Tuesday, 21 July 2026
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सरकारों से बढ़ती नाराजगी, सड़कों पर युवा! दक्षिण एशिया में क्यों तेज हो रहा जन आक्रोश?

दक्षिण एशिया में सरकारों के खिलाफ युवाओं का गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के आंदोलनों से लेकर भारत के किसान और छात्र विरोध तक समझिए पूरी कहानी।

नई दिल्ली: दक्षिण एशिया की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। श्रीलंका में 2022 का अरगलाया आंदोलन (Aragalaya Movement), बांग्लादेश में 2024 का छात्र-नेतृत्व वाला जनउभार और नेपाल में 2025 का Gen Z आंदोलन, इन तमाम घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर इस क्षेत्र में जनता, खासकर युवा, पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से इतने असंतोष क्यों होते जा रहे हैं।

इन देशों में आंदोलन के कारण अलग-अलग थे, लेकिन इनके पीछे कुछ समान परिस्थितियां दिखाई देती हैं। इनमें मुख्य रूप से आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक परिवारवाद, महंगाई, कमजोर संस्थाओं पर अविश्वास और युवाओं में भविष्य को लेकर बढ़ती निराशा शामिल रही।

सोशल मीडिया ने इन असंतोषों को तेजी से संगठित करने और राष्ट्रीय आंदोलनों में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत की स्थिति अपने पड़ोसी देशों से अलग है। यहां हाल के बड़े आंदोलनों जैसे 2020-21 का किसान आंदोलन और 2026 में NEET से जुड़े छात्र विरोध ने सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए और कई मामलों में सरकार को अपने फैसलों पर पुनर्विचार भी करना पड़ा।

फिर भी, इन घटनाओं को एक साथ देखने पर दक्षिण एशिया में लोकतंत्र, शासन और जनता के बीच बदलते रिश्ते की एक बड़ी तस्वीर सामने आती है।

श्रीलंका में आर्थिक संकट से निकला अरगलाया

दक्षिण एशिया में हालिया जनविद्रोह का सबसे बड़ा उदाहरण श्रीलंका का 2022 का अरगलाया, यानी ‘संघर्ष’, आंदोलन था।

श्रीलंका उस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव था, ईंधन और खाद्य पदार्थों की कमी हो रही थी और महंगाई तेजी से बढ़ रही थी। सरकार पर भी आर्थिक कुप्रबंधन के आरोप लग रहे थे।

धीरे-धीरे लोगों का गुस्सा तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और उनके राजनीतिक परिवार के खिलाफ केंद्रित होने लगा। राजपक्षे परिवार लंबे समय से श्रीलंका की राजनीति में प्रभावशाली था और जनता के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई कि सत्ता का केंद्रीकरण और परिवारवाद देश की समस्याओं को बढ़ा रहा है।

2022 में हजारों प्रदर्शनकारी राजधानी कोलंबो की सड़कों पर उतर आए। Galle Face Green के आसपास बना ‘GotaGoGama’ प्रदर्शन स्थल आंदोलन का प्रतीक बन गया।

आंदोलन का दबाव इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने मई 2022 में इस्तीफा दिया। इसके बाद 9 जुलाई 2022 को प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति सचिवालय सहित कई प्रमुख सरकारी परिसरों में प्रवेश किया। आखिरकार गोटाबाया राजपक्षे ने देश छोड़ दिया और जुलाई 2022 में राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।

यह घटना दिखाती है कि जब आर्थिक संकट, शासन के प्रति अविश्वास और राजनीतिक असंतोष एक साथ जुड़ते हैं, तो लंबे समय से सत्ता में मौजूद नेतृत्व के खिलाफ भी व्यापक जनआंदोलन खड़ा हो सकता है।

बांग्लादेश में नौकरी के कोटे से शुरू हुआ आंदोलन

साल 2024 में बांग्लादेश का आंदोलन एक अलग परिस्थिति से शुरू हुआ।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण और कोटा व्यवस्था को लेकर छात्रों में असंतोष बढ़ा। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सरकारी नौकरियों में अवसरों का वितरण अधिक निष्पक्ष और योग्यता आधारित होना चाहिए।

जुलाई 2024 में ढाका और देश के अन्य हिस्सों में छात्र विरोध तेज हुआ। शुरुआती मांग नौकरी कोटा व्यवस्था में सुधार की थी, लेकिन पुलिस कार्रवाई, हिंसा और बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबरों के बाद आंदोलन का दायरा तेजी से बढ़ गया।

आंदोलन धीरे-धीरे प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ व्यापक जनविद्रोह में बदल गया। 5 अगस्त 2024 को Hasina ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया और देश छोड़कर भारत चली गईं। इसके बाद सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान ने अंतरिम व्यवस्था की घोषणा की और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी।

बांग्लादेश का अनुभव बताता है कि किसी आंदोलन की शुरुआत भले ही एक सीमित नीति या प्रशासनिक फैसले से हो, लेकिन यदि जनता के बीच पहले से असंतोष जमा हो, तो वह मुद्दा व्यापक राजनीतिक परिवर्तन का कारण बन सकता है।

यहां भी युवाओं और छात्रों की भूमिका निर्णायक रही। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने प्रदर्शनकारियों को तेजी से जानकारी साझा करने, विरोध की तारीख और स्थान तय करने और सरकारी नैरेटिव के समानांतर अपना संदेश फैलाने में मदद की।

नेपाल में Gen Z का गुस्सा

नेपाल में 2025 का Gen Z आंदोलन दक्षिण एशिया के नए राजनीतिक पैटर्न को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

यह आंदोलन सोशल मीडिया पर सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध से तेज हुआ, लेकिन इसके पीछे युवाओं में पहले से मौजूद व्यापक असंतोष भी था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक अस्थिरता और पुराने राजनीतिक नेतृत्व से निराशा ने आंदोलन को व्यापक समर्थन दिया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन तेज हुए। Gen Z प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाबदेही के मुद्दे उठाए। आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई में युवाओं की मौत और हिंसा ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।

आखिरकार ओली ने सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद नेपाल में राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई और आगे चलकर युवा मतदाताओं के समर्थन से नई राजनीतिक ताकतों को बढ़त मिली।

2026 में नेपाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। पूर्व रैपर और Kathmandu के पूर्व मेयरबालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने।

नेपाल का मामला यह बताता है कि Gen Z केवल विरोध करने वाली पीढ़ी नहीं है। कई मामलों में वह चुनावी राजनीति के जरिए भी पारंपरिक राजनीतिक दलों को चुनौती देने की कोशिश कर रही है।

भारत में सरकारें नहीं गिरीं, लेकिन आंदोलनों ने फैसले जरूर बदले

भारत को श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के साथ सीधे समान रखना सही नहीं होगा। भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं और चुनावी व्यवस्था अलग पैमाने पर काम करती हैं और हालिया बड़े आंदोलनों के बावजूद केंद्र सरकार सत्ता में बनी रही है। फिर भी, भारत में सरकार की नीतियों के खिलाफ बड़े जनआंदोलन हुए हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2020-21 का किसान आंदोलन है। केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक प्रदर्शन किया। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के किसानों ने आंदोलन में भाग लिया।

26 नवंबर 2020 से शुरू हुआ यह आंदोलन लगभग एक साल तक चला। दिल्ली की सीमाओं पर सिंघु, टीकरी और गाजीपुर प्रमुख विरोध स्थलों में बदल गए।

आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। संसद ने दिसंबर 2021 में कानूनों को निरस्त कर दिया। इस आंदोलन ने यह दिखाया कि लंबे और संगठित जनदबाव के कारण सरकार को बड़े नीतिगत फैसले पर पीछे हटना पड़ सकता है।

2026 में भी किसान संगठन अलग-अलग नीतिगत मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संभावित कृषि प्रभावों के खिलाफ किसानों का विरोध यह दर्शाता है कि कृषि नीति आज भी भारतीय राजनीति में बेहद संवेदनशील मुद्दा है।

NEET विवाद और छात्रों का बढ़ता गुस्सा

2026 में NEET-UG परीक्षा को लेकर पेपर लीक के आरोप, ग्रेस मार्क्स, असामान्य रूप से ऊंचे अंक और परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं ने देशभर के छात्रों और अभिभावकों के बीच गुस्सा पैदा किया।

NEET जैसी परीक्षा लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी होती है। इसलिए जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो इसका असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। यह युवाओं के उस भरोसे को प्रभावित करता है कि मेहनत और योग्यता के आधार पर उन्हें अवसर मिलेगा।

इस मामले में छात्रों और विपक्षी दलों के विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा। अदालत ने परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े कई पहलुओं पर सुनवाई की और सरकार तथा National Testing Agency को जवाबदेह बनाया।

आखिर Gen Z आंदोलनों को इतना प्रभावी कैसे बना रहे हैं?

दक्षिण एशिया में Gen Z की भूमिका को केवल ‘युवा प्रदर्शनकारी’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी ताकत उसका डिजिटल नेटवर्क है।

पहले किसी आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन या बड़े संगठनों की आवश्यकता होती थी। अब Instagram, Facebook, YouTube, TikTok, X और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म आंदोलन के संदेश को कुछ घंटों में हजारों और लाखों लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

ORF के विश्लेषण के अनुसार, दक्षिण एशिया के हालिया युवा आंदोलनों में नेतृत्व का पारंपरिक ढांचा कमजोर रहा है और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने आंदोलनकारी समूहों को तेजी से संगठित करने में मदद की।

आर्थिक संकट जनआक्रोश का सबसे बड़ा कारण

दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में युवाओं की संख्या बड़ी है। लेकिन युवा आबादी तभी जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) बनती है जब उसके पास शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसर हों।

यदि युवा शिक्षित है लेकिन नौकरी नहीं है, तो जनसांख्यिकीय लाभ निराशा में बदल सकता है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में 15-34 आयु वर्ग की आबादी का हिस्सा काफी बड़ा है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार के बीच कौशल का अंतर, सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता और सीमित आर्थिक विविधीकरण युवाओं की उम्मीदों और वास्तविक अवसरों के बीच दूरी पैदा करते हैं। यही अंतर धीरे-धीरे राजनीतिक असंतोष में बदलता है।

जब युवा देखता है कि नौकरी पाने के लिए प्रतियोगिता बढ़ रही है, महंगाई उसकी आय को खा रही है और राजनीतिक संपर्क रखने वालों को बेहतर अवसर मिलते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उसका भरोसा कमजोर हो सकता है।

क्या यह South Asian Spring है?

कुछ विश्लेषक इन घटनाओं को ‘Asian Spring’ या ‘South Asian Spring’ जैसे शब्दों से जोड़ रहे हैं। यह शब्द अरब स्प्रिंग की तरह किसी एक संगठित क्षेत्रीय आंदोलन का आधिकारिक नाम नहीं है, बल्कि अलग-अलग देशों में हुए युवा-नेतृत्व वाले जनआंदोलनों के बीच समानताओं को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में आंदोलन के कारण अलग-अलग थे—श्रीलंका में आर्थिक संकट, बांग्लादेश में नौकरी कोटा और राजनीतिक असंतोष, नेपाल में सोशल मीडिया प्रतिबंध और भ्रष्टाचार विरोधी गुस्सा। लेकिन इन सबके बीच एक साझा भावना पुराने राजनीतिक ढांचे से असंतोष और जवाबदेही की मांग थी।

भारत में भी किसानों, छात्रों और युवाओं के आंदोलनों ने यह दिखाया है कि जनता अब नीतिगत फैसलों पर पहले की तुलना में अधिक सक्रिय प्रतिक्रिया देती है।

क्या सरकार गिरना ही आंदोलन की सफलता है?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी आंदोलन के बाद सरकार गिर जाती है, तो उसे तत्काल सफलता के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन सरकार बदलना और व्यवस्था बदलना दो अलग चीजें हैं।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में राजनीतिक नेतृत्व बदलने के बाद भी आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और संस्थागत सुधार जैसी समस्याएं खत्म नहीं हुईं।

इन देशों की नई सरकारों को अब उसी जनता की उम्मीदों को पूरा करने की चुनौती है जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। मजबूत जनादेश अपने आप राजनीतिक स्थिरता की गारंटी नहीं देता।

इसका मतलब है कि दक्षिण एशिया में असली चुनौती केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में भरोसा वापस लाना है।

ये भी पढ़ें :- UK Electricity Bill Relief: पद संभालते ही PM एंडी बर्नहम का पहला बड़ा फैसला, ब्रिटेन में बिजली बिल पर VAT खत्म करने का ऐलान

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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