नई दिल्ली: डिजिटल एसेट्स को लेकर दुनिया भर में चल रही बहस अब एक नए दौर में पहुंच गई है। अब सवाल यह नहीं है कि क्रिप्टो, स्टेबलकॉइन, डीफाई और टोकनाइजेशन का वित्तीय बाजारों पर असर पड़ेगा या नहीं। इनका असर पहले से ही दिख रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि सरकारें इन तकनीकों को वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा कैसे बनाएं, ताकि इनके साथ आने वाले जोखिमों से भी बचा जा सके।
बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (एफएसबी), फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ), आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी), अंतरराष्ट्रीय प्रतिभूति आयोग संगठन (आईओएससीओ) और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसी कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के काम से पता चलता है कि डिजिटल एसेट्स को लेकर नियम बनाने का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है। अब किसी डिजिटल एसेट को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा रहा कि वह किस तकनीक पर काम करता है। इसके बजाय, इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि उसका इस्तेमाल किस लिए होता है, उससे क्या जोखिम पैदा हो सकते हैं और उसे कौन नियंत्रित करता है। अलग-अलग डिजिटल एसेट्स के काम करने के तरीके, उद्देश्य और जोखिम अलग होते हैं। इसलिए सभी पर एक जैसे नियम लगाने के बजाय उनकी अलग-अलग विशेषताओं को समझना जरूरी है।
यह बदलाव स्टेबलकॉइन, डीफाई और टोकनाइजेशन के मामले में साफ दिखाई देता है। स्टेबलकॉइन ऐसे डिजिटल एसेट्स हैं, जिन्हें पैसे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और जिनकी कीमत आमतौर पर किसी मुद्रा या दूसरी संपत्ति से जुड़ी होती है। इनके मामले में कई सवाल महत्वपूर्ण हैं। जैसे, इन्हें जारी करने वाली कंपनी के पास पर्याप्त रिजर्व है या नहीं, जरूरत पड़ने पर उपयोगकर्ता अपने पैसे वापस ले सकते हैं या नहीं, और इनका असर बाजार में नकदी की उपलब्धता तथा किसी देश के अपनी मुद्रा पर नियंत्रण पर क्या पड़ सकता है।
डीफाई यानी विकेंद्रीकृत वित्त एक अलग चुनौती पेश करता है। इसे अक्सर ऐसी वित्तीय व्यवस्था माना जाता है, जिसमें बैंकों जैसे पारंपरिक बिचौलियों की जरूरत नहीं होती। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस व्यवस्था पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। इसे बनाने वाले डेवलपर्स, फैसले लेने वाले समूह, लेनदेन की पुष्टि करने वाले वैलिडेटर्स और एक्सचेंज जैसे पक्ष अब भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। वहीं, टोकनाइजेशन के जरिए किसी संपत्ति पर मालिकाना हक को डिजिटल टोकन के रूप में दर्ज किया जा सकता है। इससे शेयर और बॉन्ड जैसी प्रतिभूतियों को जारी करने, उनकी खरीद-बिक्री और लेनदेन पूरा करने के तरीके बदल सकते हैं। हालांकि, लंबे समय में इससे कितना व्यावसायिक फायदा होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
दुनिया भर में यह समझ भी बढ़ रही है कि किसी नई तकनीक में संभावनाएं होने का मतलब यह नहीं है कि लोग उसे बड़े पैमाने पर अपनाएंगे या उससे आर्थिक फायदा जरूर होगा। साथ ही, इन तकनीकों से जुड़े जोखिमों को समझना भी जरूरी है। आईएमएफ ने अपने शोध में यह देखा है कि स्टेबलकॉइन के जरिए एक देश से दूसरे देश में पैसे के प्रवाह का विदेशी मुद्रा बाजार, ब्याज दरों से जुड़े केंद्रीय बैंक के फैसलों के असर और पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वहीं, एफएटीएफ ने इस बात पर ध्यान दिया है कि डीफाई जैसी व्यवस्थाओं में अवैध वित्तीय गतिविधियों को रोकना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि कई बार यह पता लगाना आसान नहीं होता कि असल में इन पर किसका नियंत्रण है। ये चुनौतियां बताती हैं कि केवल बड़े प्रतिबंध लगाने या किसी तकनीक के लिए अलग नियम बनाने के बजाय, नियमों का ध्यान वास्तविक जोखिमों और उनके लिए जिम्मेदार लोगों पर होना चाहिए।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। देश को न तो हर कीमत पर डिजिटल एसेट्स को अपनाने में जल्दबाजी करनी चाहिए और न ही उनके विकास को अनिश्चितकाल तक रोकना चाहिए। इसके बजाय, भारत को ऐसी व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना चाहिए, जो इन उभरती तकनीकों को समझ सके, उनसे जुड़े जोखिमों पर नजर रख सके और उनके इस्तेमाल के लिए सही नियम लागू कर सके।
भारत की डिजिटल एसेट नीति का अगला चरण एक सरल सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए: नई तकनीकें दुनिया भर में विकसित और इस्तेमाल की जा सकती हैं, लेकिन उनसे देश की वित्तीय व्यवस्था को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हर देश की अपनी होती है। भारत के पास डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे यूपीआई और आधार, विकसित करने का अनुभव है। साथ ही, वह क्रिप्टो से जुड़े वैश्विक नियमों पर चल रही चर्चाओं में भी भूमिका निभाता रहा है। इन अनुभवों का उपयोग करके भारत ऐसा नियामकीय ढांचा बना सकता है, जिस पर देश के भीतर भरोसा किया जा सके और जो दुनिया के दूसरे देशों के नियमों के साथ भी काम कर सके।




