‘पय्योली एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर P.T. Usha ने सिर्फ ट्रैक पर ही नहीं, बल्कि भारतीय खेलों के भविष्य को भी नई दिशा दी। जानिए उनकी कहानी।
नई दिल्ली: 27 जून भारतीय खेल इतिहास की उन तारीखों में शामिल है, जिसने देश को एक ऐसी धाविका दी जिसने करोड़ों भारतीयों को सपने देखने की हिम्मत दी। 27 जून 1964 को केरल के कोझिकोड जिले के पय्योली क्षेत्र में जन्मीं पिलावुल्लाकांडी थेक्केपराम्बिल उषा, जिन्हें दुनिया आज P.T. Usha के नाम से जानती है, भारतीय एथलेटिक्स की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में गिनी जाती हैं।
उन्हें “पय्योली एक्सप्रेस”, “गोल्डन गर्ल” और “क्वीन ऑफ इंडियन ट्रैक एंड फील्ड” जैसे नामों से सम्मानित किया गया है। आज जब P.T. Usha अपना 62वां जन्मदिन मना रही हैं, तब उनका जीवन केवल एक सफल खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन, दृढ़ता और भारतीय खेलों में बदलाव की कहानी भी है। वह उस पीढ़ी की प्रतिनिधि हैं जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर भारत का झंडा बुलंद किया।
कमजोर स्वास्थ्य वाली बच्ची से राष्ट्रीय प्रतिभा तक
P.T. Usha का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन में उनका स्वास्थ्य कमजोर रहता था। परिवार आर्थिक रूप से भी बेहद समृद्ध नहीं था। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी उषा के लिए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का सपना किसी कल्पना जैसा लगता था।
हालांकि बचपन से ही उनमें दौड़ने की असाधारण क्षमता दिखाई देती थी। स्कूल प्रतियोगिताओं में उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। 1970 के दशक में केरल सरकार ने खेल प्रतिभाओं की पहचान और प्रशिक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए। इन्हीं कार्यक्रमों के माध्यम से उषा को खेल प्रशिक्षण का अवसर मिला।
यहीं उनकी मुलाकात कोच ओ.एम. नांबियार से हुई। भारतीय खेल इतिहास में नांबियार और उषा की जोड़ी को सबसे सफल खिलाड़ी-कोच संबंधों में गिना जाता है। नांबियार ने उषा की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का एथलीट बनाने का लक्ष्य तय किया।
कम उम्र में राष्ट्रीय मंच पर पहचान
1979 के राष्ट्रीय स्कूल खेलों में उषा ने शानदार प्रदर्शन किया और उन्हें पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी गति और तकनीक ने विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
महज 16 वर्ष की उम्र में उन्हें 1980 मॉस्को ओलंपिक के लिए भारतीय टीम में जगह मिली। हालांकि वह ओलंपिक उनके लिए सीखने का अनुभव साबित हुआ और कोई बड़ा परिणाम नहीं आया, लेकिन इतनी कम उम्र में ओलंपिक का हिस्सा बनना ही असाधारण उपलब्धि थी।
मॉस्को से लौटने के बाद उन्होंने अपने खेल को और बेहतर बनाने के लिए कठोर प्रशिक्षण शुरू किया। यही वह दौर था जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय खेलों की सबसे बड़ी स्टार बना दिया।
1982 एशियाई खेलों से बदली पहचान
1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेल भारतीय खेल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इन्हीं खेलों ने पी.टी. उषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
उन्होंने 100 मीटर और 200 मीटर दौड़ में रजत पदक जीते। भारत में पहली बार बड़ी संख्या में लोगों ने महिला एथलेटिक्स को गंभीरता से देखना शुरू किया। उषा अब केवल एक उभरती खिलाड़ी नहीं थीं, बल्कि देश की उम्मीद बन चुकी थीं।
नई दिल्ली Asian Games के बाद मीडिया ने उन्हें भारतीय एथलेटिक्स का नया चेहरा कहना शुरू कर दिया।
जब एक सेकंड का सौवें हिस्से से चूंका पदक
अगर भारतीय खेल इतिहास में सबसे दर्दनाक लेकिन प्रेरणादायक क्षणों की सूची बनाई जाए, तो 1984 लॉस एंजिलिस ओलंपिक में पी.टी. उषा का प्रदर्शन उसमें जरूर शामिल होगा।
महिलाओं की 400 मीटर हर्डल्स स्पर्धा पहली बार ओलंपिक में शामिल की गई थी। उषा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में जगह बनाई। किसी भारतीय महिला एथलीट का ट्रैक एंड फील्ड ओलंपिक फाइनल तक पहुंचना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
फाइनल में उन्होंने 55.42 सेकंड का समय निकाला। यह राष्ट्रीय रिकॉर्ड था। लेकिन कांस्य पदक जीतने वाली रोमानिया की क्रिस्टियाना कोजोकारू उनसे केवल 0.01 सेकंड आगे रहीं।
उषा चौथे स्थान पर रहीं। सिर्फ एक सौवें हिस्से के अंतर से ओलंपिक पदक चूकना बेहद पीड़ादायक था। लेकिन इस प्रदर्शन ने उन्हें पूरे देश की नायिका बना दिया। भारत ने पहली बार महसूस किया कि उसके खिलाड़ी भी ट्रैक एंड फील्ड में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे सकते हैं। आज भी यह प्रदर्शन भारतीय ओलंपिक इतिहास के सबसे यादगार क्षणों में गिना जाता है।
एशिया में पी.टी. उषा का दबदबा
1984 ओलंपिक के बाद उषा का आत्मविश्वास और बढ़ गया। अगले कुछ वर्षों में उन्होंने एशियाई एथलेटिक्स पर लगभग एकछत्र राज किया।
1985 में जकार्ता में आयोजित एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप में उन्होंने पांच स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। यह प्रदर्शन आज भी भारतीय एथलेटिक्स के सबसे महान प्रदर्शनों में शामिल है।
इसके एक वर्ष बाद 1986 सियोल एशियाई खेलों में उन्होंने चार स्वर्ण और एक रजत पदक जीत लिया। उन्होंने 200 मीटर, 400 मीटर, 400 मीटर हर्डल्स और 4×400 मीटर रिले में स्वर्ण पदक हासिल किए, जबकि 100 मीटर में रजत पदक जीता।
उस समय एशिया में शायद ही कोई महिला धाविका थी जो उषा के दबदबे को चुनौती दे पाती। यही वह दौर था जब उन्हें “गोल्डन गर्ल” कहा जाने लगा।
रिकॉर्ड्स की लंबी सूची
P.T. Usha ने अपने करियर में सैकड़ों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदक जीते। लंबे समय तक उनके कई राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम रहे। उन्होंने एशियाई प्रतियोगिताओं में कुल मिलाकर दर्जनों पदक जीते और भारतीय एथलेटिक्स को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1980 और 1990 के दशक में भारतीय एथलेटिक्स की चर्चा अक्सर पी.टी. उषा के नाम से शुरू होती थी।
चुनौतियां, चोट और निराशा
हर महान खिलाड़ी की तरह उषा को भी कई कठिन दौरों का सामना करना पड़ा। चोटों ने कई बार उनके प्रदर्शन को प्रभावित किया। 1988 सियोल ओलंपिक में वह वैसी सफलता हासिल नहीं कर सकीं जिसकी उम्मीद थी।
समय के साथ युवा खिलाड़ियों की नई पीढ़ी भी सामने आने लगी। लेकिन उषा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने अनुभव और मेहनत के दम पर प्रतिस्पर्धा जारी रखी।
उनकी सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वह असफलताओं से टूटने के बजाय और मजबूत होकर वापसी करती थीं।
शादी और व्यक्तिगत जीवन
1991 में P.T. Usha ने वी. श्रीनिवासन से विवाह किया। इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए खेलों से दूरी बनाई।
हालांकि परिवार और खेल के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने दोबारा ट्रैक पर वापसी की। यह आसान नहीं था, क्योंकि उस दौर में महिला खिलाड़ियों के लिए शादी के बाद खेलों में वापसी करना आम बात नहीं मानी जाती थी।
लेकिन उषा ने यह साबित किया कि व्यक्तिगत जीवन और पेशेवर लक्ष्य साथ-साथ चल सकते हैं।
पुरस्कार और सम्मान
भारतीय खेलों में योगदान के लिए पी.टी. उषा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
1983 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके ठीक 2 साल बाद साल 1985 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें कई राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।
उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स बना अगली पीढ़ी के लिए वरदान
प्रतिस्पर्धी खेलों से दूरी बनाने के बाद उषा ने अपना अनुभव नई पीढ़ी को देने का फैसला किया।
2002 में उन्होंने केरल में Usha School of Athletics की स्थापना की। इसका उद्देश्य ग्रामीण और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली प्रतिभाओं को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देना था।
उषा मानती थीं कि उन्हें अपने करियर में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, नई पीढ़ी को वैसी चुनौतियों से नहीं गुजरना चाहिए। उनकी अकादमी से कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी निकले। इनमें टिंटू लुका (Tintu Luka) सबसे चर्चित नामों में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
खेल प्रशासन में नई भूमिका
खिलाड़ी और कोच के रूप में सफलता हासिल करने के बाद उषा ने खेल प्रशासन में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
जुलाई 2022 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया। यह उनके खेल योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी मान्यता थी।
संसद में उन्होंने खिलाड़ियों की सुविधाओं, खेल ढांचे और खेल प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखी।
भारतीय ओलंपिक संघ की पहली महिला अध्यक्ष
दिसंबर 2022 में भारतीय खेल इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा।
P.T. Usha भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) की अध्यक्ष चुनी गईं। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला और पहली ओलंपियन बनीं। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय खेल प्रशासन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी प्रतीक था।
आज वह भारतीय खेलों की नीतियों और भविष्य को आकार देने वाली महत्वपूर्ण हस्तियों में शामिल हैं।
पदकों से कहीं बड़ी विरासत
P.T. Usha की सबसे बड़ी उपलब्धि उनके पदक नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह प्रेरणा है जो उन्होंने लाखों भारतीय लड़कियों को दी। जिस दौर में खेलों में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी, उस समय उन्होंने साबित किया कि भारतीय महिला खिलाड़ी भी विश्व मंच पर सम्मान हासिल कर सकती हैं।
उनकी सफलता ने आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते खोले। अंजू बॉबी जॉर्ज, साइना नेहवाल, पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू और अनेक अन्य खिलाड़ियों की सफलता की पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं पी.टी. उषा जैसी अग्रदूतों का योगदान दिखाई देता है।
62 साल की उम्र में भी उतनी ही सक्रिय
आज 62 वर्ष की उम्र में भी P.T.Usha भारतीय खेल जगत की सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व में से एक हैं। खिलाड़ी, कोच, संस्थापक, राज्यसभा सदस्य और भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका लगातार विकसित होती रही है।
भारतीय खेल इतिहास में कुछ नाम रिकॉर्ड बुक में दर्ज होते हैं और कुछ लोगों की स्मृतियों में। P.T. Usha उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में शामिल हैं जिन्होंने दोनों जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
1984 में ओलंपिक पदक से 0.01 सेकंड दूर रह जाने वाली वह धाविका आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए उम्मीद, संघर्ष और दृढ़ता का प्रतीक है। यही वजह है कि 62 साल की उम्र में भी पी.टी. उषा केवल एक पूर्व एथलीट नहीं, बल्कि भारतीय खेलों की जीवित विरासत मानी जाती हैं।
