नई दिल्ली: आज भी ज्यादातर वित्तीय लेनदेन बैंक, ब्रोकर या किसी अन्य संस्था के जरिए होते हैं। ये संस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि पैसा कहां से आया, कहां गया और पूरे लेनदेन का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे । परंपरागत रूप से, इस व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया है कि वित्तीय गतिविधियों की निगरानी और जांच हो सके। लेकिन डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ वित्तीय सेवाओं का एक नया मॉडल तेजी से उभर रहा है, जहां किसी पारंपरिक मध्यस्थ की जरूरत नहीं पड़ती।
केवल एक डिजिटल वॉलेट को ब्लॉकचेन आधारित प्लेटफॉर्म से जोड़कर लोग उधार ले सकते हैं, उधार दे सकते हैं या डिजिटल परिसंपत्तियों का लेनदेन कर सकते हैं। यदि किसी को उधार देना हो, तो स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट स्वतः आपको एक उधारकर्ता से जोड़ता है और शर्तें पूरी होने पर ब्याज भुगतान भी आपके पास स्थानांतरित कर देता है।
इसी व्यवस्था को डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (DeFi) कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षों में इसका दायरा तेजी से बढ़ा है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में DeFi प्लेटफॉर्म पर लॉक की गई परिसंपत्तियों का कुल मूल्य लगभग 86.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो 2023 की तुलना में करीब 85 प्रतिशत अधिक है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि सीमाओं के पार भी वित्तीय सेवाएं तेज, पारदर्शी और अपेक्षाकृत आसान हो जाती हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति इन सेवाओं तक पहुंच बना सकता है।
लेकिन DeFi की यही तेजी नियामकों के सामने एक नई चुनौती भी पेश कर रही है। जब कोई वित्तीय सेवा बैंक या किसी संस्था के बजाय केवल कंप्यूटर कोड और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट के जरिए संचालित हो रही हो, तो किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या अवैध गतिविधि की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
FATF की रिपोर्ट एक अहम टिप्पणी करती है, जो इस सवाल को और जटिल बना देती है: तकनीक भले ही विकेंद्रीकृत हो, लेकिन उस पर नियंत्रण हमेशा विकेंद्रीकृत नहीं होता। रिपोर्ट का कहना है कि तकनीक भले ही विकेंद्रीकृत हो, लेकिन उसका नियंत्रण हमेशा पूरी तरह विकेंद्रीकृत नहीं होता। कई DeFi प्लेटफॉर्म पर डेवलपर, गवर्नेंस टोकन धारक, निवेशक या प्लेटफॉर्म तक पहुंच देने वाली कंपनी ऐसे फैसले लेने की स्थिति में होती है, जो पूरे सिस्टम के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। यानी तकनीक भले “डिसेंट्रलाइज्ड” दिखे, लेकिन उसका प्रभावी नियंत्रण कुछ पहचान योग्य लोगों या संस्थाओं के हाथों में हो सकता है।
इसी आधार पर FATF ने नियामकों से कहा है कि वे केवल तकनीक को देखकर निर्णय न लें, बल्कि यह समझें कि किसी DeFi व्यवस्था पर वास्तविक नियंत्रण किसके पास है। जहां किसी DeFi व्यवस्था पर पहचान योग्य लोगों का प्रभावी नियंत्रण हो, वहां उन व्यक्तियों या संस्थाओं को मौजूदा एंटी मनी लॉन्ड्रिंग (AML) नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए। इसमें डेवलपर, गवर्नेंस टोकन धारक, निवेशक या अन्य ऐसे पक्ष शामिल हो सकते हैं, जिनकी भूमिका प्लेटफॉर्म के संचालन में महत्वपूर्ण हो। जहां ऐसी व्यवस्थाएं वित्तीय सेवाएं दे रही हैं, वहां लाइसेंस या पंजीकरण जैसी आवश्यकताओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट केवल जवाबदेही तय करने तक सीमित नहीं है। नियामकों को बैंकों, वर्चुअल एसेट सेवा प्रदाताओं (VASPs) और DeFi से जुड़े अन्य संस्थानों को मार्गदर्शन देना चाहिए, साथ ही अवैध वित्तीय गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ब्लॉकचेन एनालिटिक्स और डिजिटल पहचान जैसी नई तकनीकों का उपयोग भी तलाशना चाहिए।ब्लॉकचेन एनालिटिक्स और डिजिटल पहचान जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल भी अवैध वित्तीय गतिविधियों पर नजर रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।
हालांकि FATF यह भी स्पष्ट करता है कि हर DeFi व्यवस्था को पारंपरिक बैंक या वित्तीय संस्था की तरह नियंत्रित करना व्यावहारिक नहीं होगा, क्योंकि वे मौजूदा नियमों और ढांचों में आसानी से फिट नहीं हो सकतीं। रिपोर्ट का जोर जोखिम-आधारित और व्यावहारिक नियामकीय दृष्टिकोण पर है। यानी नियमन इस आधार पर होना चाहिए कि कोई DeFi व्यवस्था वास्तव में क्या काम करती है, उस पर किसका प्रभाव है और उससे किस तरह के जोखिम पैदा हो सकते हैं, न कि केवल इस आधार पर कि वह खुद को किस रूप में पेश करती है।
FATF की यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि VDA नियमन के अगले दौर में नियामकों को अलग-अलग उत्पादों और देशों की सीमाओं से परे देखना होगा। VDA आधारित वित्तीय सेवाएं अब एक-दूसरे से पहले से कहीं अधिक जुड़ चुकी हैं। ऐसे में प्रभावी नियमन केवल मजबूत घरेलू कानूनों से संभव नहीं होगा। नियामकीय कमियों को दूर करने और वित्तीय अपराधों पर रोक लगाने के लिए देशों के बीच बेहतर समन्वय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी उतना ही जरूरी होगा।
