नई दिल्ली: भारत के क्रिप्टो बाजार में एक ही तरह की सेवाएं देने वाले प्लेटफॉर्मों पर अलग-अलग नियम लागू होते हैं। भारत में स्थित क्रिप्टो एक्सचेंजों को फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (एफआईयू) के साथ रजिस्ट्रेशन कराना होता है, हर उपयोगकर्ता की पहचान की जांच करनी होती है, मनी लॉन्ड्रिंग रोकने वाले कानून के तहत रिकॉर्ड रखने होते हैं और हर क्रिप्टो ट्रांसफर पर 1 प्रतिशत टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (टीडीएस) काटकर उसकी रिपोर्ट देनी होती है। दूसरी ओर, विदेश में स्थित प्लेटफॉर्म उन्हीं भारतीय उपयोगकर्ताओं को, उन्हीं के फोन और बैंक खातों के जरिए सेवाएं देते हैं, लेकिन इन नियमों का पालन नहीं करते। दोनों एक ही ग्राहक के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, लेकिन नियमों का पालन करने की लागत सिर्फ भारतीय एक्सचेंजों को उठानी पड़ती है।
2022 में क्रिप्टो पर टैक्स के नियम लागू होने से पहले भारतीय एक्सचेंज देश के उपयोगकर्ताओं के कुल क्रिप्टो कारोबार का करीब 60 प्रतिशत संभालते थे। वित्त वर्ष 2025-26 में यह हिस्सा घटकर सिर्फ 5.4 प्रतिशत रह गया। सितंबर 2026 में प्रकाशित टीआईओएल नॉलेज फाउंडेशन की वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (वीडीए) के टैक्स पर दूसरी रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान भारतीय एक्सचेंजों पर करीब 51,446 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ, जबकि ऑफशोर यानी विदेश में स्थित प्लेटफॉर्मों पर यह आंकड़ा लगभग 9,00,100 करोड़ रुपये था। इससे पता चलता है कि 2022 के बाद भारतीयों ने क्रिप्टो में कारोबार करना बंद नहीं किया। उन्होंने कारोबार के लिए भारतीय एक्सचेंजों की जगह विदेशी प्लेटफॉर्मों को चुन लिया।
इस बदलाव की एक बड़ी वजह कारोबार की लागत है। क्रिप्टो पर 1 प्रतिशत टीडीएस मुनाफे पर नहीं, बल्कि हर ट्रांसफर की पूरी रकम पर लगता है। यानी किसी सौदे में फायदा हो या नुकसान, टीडीएस कटता है। अगर कोई व्यक्ति एक ही रकम से बार-बार क्रिप्टो खरीदता और बेचता है, तो उसे हर बार इस कटौती का सामना करना पड़ता है। भारतीय एक्सचेंज इस लागत को खुद नहीं उठा सकते, क्योंकि यह उनकी कमाई का हिस्सा नहीं, बल्कि सरकार के लिए काटा जाने वाला टैक्स है। दूसरी ओर, विदेशी प्लेटफॉर्म टीडीएस काटते ही नहीं हैं। इसलिए लगभग एक जैसी सेवाएं देने के बावजूद भारतीय एक्सचेंजों पर कारोबार करना महंगा पड़ता है।
विदेशी प्लेटफॉर्मों ने अपने कारोबार का तरीका भी इसी अंतर के हिसाब से बनाया है। वे सीधे रुपये में डिपॉजिट स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए वे भारतीय उपयोगकर्ताओं को पीयर-टू-पीयर (पी2पी) तरीके से कारोबार करने की सुविधा देते हैं। इसमें प्लेटफॉर्म खरीदार और विक्रेता को आपस में जोड़ता है, लेकिन रुपये का भुगतान दोनों सीधे अपने बैंक खातों के बीच करते हैं। प्लेटफॉर्म इस दौरान क्रिप्टो को एस्क्रो यानी एक ऐसी व्यवस्था में रखता है, जहां सौदा पूरा होने तक उसे सुरक्षित रखा जाता है, और बदले में कमीशन लेता है।
इसके बाद प्लेटफॉर्म यह तर्क देता है कि चूंकि रुपये का भुगतान उसके जरिए नहीं हुआ, इसलिए टीडीएस काटना उसकी जिम्मेदारी नहीं है। इस तरह भारतीय उपयोगकर्ता रुपये से क्रिप्टो खरीद सकते हैं, जबकि प्लेटफॉर्म उस टैक्स नियम से बाहर रहने का दावा करता है, जिसके जरिए इन लेनदेन की जानकारी टैक्स विभाग तक पहुंच सकती थी।
इसका असर सरकार की टैक्स वसूली पर भी दिखता है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, वीडीए पर टीडीएस से सरकार को 2022-23 में 221.27 करोड़ रुपये, 2023-24 में 362.70 करोड़ रुपये और 2024-25 में 511.83 करोड़ रुपये मिले। यानी तीन वर्षों में कुल वसूली 1,100 करोड़ रुपये से भी कम रही और इसका लगभग पूरा हिस्सा भारतीय एक्सचेंजों से आया। इसके मुकाबले, टीआईओएल की रिपोर्ट का अनुमान है कि विदेशी प्लेटफॉर्मों पर हुए कारोबार से करीब 19,049 करोड़ रुपये का टीडीएस नहीं वसूला जा सका।
विदेशी प्लेटफॉर्मों तक पहुंच रोकने की कोशिशों से भी यह रकम वापस नहीं मिली। अक्टूबर 2025 में एफआईयू ने 25 विदेशी प्लेटफॉर्मों को नोटिस जारी किए। इसके बाद इन वेबसाइटों पर ट्रैफिक तो घटा, लेकिन वहां से हटे उपयोगकर्ता भारतीय एक्सचेंजों पर वापस नहीं आए। इसके बजाय, वे दूसरे विदेशी प्लेटफॉर्मों पर पी2पी के जरिए कारोबार करने लगे। अब भी 45 से ज्यादा ऐसे विदेशी एक्सचेंज भारतीय ग्राहकों को सेवाएं दे रहे हैं, जिन्होंने भारत में रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है।
इस समस्या का समाधान खोजने के लिए पूरी तरह नए नियम बनाने की जरूरत नहीं है। आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 393, जो पहले की धारा 194एस के प्रावधान को आगे बढ़ाती है, कहती है कि भुगतान करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को टीडीएस काटना होगा। विदेशी प्लेटफॉर्म इसी भाषा का फायदा उठाते हैं। उनका तर्क है कि जब भुगतान सीधे खरीदार और विक्रेता के बीच होता है, तो टीडीएस काटने की जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती।
भारत में पहले भी इसी तरह की समस्या सामने आ चुकी है। विदेशी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के मामले में खरीदार सीधे विक्रेता को भुगतान करते थे। इसलिए प्लेटफॉर्म पर टैक्स काटने की जिम्मेदारी तय करना मुश्किल था। इस समस्या से निपटने के लिए 2020 में धारा 194-ओ लाई गई। इसके तहत, अगर कोई ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भुगतान की सुविधा देता है, तो टीडीएस के लिए उस भुगतान को प्लेटफॉर्म द्वारा किया गया माना जाता है, भले ही पैसा सीधे खरीदार से विक्रेता के पास गया हो।
क्रिप्टो के मामले में भी इसी तरह का नियम लागू किया जा सकता है। अगर कोई प्लेटफॉर्म भारत में रहने वाले लोगों को क्रिप्टो ट्रांसफर की सुविधा देता है, तो उस पर टीडीएस काटने की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। साथ ही, प्लेटफॉर्म किसी भी देश में रजिस्टर्ड हो, उसे हर लेनदेन की रिपोर्ट देनी होगी। इससे एक ही भारतीय उपयोगकर्ता को सेवाएं देने वाले सभी प्लेटफॉर्मों पर समान जिम्मेदारी लागू होगी।
यह बहस क्रिप्टो पर कम टैक्स लगाने की नहीं, बल्कि सभी पर बराबर टैक्स नियम लागू करने की है। आज पूरा बोझ उन प्लेटफॉर्मों पर पड़ रहा है, जिन्होंने रजिस्ट्रेशन कराया, अपने उपयोगकर्ताओं की पहचान की जांच की और लेनदेन की रिपोर्ट दी। वहीं, जो प्लेटफॉर्म ये जिम्मेदारियां नहीं निभाते, उन्हें इस बोझ का सामना नहीं करना पड़ता। यानी नियमों का पालन करना ही भारतीय एक्सचेंजों के लिए नुकसान की वजह बन गया है और बाजार के आंकड़े भी यही दिखाते हैं।
जब तक टीडीएस काटने की जिम्मेदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि प्लेटफॉर्म कहां रजिस्टर्ड है, न कि इस बात पर कि वह भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं दे रहा है, तब तक यह असमानता बनी रहेगी। भारत अपने क्रिप्टो बाजार के केवल उसी छोटे हिस्से से टैक्स वसूलता रहेगा, जिसकी जानकारी उसके पास है, जबकि कारोबार का बड़ा हिस्सा ऐसे विदेशी प्लेटफॉर्मों पर होता रहेगा, जिनके लेनदेन की जानकारी हासिल करना मुश्किल है।



