संसद से संवैधानिक मंजूरी के बाद फैसले का सम्मान जरूरी, केरलम विधेयक चर्चा में अमरावती का जिक्र
नई दिल्ली: राज्यसभा में बुधवार को केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ किए जाने से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान टीडीपी सांसद विजय चिंताकायला ने भाषा, संस्कृति और संवैधानिक पहचान के मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि किसी राज्य या स्थान का नाम सिर्फ पहचान नहीं होता, बल्कि उससे लोगों की सांस्कृतिक विरासत और भावनाएं भी जुड़ी होती हैं।
चिंताकायला ने कहा कि ‘केरलम’ नाम मलयालम भाषा में राज्य की पारंपरिक पहचान को दर्शाता है। उन्होंने इसे महज प्रशासनिक बदलाव के बजाय राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक मान्यता देने वाला कदम बताया।
उन्होंने भारत की विविधता को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि संघीय व्यवस्था में राज्यों की भाषा, संस्कृति और पहचान का सम्मान जरूरी है। उन्होंने टीडीपी के नाम में ‘तेलुगु’ शब्द को तेलुगु गौरव का प्रतीक बताते हुए पार्टी संस्थापक एन. टी. रामाराव के योगदान को भी याद किया।
इसी दौरान उन्होंने अमरावती का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं होते, बल्कि उनके साथ लोगों की भावनाएं और संवैधानिक महत्व भी जुड़े होते हैं।
उन्होंने अमरावती का नाम बदलकर ‘माविगुन’ किए जाने के प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब किसी फैसले को संसद की मंजूरी मिल चुकी हो और उसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो चुकी हो, तो बाद में उसे नजरअंदाज करने का प्रयास किस आधार पर किया जा सकता है।
विजय ने स्पष्ट कहा कि संसद द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मंजूर किए गए किसी निर्णय को किसी व्यक्ति या राजनीतिक हित के आधार पर नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि एक बार संसद के सर्वोच्च संवैधानिक स्तर पर फैसला हो जाने के बाद उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “जब संविधान विधेयक संसद के इस सर्वोच्च सदन से पारित हो जाता है, तो किसी को भी उसके खिलाफ नहीं जाना चाहिए। एक बार पारित हो गया, तो वह पारित हो गया।”
केरलम विधेयक का संदर्भ देते हुए विजय चिंताकायला ने कहा कि नामों के पीछे भाषा, संस्कृति और भावनाओं का गहरा संबंध हो सकता है। इसलिए संसद द्वारा संवैधानिक रूप से स्वीकृत फैसलों का सम्मान राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद किया जाना चाहिए।
टीडीपी सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में औपनिवेशिक दौर से जुड़े कई नामों को बदलने और देश की पारंपरिक जड़ों तथा विरासत को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ है।

