Sunday, 12 July 2026
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Bhoramdev Temple History: 1000 साल पुराना मंदिर, जहां पत्थरों में दर्ज है प्रेम, आस्था और आदिवासी विरासत। जानिए क्यों कहलाता है ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’?

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम में स्थित भोरमदेव मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी, आदिवासी विरासत और 1000 साल पुराने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।

नई दिल्ली/ कबीरधाम: घने जंगल, मैकाल पर्वतमाला की हरियाली, शांत झील और उनके बीच खड़ा एक हजार साल पुराना मंदिर। पहली नजर में यह किसी साधारण से शिव मंदिर जैसा लग सकता है, लेकिन जैसे-जैसे आप इसकी दीवारों को देखते हैं, पत्थरों में उकेरी गई कहानियां आपको मध्यकालीन भारत के उस दौर में ले जाती हैं जब कला, अध्यात्म और जीवन-दर्शन एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

यही है भोरमदेव मंदिर, जिसे आज “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” कहा जाता है। लेकिन यह उपाधि केवल इसकी कामकला से जुड़ी मूर्तियों की वजह से नहीं मिली। इसके पीछे इतिहास, आदिवासी संस्कृति, नागवंशी राजाओं की विरासत और स्थापत्य कला का ऐसा संगम है जो इसे भारत के सबसे अनूठे मंदिरों में शामिल करता है।

क्यों कहा जाता है “छत्तीसगढ़ का खजुराहो”?

जब कोई पहली बार भोरमदेव मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी मूर्तियों को देखता है तो उसे मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिरों का स्मरण होता है। मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं, नर्तकियों, संगीतकारों, पशु-पक्षियों और प्रेमी युगलों की बारीक नक्काशी की गई है।

विशेष रूप से कुछ मूर्तियां मानव जीवन के प्रेम और दांपत्य पक्ष को दर्शाती हैं। यही कारण है कि वर्षों से इसे “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” कहा जाता रहा है। हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि इन मूर्तियों को केवल कामुकता के नजरिए से देखना गलत होगा। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों में इन्हें जीवन के चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है।

आदिवासी आस्था का गहरा संबंध

भोरमदेव मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसका नाम किसी राजा या स्थापत्य शैली से नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासी समाज की आस्था से जुड़ा है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में रहने वाले गोंड और अन्य आदिवासी समुदाय भगवान शिव को “भोरमदेव” के रूप में पूजते थे।

समय के साथ जब यहां विशाल शिव मंदिर का निर्माण हुआ, तो स्थानीय लोगों ने इसे भोरमदेव मंदिर कहना शुरू कर दिया। इस तरह यह मंदिर शास्त्रीय हिंदू परंपरा और आदिवासी विश्वासों के अनोखे मेल का प्रतीक बन गया।

किसने बनवाया भोरमदेव मंदिर?

भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। मंदिर परिसर से मिले शिलालेखों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इसे नागवंशी शासकों से जोड़ा जाता है।

मंदिर परिसर में मौजूद एक अभिलेख राजा गोपालदेव का उल्लेख करता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि नागवंशी राजाओं ने इस क्षेत्र में मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया था। इतिहासकार मानते हैं कि उस समय दक्षिण कोसल क्षेत्र (वर्तमान छत्तीसगढ़) में नाग शासकों का प्रभाव था और उन्होंने धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जंगलों और पहाड़ों के बीच मौजूद मंदिर

जब कोई पर्यटक या श्रद्धालु भोरमदेव पहुंचते हैं तो सबसे पहले उन्हें इसकी प्राकृतिक सुंदरता आकर्षित करती है। मंदिर मैकाल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित है और चारों ओर हरियाली से घिरा हुआ है।

इतिहासकारों का मानना है कि मध्यकालीन भारत में कई शिव मंदिर प्राकृतिक और शांत स्थानों पर बनाए जाते थे ताकि साधना और आध्यात्मिक अभ्यास के लिए उपयुक्त वातावरण मिल सके।

भोरमदेव का स्थान भी इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। मंदिर के सामने जलाशय और पीछे पहाड़ियों का दृश्य इसे और भी भव्य बनाते हैं।

स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना

भोरमदेव मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि स्थापत्य कला की उत्कृष्ट कृति भी है। मंदिर पूर्वाभिमुख है और ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है। मुख्य संरचना में मंडप, अंतराल और गर्भगृह की पारंपरिक व्यवस्था दिखाई देती है। मंदिर के स्तंभों, छतों और बाहरी दीवारों पर इतनी बारीक नक्काशी की गई है कि पत्थर जीवंत प्रतीत होते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी वास्तुकला में उत्तर भारतीय नागर शैली की झलक मिलती है, लेकिन इसमें स्थानीय कलात्मक प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देते हैं।

मंदिर की दीवारों पर बनी हैं मूर्तियां

भोरमदेव मंदिर की दीवारें पत्थरों पर लिखी किसी किताब की तरह प्रतीत होती हैं। यहां शिव, विष्णु, गणेश, देवी स्वरूपों और अन्य हिंदू देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं। इसके अलावा नृत्य करती महिलाएं, संगीत वादक, योद्धा, पशु आकृतियां और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों को भी दर्शाया गया है।

आज भी जब सूरज की पहली किरण इसकी नक्काशियों पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो पत्थरों में कैद वह हजार साल पुरानी कहानी फिर से जीवंत हो उठी हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये मूर्तियां उस समय के समाज, संस्कृति और जीवन शैली की झलक प्रस्तुत करती हैं। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि ज्ञान, कला और सामाजिक मूल्यों के प्रदर्शन का माध्यम भी है।

भोरमदेव परिसर में मौजूद अन्य स्मारक

अधिकांश पर्यटक जानकारी के अभाव के कारण मुख्य भोरमदेव मंदिर देखकर ही वापस लौट जाते हैं, लेकिन वास्तव में यह पूरा क्षेत्र एक मंदिर परिसर है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां मड़वा महल (मंडवा महल) और चेरकी महल जैसे महत्वपूर्ण स्मारक भी स्थित हैं।

मड़वा महल के बारे में स्थानीय मान्यता है कि इसका संबंध नागवंशी शासक रामचंद्र देव और राजकुमारी अंबिका देवी के विवाह से था। इसी वजह से इसे विवाह मंडप जैसे स्वरूप वाला मंदिर माना जाता है।

चेरकी महल अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध है, लेकिन इसकी स्थापत्य शैली और शांत वातावरण इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है।

पुरातत्व और इतिहास का खुला संग्रहालय

भोरमदेव परिसर को कई विशेषज्ञ “ओपन-एयर म्यूजियम” (Open Air Museum) भी कहते हैं। यहां विभिन्न कालखंडों की मूर्तियां, वीरगाथा स्तंभ, खंडित प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं।

इनमें कुछ अवशेष दूसरी और तीसरी शताब्दी तक पुराने माने जाते हैं। यह तथ्य बताता है कि भोरमदेव क्षेत्र केवल एक मंदिर नहीं बल्कि सदियों से सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।

आज भी आस्था का बड़ा केंद्र

इतिहास और पर्यटन के अलावा भोरमदेव आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।

मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दर्शन के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यटक भी आते हैं। हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस क्षेत्र को धार्मिक और विरासत पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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