मराठी अस्मिता से हिंदुत्व की राजनीति तक, शिवसेना ने छह दशकों में कई उतार-चढ़ाव देखे। जानिए 60 साल की इसकी पूरी राजनीतिक यात्रा।
मुंबई: भारत की राजनीति में कुछ दल चुनाव जीतने के लिए याद किए जाते हैं, कुछ विचारधारा के लिए और कुछ अपने आंदोलनों के लिए। लेकिन कुछ राजनीतिक दल ऐसे भी हैं जिनकी कहानी केवल राजनीति की नहीं, बल्कि पहचान, क्षेत्रीय अस्मिता, विद्रोह, करिश्माई नेतृत्व और लगातार बदलते समीकरणों की कहानी होती है। Shiv Sena उन्हीं दलों में से एक है।
19 जून 1966 को एक ऐसे संगठन की नींव रखी गई, जो शुरुआत में मराठी युवाओं के रोजगार और क्षेत्रीय पहचान की आवाज बनने का दावा करता था। अगले छह दशकों में यही संगठन महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे प्रभावशाली शक्ति केंद्र बना।
एक ऐसी पार्टी, जिसने मुंबई महानगरपालिका पर दशकों तक शासन किया, जो हिंदुत्व की राजनीति का बड़ा चेहरा बनी। जिसने महाराष्ट्र में सरकार बनाई और फिर अपने इतिहास के सबसे बड़े विभाजन का सामना भी किया।
आज Shiv Sena की स्थापना के 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन छह दशकों में पार्टी ने जितनी सफलताएं देखीं, उतने ही संघर्ष और विद्रोह भी झेले।
एक कार्टूनिस्ट से शुरू हुई कहानी
Shiv Sena की स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने की थी। दिलचस्प बात यह है कि बाल ठाकरे ने अपना सार्वजनिक जीवन एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया था।
वे अपने तीखे राजनीतिक कार्टूनों के लिए जाने जाते थे। बाद में उन्होंने साप्ताहिक पत्रिका ‘मार्मिक’ शुरू की। इसी पत्रिका के माध्यम से उन्होंने लगातार मुंबई में मराठी युवाओं के रोजगार का मुद्दा उठाया। साथ ही उनका मानना था कि बाहरी राज्यों से आने वाले लोग महाराष्ट्र में नौकरियों पर कब्जा कर रहे हैं।
1960 के दशक में तेजी से बदलती मुंबई में यह मुद्दा कई युवाओं के बीच लोकप्रिय होने लगा। इसी माहौल में 19 जून 1966 को शिवसेना का जन्म हुआ।
नाम में छिपा गहरा संदेश
पार्टी का नाम मराठा साम्राज्य के संस्थापक और महाराष्ट्र के गौरव माने जाने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर रखा गया।
शुरुआती दौर में Shiv Sena का मुख्य नारा था “मराठी मानूस” था।
पार्टी स्वयं को महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती थी। पार्टी का फोकस मुख्य रूप से रोजगार, स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता पर था।
कैसे मिली पहली बड़ी पहचान?
1960 और 70 के दशक में मुंबई देश का सबसे बड़ा औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र बन रही थी।
Shiv Sena ने स्थानीय युवाओं की नाराजगी को संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। पार्टी ने कई बार आक्रामक आंदोलन भी किए, जिनकी वजह से वह तेजी से चर्चा में आई। इसी दौर में “शिव सैनिक” शब्द लोकप्रिय हुआ।
बाल ठाकरे के भाषण तब के बाकी नेताओं से अलग होते थे। उनके सीधे, तीखे और विवादास्पद बयानों की शैली हजारों समर्थकों को आकर्षित करती थी।
मुंबई महानगरपालिका बनी शक्ति का केंद्र
Shiv Sena की सबसे बड़ी ताकत विधानसभा नहीं, बल्कि मुंबई की स्थानीय राजनीति बनी। पार्टी ने धीरे-धीरे बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) में अपना प्रभाव बढ़ाया।
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में BMC पर शिवसेना का नियंत्रण मजबूत हो गया। बाद में यह नियंत्रण इतना मजबूत हुआ कि कई दशकों तक पार्टी को मुंबई की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत माना जाने लगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BMC पर पकड़ ने ही शिवसेना को आर्थिक और संगठनात्मक मजबूती दी।
हिंदुत्व की ओर बड़ा बदलाव
1980 के दशक के उत्तरार्ध में पार्टी की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। मराठी अस्मिता के साथ-साथ शिवसेना ने हिंदुत्व को भी अपने प्रमुख राजनीतिक एजेंडे में शामिल करना शुरू कर दिया।
यही वह दौर था जब पार्टी की नजदीकियां भारतीय जनता पार्टी (BJP) से बढ़ीं।
दोनों दलों के बीच गठबंधन बना और महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया समीकरण तैयार हुआ।
जब शिवसेना ने खोदी वानखेड़े की पिच
शिवसेना के इतिहास कुछ बड़ी विवादित घटनाओं में 1991 का वानखेड़े स्टेडियम पिच विवाद शामिल है। उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में टेस्ट मैच आयोजित होना था। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों और कश्मीर मुद्दे को लेकर शिवसेना ने पाकिस्तान टीम के भारत दौरे का कड़ा विरोध किया।
मैच से कुछ दिन पहले शिवसेना कार्यकर्ताओं ने स्टेडियम में घुसकर पिच को नुकसान पहुंचाया और उसे खोद दिया। इस घटना के बाद मैच आयोजित नहीं हो सका और अंततः उसे रद्द करना पड़ा।
Shiv Sena का तर्क था कि पाकिस्तान के साथ सामान्य खेल संबंध रखना उचित नहीं है, जबकि खेल जगत और विपक्षी दलों ने इसे खेल में राजनीतिक हस्तक्षेप बताया।
इस घटना ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं तथा भारत की खेल छवि पर भी सवाल खड़े किए। आज भी यह विवाद शिवसेना की सबसे चर्चित और विवादास्पद राजनीतिक कार्रवाइयों में गिना जाता है।
1992-93 के मुंबई दंगे
शिवसेना से जुड़ी सबसे विवादित घटना साल 1992-93 के मुंबई दंगे के रूप में देखी जाती है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई।
बाद में गठित श्रीकृष्ण आयोग (Srikrishna Commission) की रिपोर्ट में शिवसेना के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे।
रिपोर्ट में कहा गया था कि दंगों के दूसरे चरण में कुछ स्थानों पर शिवसेना कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी देखी गई। शिवसेना ने इन आरोपों को खारिज किया और आयोग की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए।
यह विवाद वर्षों तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। आज भी जब महाराष्ट्र की राजनीति में सांप्रदायिक तनाव या 1990 के दशक की राजनीति पर चर्चा होती है, तब 1992-93 के मुंबई दंगे और शिवसेना का नाम अक्सर सामने आता है।
भाजपा-शिवसेना गठबंधन बनी सत्ता की चाभी
1995 शिवसेना के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में गिना जाता है। तब भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव जीता और राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
मनोहर जोशी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, जबकि बाल ठाकरे को सत्ता के पीछे सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना गया। यह शिवसेना के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
एक ऐसी पार्टी, जिसके प्रमुख ने कभी चुनाव नहीं लड़ा
भारतीय राजनीति में यह एक अनोखी कहानी है कि बाल ठाकरे ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। न वे विधायक बने और न ही सांसद।
इसके बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्हें कई लोग “रिमोट कंट्रोल” नेता कहा करते थे।
उनके आवास मातोश्री को लंबे समय तक महाराष्ट्र की राजनीति का शक्ति केंद्र माना जाता रहा।
2012 बाल ठाकरे का निधन
17 नवंबर 2012 को बाल ठाकरे का निधन हो गया। उनके निधन की खबर सुनकर लाखों लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। इसे मुंबई के इतिहास की सबसे बड़ी अंतिम यात्राओं में से एक माना जाता है।
मुंबई के कई इलाकों में दुकानें, बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद रहे। शिवाजी पार्क में बालासाहेब ठाकरे के अंतिम दर्शन के लिए लोगों की लंबी कतारें लगीं।
शहर के विभिन्न हिस्सों से शिवसैनिक और समर्थक हाथों में भगवा झंडे लेकर पहुंचे। कई राजनीतिक दलों के नेता, उद्योगपति, फिल्मी हस्तियां और खेल जगत की प्रसिद्ध हस्तियां भी श्रद्धांजलि देने पहुंचीं।
इसके बाद पार्टी की कमान उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने संभाली।
2014 के बाद बदली महाराष्ट्र की राजनीति
2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा महाराष्ट्र में तेजी से मजबूत हुई। यहीं से शिवसेना और भाजपा के रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा।
हालांकि दोनों दल कई वर्षों तक सहयोगी बने रहे, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती गई।
2019 में शिवसेना ने थामा कांग्रेस का “पंजा”
2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की राजनीति में नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला। भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद सामने आ गए।
इसके बाद शिवसेना ने भाजपा से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। इसी गठबंधन से महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार बनी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।
यह फैसला पार्टी के इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक बदलावों में गिना जाता है।
शिवसेना में सबसे बड़ा विद्रोह
यदि शिवसेना के इतिहास का सबसे बड़ा संकट चुनना हो तो 2022 का घटनाक्रम उसमें सबसे ऊपर होगा। पार्टी के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने शिवसेना छोड़ दी। इस बगावत ने उद्धव ठाकरे सरकार को गिरा दिया।
बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दी और पार्टी का चुनाव चिह्न भी उसी गुट को मिला।
यह फैसला भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित दल-विभाजनों में शामिल हो गया।
शिवसेना के DNA में विद्रोह?
पार्टी का इतिहास विद्रोहों से भरा रहा है। छगन भुजबल, नारायण राणे, राज ठाकरे और फिर एकनाथ शिंदे जैसे कई बड़े नेताओं ने अलग राह चुनी। हर विभाजन ने पार्टी की दिशा और नेतृत्व संरचना को प्रभावित किया।
इसी वजह से कई विश्लेषक शिवसेना को “विद्रोह से बनी और विद्रोहों से बदली पार्टी” भी कहते हैं।
ऑपरेशन टाइगर को लेकर चर्चाएं तेज
शिवसेना की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर भी पार्टी में बगावतों का दौर कम नहीं हुआ है। महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों ‘ऑपरेशन टाइगर’ की खूब चर्चा हो रही है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के तहत उद्धव ठाकरे गुट के छह सांसदों द्वारा एक अलग समूह बनाने की खबरें सामने आ रही हैं, जो आने वाले समय में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं।
यदि ऐसा होता है, तो लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत काफी बढ़ जाएगी। राजनीतिक गलियारों में चल रही इस पूरी प्रक्रिया को ही ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नाम दिया गया है, जिसे ठाकरे गुट के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका के रूप में देखा जा रहा है।
60 वर्षों की बड़ी विरासत
शिवसेना की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल चुनावी सफलता नहीं रही। इस पार्टी ने महाराष्ट्र की राजनीति को नई भाषा दी, क्षेत्रीय पहचान की राजनीति को मुख्यधारा में लाया और बाद में हिंदुत्व की राजनीति को भी मजबूत किया।
इसके समर्थक इसे मराठी अस्मिता की आवाज मानते हैं, जबकि आलोचक इसकी आक्रामक राजनीतिक शैली पर सवाल उठाते रहे हैं।
लेकिन इतना तय है कि पिछले 60 वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति की कोई भी कहानी शिवसेना के बिना पूरी नहीं हो सकती।
