PoK में चुनाव से पहले हिंसा और विरोध प्रदर्शन ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए रावलकोट से मीरपुर तक तनाव के बीच हो रहे चुनाव की पूरी कहानी।
रावलकोट: पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर, जिसे भारत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रूप में संदर्भित करता है, इन दिनों राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के दौर से गुजर रहा है। जिस समय क्षेत्र में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हो रहा है, उसी समय सड़कों पर प्रदर्शन, सुरक्षा बलों के साथ झड़प, इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर पाबंदियां तथा चुनाव बहिष्कार की अपील ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सोमवार (27 जुलाई) को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान हुआ। यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है, जब पिछले कई हफ्तों से क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन और हिंसा का सिलसिला जारी है। रिपोर्ट के मुताबिक, पहले चरण के चुनाव के दौरान हुई हिंसा में अब तक 20 लोगों की मौत की खबर सामने रही है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव के कारण कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ है।
चुनाव से ठीक पहले रावलकोट और पुंछ डिवीजन को लेकर विशेष चिंता बनी हुई थी। यही वह इलाका है, जहां Joint Awami Action Committee (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने सबसे ज्यादा जोर पकड़ा। JAAC ने चुनाव का बहिष्कार करने की अपील की है और विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग को अपने आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है।
चुनाव से पहले भड़की हिंसा
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत केवल चुनावी राजनीति से नहीं हुई थी। JAAC के नेतृत्व में लोगों की मांगों में शुरुआत में सब्सिडी वाले आटे की उपलब्धता, बिजली की कम कीमत और अन्य आर्थिक तथा प्रशासनिक मुद्दे प्रमुख थे। धीरे-धीरे आंदोलन का दायरा बढ़ता गया और इसके मांगपत्र में करीब 38 मांगें शामिल हो गईं।

इनमें सबसे विवादित मुद्दा विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों का है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इन सीटों के कारण पाकिस्तान के मुख्य राजनीतिक दलों को स्थानीय विधानसभा में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिलता है। JAAC इन सीटों को समाप्त करने की मांग कर रही है।
वहीं, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सरकार का तर्क है कि इन सीटों को हटाने के लिए संवैधानिक बदलाव की जरूरत होगी। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी है। यही विवाद आंदोलन के राजनीतिक केंद्र में आ गया है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब स्थानीय सरकार ने 5 जून को JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद आंदोलन के नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, कुछ नेता भूमिगत हो गए और कुछ ने रावलकोट जैसे इलाकों में धरना-प्रदर्शन जारी रखा।
प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। क्षेत्र में बैंकिंग सेवाएं भी प्रभावित हुईं और कई इलाकों में मोबाइल तथा इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं। पुंछ डिवीजन, जो भारत की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र है, कई दिनों तक तनाव का प्रमुख केंद्र बना रहा।
रावलकोट क्यों बना आंदोलन का केंद्र?
रावलकोट PoK के पुंछ डिवीजन का प्रशासनिक मुख्यालय है। हाल के आंदोलन में यह शहर प्रमुख विरोध केंद्र के रूप में सामने आया है। यहां JAAC से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने धरने और विरोध प्रदर्शन किए।
27 जुलाई के चुनाव से पहले भी रावलकोट में तनाव जारी रहा। JAAC ने चुनावों के बहिष्कार का आह्वान किया और अपने समर्थकों से मतदान प्रक्रिया में भाग नहीं लेने की अपील की।
आंदोलन के नेताओं का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगें, खासकर 12 आरक्षित सीटों के मुद्दे पर समाधान नहीं होता, तब तक चुनाव प्रक्रिया को लेकर उनका विरोध जारी रहेगा।
वहीं, चुनाव आयोग और प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया है। चुनाव को तीन चरणों में कराने का फैसला भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच लिया गया।
27 जुलाई को पहले चरण के मतदान
2026 के विधानसभा चुनाव को तीन चरणों में आयोजित किया जा रहा है। पहले चरण में 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ। इन सीटों में मीरपुर की चार, भिंबर की तीन और कोटली की छह सीटें शामिल हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, पहले चरण में 14 लाख से ज्यादा मतदाता मतदान के लिए पात्र थे और सुरक्षा के लिए 19,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। मतदान शाम 6 बजे समाप्त हुआ और इसके बाद मतगणना शुरू हुई।
पहले चरण में मीरपुर डिवीजन को इसलिए चुना गया क्योंकि पुंछ डिवीजन की तुलना में वहां चुनावी माहौल अपेक्षाकृत कम तनावपूर्ण माना गया। हालांकि, मतदान के दौरान भी हिंसा और कथित धांधली के आरोप सामने आए।
चुनावी हिंसा में एक राजनीतिक कार्यकर्ता की मौत हुई। इसके अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप और धांधली के आरोप लगाए।
तीन चरणों में चुनाव
मूल कार्यक्रम के अनुसार चुनाव प्रक्रिया को एक ही दिन में कराने की योजना थी, लेकिन सुरक्षा बलों की उपलब्धता और क्षेत्र में जारी तनाव को देखते हुए चुनाव को तीन चरणों में बांट दिया गया।
पहले चरण में 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन में मतदान हुआ। दूसरे चरण में 2 अगस्त को मुजफ्फरबाद डिवीजन और पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों पर मतदान प्रस्तावित है। तीसरे चरण में 10 अगस्त को पुंछ डिवीजन में मतदान होना है।
यह व्यवस्था इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि पुंछ डिवीजन ही हालिया आंदोलन का सबसे संवेदनशील केंद्र रहा है। इसलिए वहां मतदान को सबसे अंत में रखना प्रशासन की सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
12 आरक्षित सीटों का विवाद
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की विधानसभा में कुल 45 सीटें हैं। इनमें से 33 सीटें क्षेत्र के भीतर स्थित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी जाती हैं, जबकि 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं।
इन सीटों की व्यवस्था ऐतिहासिक चुनावी प्रावधानों से जुड़ी हुई है और बाद में इसे AJK के संवैधानिक ढांचे में भी जगह मिली। हालांकि, वर्तमान आंदोलन में इन सीटों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
JAAC का आरोप है कि ये सीटें स्थानीय जनता की वास्तविक राजनीतिक पसंद को प्रभावित करती हैं और पाकिस्तान के बड़े राजनीतिक दलों को सरकार बनाने में फायदा पहुंचा सकती हैं। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि इन सीटों को समाप्त किया जाए।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि इन सीटों को हटाना आसान नहीं है और इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी। यही कारण है कि यह मुद्दा चुनाव से पहले सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है।
चुनाव के बहिष्कार की अपील का कितना असर?
JAAC चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है और उसने लोगों से मतदान का बहिष्कार करने की अपील की है। संगठन का तर्क है कि जब तक उसके प्रमुख मुद्दों पर समाधान नहीं होता, चुनाव प्रक्रिया क्षेत्र की वास्तविक राजनीतिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी।
इस बहिष्कार की अपील का चुनावी भागीदारी पर कितना असर पड़ेगा, यह परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा। हालांकि, पहले चरण के दौरान कुछ इलाकों में कम मतदान की तस्वीर सामने आने की रिपोर्टें भी आईं। दूसरी तरफ, राजनीतिक दलों ने मतदाताओं से मतदान में हिस्सा लेने की अपील की है।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि अगर बड़े पैमाने पर मतदाता मतदान से दूर रहते हैं, तो नई विधानसभा की राजनीतिक वैधता को लेकर बहस और तेज हो सकती है।
इंटरनेट बंद होने से चुनावी प्रक्रिया पर असर
विरोध प्रदर्शनों के दौरान PoK के बड़े हिस्से में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं। प्रशासन की ओर से ऐसी पाबंदियों को सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा गया, लेकिन उम्मीदवारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया।
इंटरनेट बंद होने का सीधा असर चुनाव प्रचार पर पड़ा। उम्मीदवारों के लिए मतदाताओं तक पहुंचना मुश्किल हुआ। खासतौर पर पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में सोशल मीडिया के जरिए प्रचार करने वाले उम्मीदवारों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
एक स्वतंत्र उम्मीदवार मलिक अलाउद्दीन ने मीडिया को बताया कि इंटरनेट उपलब्ध होने पर एक सोशल मीडिया पोस्ट हजारों मतदाताओं तक पहुंच सकता था, लेकिन प्रतिबंधों के कारण उम्मीदवारों को गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क करना पड़ा।
इससे चुनाव की पारदर्शिता और समान अवसर को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, इंटरनेट बंद करने के पीछे प्रशासन की ओर से सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया गया।
क्या केवल चुनावी विवाद ही है हिंसा की वजह?
पूरे घटनाक्रम को केवल चुनावी हिंसा के रूप में देखना सही नहीं होगा। मौजूदा संकट के पीछे आर्थिक असंतोष, प्रशासनिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय स्वायत्तता से जुड़े कई मुद्दे हैं।
JAAC का आंदोलन शुरुआत में आटा और बिजली जैसे रोजमर्रा के मुद्दों से जुड़ा था। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, इसका राजनीतिक स्वरूप मजबूत होता गया। 12 आरक्षित सीटों का मुद्दा अब आंदोलन की सबसे प्रमुख मांगों में शामिल है।
इसके साथ ही, पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की स्थानीय सरकार और इस्लामाबाद में मौजूद राजनीतिक तथा सैन्य प्रतिष्ठान के बीच शक्ति संतुलन को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। कुछ विश्लेषकों ने तर्क दिया कि स्थानीय निर्वाचित नेतृत्व के पास अपने लोगों के साथ राजनीतिक समझौता करने की सीमित क्षमता है।
चुनाव से आगे की कहानी
PoK में मौजूदा संकट केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र में लंबे समय से मौजूद राजनीतिक और आर्थिक असंतोष की अभिव्यक्ति भी है। 2026 के चुनाव के दौरान हुई हिंसा ने इस समस्या को और उजागर कर दिया है।
एक तरफ प्रशासन चुनाव को लोकतांत्रिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने के जरूरी कदम के रूप में देख रहा है। दूसरी तरफ JAAC जैसे आंदोलनकारी समूह चुनाव से पहले अपनी मांगों के समाधान पर जोर दे रहे हैं।
इसलिए चुनाव परिणाम चाहे जो भी हों, असली चुनौती उसके बाद शुरू होगी। नई सरकार को आर्थिक समस्याओं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, 12 आरक्षित सीटों के विवाद और स्थानीय लोगों के बढ़ते असंतोष से निपटना होगा।
फिलहाल, 27 जुलाई को शुरू हुई चुनाव प्रक्रिया ने हिंसा और तनाव के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन रावलकोट और पूंछ सहित पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति तभी संभव होगी, जब राजनीतिक पक्षों के बीच बातचीत के जरिए उन मुद्दों का समाधान निकले, जिनके कारण यह आंदोलन सड़कों तक पहुंचा।
2026 का चुनाव इसलिए केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थानीय जनता के असंतोष और राजनीतिक मांगों को कितनी प्रभावी तरीके से संबोधित कर पाती हैं।
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