिर्फ एक पूर्व डकैत या पूर्व सांसद के रूप में याद करना उचित नहीं होगा। उनकी जिंदगी भारत में मौजूद सामाजिक असमानताओं के उन सवालों की ओर भी ध्यान खींचती है जो आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
भारतीय संविधान समानता और भेदभाव के खिलाफ स्पष्ट सुरक्षा देता है। इसके बावजूद जाति आधारित भेदभाव, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं आज भी सामने आती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2023 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 57,789 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ 12,960 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि कानूनी संरक्षण के बावजूद सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों के खिलाफ अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
भेदभाव सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं है। गांवों में सामाजिक दूरी, जाति के आधार पर अपमान, जमीन और संसाधनों को लेकर संघर्ष, शिक्षा और रोजगार में असमान अवसर तथा सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े पूर्वाग्रह आज भी कई समुदायों के अनुभव का हिस्सा हैं।
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