1983 विश्व कप जीत के पीछे कपिल देव की कहानी तो सब जानते हैं, लेकिन क्या आप उस शख्स को जानते हैं जिसकी सोच ने 1987 का विश्व कप भारत में आयोजित कराया।
नई दिल्ली: 25 जून 1983, लंदन के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर भारतीय क्रिकेट टीम ने दो बार की विश्व चैंपियन वेस्टइंडीज को हराकर ऐसा इतिहास रचा। इस जीत की गूंज आज 43 साल बाद भी सभी भारतीयों के दिल में सुनाई देती है।
ये ही वा पल था जिसने 10 साल के सचिन तेंदुलकर को भी भारत के लिए विश्व कप जीतने की प्रेरणा दी। इस जीत ने कपिल देव और उनकी टीम को अमर बना दिया।
लेकिन इसी विश्व कप से जुड़ी एक और कहानी है, जो शायद उतनी चर्चित नहीं है। यह कहानी है तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष एन.के.पी. साल्वे की, जिनकी दूरदृष्टि ने सिर्फ भारतीय क्रिकेट ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व क्रिकेट का भविष्य बदल दिया।
आज भारत की 1983 विश्व कप जीत के 43 साल पूरे हो गए हैं। ऐसे में उस जीत के साथ-साथ उस व्यक्ति को याद करना भी जरूरी है, जिसने यह सुनिश्चित किया कि क्रिकेट का सबसे बड़ा टूर्नामेंट हमेशा इंग्लैंड की जागीर बनकर न रह जाए।
अगर कपिल देव ने मैदान पर विश्व कप जीता था, तो NKP Salve ने प्रशासनिक मोर्चे पर वह लड़ाई जीती, जिसने विश्व क्रिकेट की सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर मोड़ दिया।
जब विश्व कप सिर्फ इंग्लैंड का टूर्नामेंट था
आज क्रिकेट विश्व कप दुनिया के अलग-अलग देशों में आयोजित होता है, लेकिन 1980 के दशक की शुरुआत तक स्थिति बिल्कुल अलग थी। 1975, 1979 और 1983 तीनों विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित हुए थे।
उस समय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का दबदबा था। क्रिकेट की बड़ी नीतियां और निर्णय लगभग उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते थे। भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय हो रहा था, लेकिन वैश्विक प्रशासन में उनकी आवाज उतनी प्रभावशाली नहीं थी।
NKP Salve इस व्यवस्था को करीब से देख रहे थे। उन्हें लगता था कि क्रिकेट का भविष्य एशिया में है। यहां दर्शकों की संख्या अधिक थी, खेल के प्रति जुनून था और बाजार भी तेजी से विकसित हो रहा था। लेकिन विश्व कप जैसे बड़े आयोजन का अधिकार अभी भी इंग्लैंड तक सीमित था।
1983 का विश्व कप उनके लिए सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं था, बल्कि वह मंच था जहां उन्होंने इस असमानता को और स्पष्ट रूप से महसूस किया।
वह टिकट विवाद जिसने सोच बदल दी
1983 विश्व कप फाइनल से जुड़ी एक घटना आज भी क्रिकेट इतिहास में चर्चा का विषय बनी हुई है। विभिन्न स्रोतों में इसके अलग-अलग संस्करण मिलते हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि फाइनल के दौरान अतिरिक्त टिकटों को लेकर NKP Salve को निराशा का सामना करना पड़ा।
कहा जाता है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल और उनके करीबी लोगों के लिए अतिरिक्त टिकटों की व्यवस्था नहीं हो सकी। कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उनकी पत्नी के लिए टिकट मांगा गया था, जो उपलब्ध नहीं कराया गया।
यह घटना सुनने में मामूली लग सकती है, लेकिन साल्वे के लिए यह सिर्फ टिकट का मामला नहीं था। उनके लिए यह उस मानसिकता का प्रतीक था, जिसमें क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर एशियाई देशों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता था।
उसी समय उनके मन में एक विचार ने आकार लेना शुरू किया अगर भारत विश्व कप जीत सकता है, तो विश्व कप की मेजबानी क्यों नहीं कर सकता?
भारत की जीत और एक नए सपने की शुरुआत
25 जून 1983 को जब भारत ने वेस्टइंडीज को 43 रन से हराकर विश्व कप जीता, तो पूरी दुनिया चौंक गई। लेकिन जहां अधिकांश लोग इस जीत का जश्न मना रहे थे, वहीं साल्वे भविष्य की योजना बना रहे थे।
उन्होंने महसूस किया कि यह जीत भारतीय क्रिकेट के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। अगर इस लहर का सही इस्तेमाल किया जाए, तो भारत विश्व क्रिकेट में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
उस समय बहुत कम लोग कल्पना कर सकते थे कि सिर्फ चार साल बाद विश्व कप पहली बार इंग्लैंड से बाहर आयोजित होगा।
आसान नहीं था इंग्लैंड से विश्व कप छीनना
1980 के दशक में विश्व कप को इंग्लैंड से बाहर ले जाने का विचार बेहद साहसिक माना जाता था। उस समय क्रिकेट प्रशासन पर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का दबदबा था, जबकि भारत और पाकिस्तान को बड़े आयोजन के लिए पर्याप्त सक्षम नहीं समझा जाता था।
आलोचक प्रसारण सुविधाओं, बुनियादी ढांचे और यात्रा व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते थे। लेकिन एन.के.पी. साल्वे का मानना था कि क्रिकेट का भविष्य एशिया में है, और इसी सोच के साथ उन्होंने स्थापित धारणाओं को चुनौती देने का फैसला किया।
पाकिस्तान के साथ बनी ऐतिहासिक साझेदारी
NKP Salve जानते थे कि विश्व कप की मेजबानी इंग्लैंड से बाहर लाने की लड़ाई भारत अकेले नहीं जीत सकता। इसलिए उन्होंने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के साथ मिलकर संयुक्त मेजबानी का प्रस्ताव तैयार किया। उस दौर में दोनों देशों के राजनीतिक संबंध तनावपूर्ण थे, लेकिन क्रिकेट के हितों ने उन्हें एक मंच पर ला खड़ा किया।
साल्वे का मानना था कि यदि क्रिकेट को वास्तव में वैश्विक खेल बनाना है, तो विश्व कप को नए क्षेत्रों तक पहुंचाना होगा। धीरे-धीरे यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान का नहीं, बल्कि पूरे एशियाई क्रिकेट का साझा अभियान बन गया।
धीरूभाई अंबानी और कॉर्पोरेट समर्थन
एन.के.पी. साल्वे की योजना को सफल बनाने में उद्योग जगत का सहयोग भी अहम साबित हुआ। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के संस्थापक Dhirubhai Ambani ने टूर्नामेंट के प्रायोजन में रुचि दिखाई, जिससे आईसीसी का भरोसा बढ़ा कि भारत और पाकिस्तान विश्व कप का सफल आयोजन कर सकते हैं।
इसी साझेदारी के चलते 1987 का टूर्नामेंट “रिलायंस वर्ल्ड कप” कहलाया। उस दौर में खेल और कॉर्पोरेट जगत का यह मेल एक बड़ी और नई पहल माना गया।
जब ICC को माननी पड़ी बात
कई वर्षों की रणनीति, कूटनीति और लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार आईसीसी ने 1987 विश्व कप की मेजबानी भारत और पाकिस्तान को सौंप दी। यह फैसला सिर्फ मेजबानी बदलने का नहीं, बल्कि विश्व क्रिकेट की सोच बदलने का भी था।
पहली बार विश्व कप इंग्लैंड से बाहर आयोजित होने वाला था, जिसने क्रिकेट के पारंपरिक सत्ता-केंद्र को चुनौती दी। इस निर्णय ने साबित कर दिया कि एशिया भी इतने बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक आयोजित कर सकता है।
कई क्रिकेट इतिहासकार मानते हैं कि यहीं से विश्व क्रिकेट का आर्थिक और प्रशासनिक झुकाव धीरे-धीरे एशिया, खासकर भारत, की ओर बढ़ना शुरू हुआ।
मेजबान भारत ने 1987 विश्व कप में शानदार खेल दिखाते हुए ग्रुप चरण में 6 में से 5 मैच जीते और सेमीफाइनल तक पहुंचा। हालांकि मुंबई में खेले गए सेमीफाइनल में इंग्लैंड ने भारत को 35 रन से हराकर लगातार दूसरे फाइनल में पहुंचने का सपना तोड़ दिया।
8 नवंबर 1987 को कोलकाता के ईडन गार्डन्स में खेले गए फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 7 रन से हराकर अपना पहला क्रिकेट विश्व कप खिताब जीता। पहले बल्लेबाजी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने 253/5 रन बनाए। जवाब में इंग्लैंड की टीम 246/8 रन ही बना सकी। ऑस्ट्रेलिया के लिए डेविड बून ने 75 रन बनाए, जबकि कप्तान Allan Border ने टीम को ऐतिहासिक जीत दिलाई।
साल्वे की विरासत सिर्फ 1987 तक सीमित नहीं है
1987 विश्व कप सफल रहा। स्टेडियम भरे, दर्शकों का उत्साह देखने लायक था और आयोजन ने आईसीसी की कई धारणाओं को बदल दिया।
इसके बाद 1996 विश्व कप भी उपमहाद्वीप में आयोजित हुआ। फिर 2011 में भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश ने संयुक्त मेजबानी की।
धीरे-धीरे क्रिकेट का आर्थिक केंद्र एशिया बन गया। प्रसारण अधिकारों से लेकर प्रायोजन तक, भारत दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट बाजार बन गया। इन सभी बदलावों की शुरुआती नींव 1983 और 1987 के बीच रखी गई थी।
1983 विश्व कप की से जुड़ी कुछ रोचक कहानियां भी हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
1. कपिल देव की 175 रन की पारी, जो कभी प्रसारित ही नहीं हुई
18 जून 1983 को टनब्रिज वेल्स में जिम्बाब्वे के खिलाफ भारत का मैच था।
स्कोरबोर्ड पर सिर्फ 17 रन थे और पांच विकेट गिर चुके थे। गावस्कर, श्रीकांत, अमरनाथ, संदीप पाटिल और यशपाल शर्मा आउट हो चुके थे। भारत का विश्व कप अभियान लगभग समाप्त माना जा रहा था।
तभी कप्तान कपिल देव ने इतिहास की सबसे महान वनडे पारियों में से एक खेली। उन्होंने 138 गेंदों में नाबाद 175 रन बनाए और भारत को 266/8 तक पहुंचा दिया। भारत ने मैच जीत लिया और सेमीफाइनल की दौड़ में बना रहा।
दिलचस्प बात यह है कि यह पारी आज भी क्रिकेट की सबसे मशहूर “अनदेखी” पारियों में गिनी जाती है। दरअसल, उस दिन BBC के तकनीकी कर्मचारियों की हड़ताल थी, इसलिए मैच का प्रसारण रिकॉर्ड नहीं हो पाया। दुनिया ने इस पारी के बारे में पढ़ा, लेकिन उसे कभी देख नहीं सकी।
2. जब डेविड फ्रिथ को अपने शब्द खाने पड़े
विश्व कप से पहले इंग्लैंड के प्रसिद्ध क्रिकेट पत्रकार डेविड फ्रिथ ने भारत की संभावनाओं पर सवाल उठाए थे। उन्होंने लिखा था कि भारत का प्रदर्शन इतना कमजोर है कि भविष्य में उसे क्वालिफाइंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए एक कागज पर लिखा कि यदि भारत यह विश्व कप जीतती है, तो वे अपने ये शब्द खाएंगे।
लेकिन जब भारत विश्व चैंपियन बन गया तो उनकी भविष्यवाणी पूरी तरह गलत साबित हुई। बाद में एक पाठक ने उन्हें पत्र लिखकर कहा कि उन्हें अपने शब्द “खाने” चाहिए।
इसके बाद फ्रिथ ने अपने लिखे हुए शब्दों वाला कागज खाते हुए तस्वीर प्रकाशित करवाई। यह घटना आज भी क्रिकेट पत्रकारिता के सबसे यादगार किस्सों में शामिल है।
3. जब लता मंगेशकर खिलाड़ियों के लिए बनीं सहारा
आज BCCI दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है, लेकिन 1983 में स्थिति बिल्कुल अलग थी। विश्व कप जीतने के बाद खिलाड़ियों को बड़ा पुरस्कार देने के लिए बोर्ड के पास पर्याप्त धन नहीं था।
तब स्वर कोकिला लता मंगेशकर आगे आईं। 17 अगस्त 1983 को उन्होंने दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में एक विशेष संगीत कार्यक्रम किया। उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए कोई शुल्क नहीं लिया।
कार्यक्रम से जुटाई गई लगभग 20 लाख रुपये की राशि का उपयोग विश्व कप विजेता टीम को सम्मानित करने के लिए किया गया। खिलाड़ियों और टीम मैनेजर पी.आर. मानसिंह को एक-एक लाख रुपये दिए गए।
एक जीत जिसने दो इतिहास रचे
1983 की विश्व कप जीत ने भारत को पहली बार विश्व चैंपियन बनाया, लेकिन इसकी गूंज मैदान से कहीं आगे तक पहुंची। इसी सफलता ने NKP Salve को विश्व क्रिकेट की पुरानी व्यवस्था को चुनौती देने का अवसर दिया।
उनके प्रयासों से 1987 में विश्व कप पहली बार इंग्लैंड से बाहर भारत और पाकिस्तान पहुंचा। इस तरह 1983 की जीत ने सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि क्रिकेट के वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी बदलने की नींव रखी।
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