Saturday, 08 August 2026
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13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर लग सकती है रोक, संसद में उठी SHIELD बिल की चर्चा

SHIELD बिल के तहत 13 साल से कम उम्र के बच्चों के Social Media और Online Gaming Account पर अभिभावकीय सहमति हो सकती है अनिवार्य। जानिए बिल में क्या-क्या प्रस्तावित है।

नई दिल्ली: आज के दौर में बच्चे किताबों और खेल के मैदान से जितना जुड़ते हैं, उतना ही तेजी से उनका रिश्ता सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी बढ़ रहा है। कुछ ही साल की उम्र में बच्चे वीडियो देखने, गेम खेलने और सोशल मीडिया कंटेंट का इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे में सवाल लगातार उठ रहा है कि इंटरनेट की इस दुनिया में बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी होनी चाहिए। माता-पिता की, डिजिटल कंपनियों की या सरकार की?

इसी बहस के बीच संसद में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक अहम प्रस्ताव सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद बैजयंत पांडा ने ‘सेफगार्डिंग हेल्दी इंटरनेट एनवायरनमेंट्स फॉर लिटिल डिजिटल-नेटिव्स (SHIELD) बिल, 2025’ नाम से एक प्राइवेट मेंबर बिल का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सत्यापित अभिभावकीय सहमति के बिना सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोका जा सकता है।

शनिवार, 8 अगस्त को बिल को संसद में पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन सदन की कार्यवाही स्थगित होने के कारण इसे पेश नहीं किया जा सका। इसलिए फिलहाल इस बिल पर कोई कानूनी पाबंदी अबतक लागू नहीं हुई है।

क्या है SHIELD बिल?

SHIELD का पूरा नाम Safeguarding Healthy Internet Environments for Little Digital-Natives Bill, 2025 है। यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है, यानी इसे किसी केंद्रीय मंत्री ने सरकार की ओर से नहीं, बल्कि संसद के एक सदस्य ने निजी विधायी पहल के रूप में प्रस्तावित किया है।

बैजयंत पांडा इस प्रस्ताव के जरिए बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को ज्यादा सुरक्षित और नियंत्रित बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बिल में सोशल मीडिया के साथ-साथ ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म और अन्य डिजिटल इंटरमीडियरी सेवाओं के लिए भी विशेष सुरक्षा जिम्मेदारियां तय करने का प्रस्ताव है।

प्रस्ताव में बच्चों की उम्र की पहचान के लिए Age Varification System और माता-पिता के लिए ऐसे नियंत्रण उपकरणों की बात की गई है, जिनसे वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी कर सकें।

यानी इसका उद्देश्य सिर्फ यह कहना नहीं है कि बच्चे इंटरनेट इस्तेमाल न करें, बल्कि यह तय करना भी है कि अगर वे डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करते हैं तो उनकी सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाए।

13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्या बदलेगा?

SHIELD बिल की सबसे ज्यादा चर्चा जिस प्रावधान को लेकर हो रही है, वह 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग अकाउंट से जुड़ा है।

प्रस्ताव के मुताबिक, इस आयु वर्ग के बच्चे सत्यापित अभिभावकीय सहमति के बिना अकाउंट नहीं बना सकेंगे। यानी किसी बच्चे की उम्र 13 साल से कम है तो प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके माता-पिता या अभिभावक ने उसकी डिजिटल सेवा तक पहुंच को मंजूरी दी है।

यह व्यवस्था लागू होती है तो सोशल मीडिया कंपनियों और गेमिंग प्लेटफॉर्म के लिए केवल यूजर की बताई गई उम्र पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें उम्र सत्यापित करने के लिए व्यवस्था विकसित करनी पड़ सकती है।

हालांकि बिल के प्रस्तावित ढांचे में ‘चाइल्ड’ की परिभाषा 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति के तौर पर रखी गई है। इसलिए 13 साल की सीमा मुख्य रूप से अकाउंट बनाने और अभिभावकीय सहमति से जुड़ी विशेष पाबंदी है, जबकि सुरक्षा संबंधी कई अन्य प्रावधान 18 साल से कम उम्र के सभी बच्चों पर लागू होने का प्रस्ताव रखते हैं।

माता-पिता को मिल सकता है कंट्रोल डैशबोर्ड

बिल का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा Parental Control Dashboard है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत माता-पिता या अभिभावकों को ऐसे डिजिटल टूल उपलब्ध कराने की बात कही गई है, जिनकी मदद से वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी कर सकें। इसके जरिए प्राइवेसी सेटिंग्स को नियंत्रित करने और स्क्रीन टाइम सीमित करने जैसे विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल की समस्या केवल सोशल मीडिया अकाउंट बनाने तक सीमित नहीं है। कई बच्चे घंटों गेम खेलते हैं, लगातार शॉर्ट वीडियो देखते हैं या देर रात तक ऑनलाइन रहते हैं।

ऐसे में अभिभावकों के लिए सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं कि बच्चा इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा है। उन्हें यह भी समझने की जरूरत होती है कि वह किस प्लेटफॉर्म पर है, कितना समय बिता रहा है और किस तरह की सामग्री देख रहा है।

टारगेटेड विज्ञापनों से बचाने का प्रस्ताव

SHIELD बिल का एक बड़ा हिस्सा बच्चों के डिजिटल डेटा और विज्ञापन से जुड़ा है। प्रस्तावित नियमों के तहत प्लेटफॉर्म को बच्चों को ट्रैक करने, उनका प्रोफाइल तैयार करने या उनके लिए पर्सनलाइज्ड विज्ञापन तैयार करने से रोकने की बात कही गई है।

आज डिजिटल प्लेटफॉर्म यूजर की पसंद, सर्च, देखने की आदत और ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर कंटेंट और विज्ञापन दिखाते हैं। बच्चों के मामले में यह सवाल ज्यादा संवेदनशील हो जाता है क्योंकि कम उम्र के यूजर हमेशा यह नहीं समझ पाते कि उनके सामने दिखाई जा रही सामग्री या विज्ञापन किस उद्देश्य से दिखाया जा रहा है। प्रस्ताव का मकसद इसी तरह की डिजिटल प्रोफाइलिंग और लक्षित विज्ञापन से बच्चों को बचाना है।

कई तरह के कंटेंट पर रोक

बिल में बच्चों को सिर्फ सोशल मीडिया के खतरों से बचाने की बात नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव है कि बच्चे पोर्नोग्राफी, जुआ, सट्टेबाजी या सिम्युलेटेड बेटिंग, हिंसक या चरमपंथी सामग्री और ड्रग्स से संबंधित कंटेंट तक आसानी से न पहुंच सकें।

इसका मतलब यह है कि कानून लागू होने की स्थिति में प्लेटफॉर्म को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना होगा।

यहां एक महत्वपूर्ण चुनौती तकनी की होगी। इंटरनेट पर सामग्री लगातार बदलती रहती है और एक ही प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग उम्र के लोग मौजूद होते हैं। इसलिए कंपनियों को उम्र के आधार पर कंटेंट की पहुंच नियंत्रित करने के लिए प्रभावी तकनीकी सिस्टम तैयार करने होंगे।

उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर जुर्माने का भी प्रावधान

प्रस्तावित कानून में डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए सख्त दंड का भी प्रावधान है। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित नियमों का उल्लंघन करने वाले प्लेटफॉर्म पर 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं बार-बार या जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करने पर सेवा को अस्थायी रूप से निलंबित करने या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत सेवा को ब्लॉक करने जैसी कार्रवाई का प्रस्ताव है।

इससे साफ है कि प्रस्ताव केवल बच्चों को सलाह देने तक सीमित नहीं है। इसमें डिजिटल कंपनियों के लिए कानूनी जिम्मेदारी तय करने की कोशिश भी की गई है।

संसद में पहले भी अटक चुका है बिल

यह पहली बार नहीं है जब बैजयंत पांडा इस बिल को संसद में लाने की कोशिश कर रहे हैं। फरवरी 2026 में भी SHIELD बिल को लोकसभा में पेश करने की कोशिश की गई थी, लेकिन सदन स्थगित होने के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इससे पहले शीतकालीन सत्र में भी प्राइवेट मेंबर बिल के लिए निर्धारित कार्यवाही बाधित होने के कारण यह पेश नहीं हो पाया था।

8 अगस्त 2026 को भी बिल को पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन सदन की कार्यवाही स्थगित होने के कारण इसे नहीं लिया जा सका। इसलिए फिलहाल इस बिल की स्थिति प्रस्तावित कानून की है।

प्राइवेट मेंबर बिल क्या होता है?

SHIELD बिल को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि प्राइवेट मेंबर बिल क्या होता है। ऐसा विधेयक किसी ऐसे सांसद की ओर से पेश किया जाता है जो मंत्री नहीं है। यह जरूरी नहीं कि बिल सरकार की आधिकारिक विधायी प्राथमिकता का हिस्सा हो।

भारत में ऐसे बिलों का कानून बनना बेहद दुर्लभ है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से केवल करीब एक दर्जन प्राइवेट मेंबर बिल ही संसद से कानून के रूप में पारित हुए हैं।

इसलिए SHIELD बिल का संसद में सूचीबद्ध होना अपने आप में यह नहीं बताता कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर जल्द ही सोशल मीडिया बैन लागू होने वाला है।

इसके लिए बिल को आगे की संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होगा और आखिरकार दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी भी जरूरी होगी।

दुनिया के दूसरे देशों में क्या है स्थिति?

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया ने 2025 में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया को लेकर दुनिया के सबसे सख्त नियमों में से एक लागू किया। इसके बाद दूसरे देशों में भी कम उम्र के यूजर्स के लिए आयु-सत्यापन और अभिभावकीय सहमति को लेकर बहस तेज हुई।

फ्रांस और इटली में भी कम उम्र के यूजर्स के लिए अभिभावकीय सहमति और आयु-सत्यापन से जुड़े उपाय मौजूद हैं या उन पर काम हुआ है। चीन ने भी बच्चों के ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल इस्तेमाल पर कई प्रतिबंध लगाए हैं।

बिल के समर्थन में आये तर्क

इस प्रस्ताव के समर्थकों का सबसे बड़ा तर्क है कि बच्चे डिजिटल दुनिया के जोखिमों को हमेशा समझने की स्थिति में नहीं होते। सोशल मीडिया पर साइबरबुलिंग, ऑनलाइन शोषण, अनुचित कंटेंट, अजनबियों से संपर्क, डेटा संग्रह और अत्यधिक स्क्रीन टाइम जैसी समस्याएं बच्चों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं।

अगर प्लेटफॉर्म पर उम्र की जांच मजबूत होगी और माता-पिता को बेहतर नियंत्रण मिलेगा, तो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा बढ़ सकती है।

इसके अलावा कंपनियों पर कानूनी जिम्मेदारी तय होने से प्लेटफॉर्म के लिए बच्चों की सुरक्षा को केवल वैकल्पिक सुविधा के बजाय गंभीर अनुपालन मुद्दा बनाना पड़ेगा।

विरोध और चुनौतियां भी कम नहीं

यिस पूरे बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि उम्र की सही पहचान कैसे की जाएगी? अगर किसी प्लेटफॉर्म को हर यूजर की उम्र सत्यापित करनी है तो इसके लिए कौन-सा डेटा लिया जाएगा? क्या इससे बच्चों या परिवारों की निजता प्रभावित होगी?

दूसरा सवाल यह है कि माता-पिता की सहमति को किस तरह सत्यापित किया जाएगा।

इसके अलावा बच्चे उम्र छिपाकर या गलत जानकारी देकर अकाउंट बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में प्लेटफॉर्म को तकनीकी तौर पर कितनी निगरानी करनी होगी, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यानी बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने और उनकी डिजिटल प्राइवेसी सुरक्षित रखने के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

क्या इससे माता-पिता की जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी?

अगर SHIELD बिल भविष्य में कानून बनता भी है, तो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा केवल प्लेटफॉर्म या सरकार की जिम्मेदारी नहीं होगी। माता-पिता को भी बच्चों के साथ इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर बातचीत करनी होगी। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि ऑनलाइन किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा करना, निजी जानकारी साझा करना या संदिग्ध लिंक खोलना क्यों जोखिम भरा हो सकता है।

सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करना ही पर्याप्त नहीं है। बच्चों को डिजिटल साक्षरता देना भी उतना ही जरूरी है।

ये भी पढ़ें :- हिमाचल के चंबा में दर्दनाक बस हादसा! 8 की मौत, 11 घायल

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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