नेपाल की भीषण फ्लैश फ्लड ने रासुवा में सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर परियोजनाएं तबाह कर दीं। 160 से ज्यादा लोगों की मौत और सैकड़ों के लापता होने के बाद राहत अभियान जारी है।
काठमांडू/नई दिल्ली: नेपाल में बुधवार, 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास अचानक आई बाढ़ ने कुछ ही मिनटों में सड़कें, पुल, वाहन, घर, होटल और बिजली परियोजनाओं से जुड़ा बुनियादी ढांचा बहा दिया। सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र रासुवा जिले का भोटेकोशी नदी का इलाका रहा, जहां तिमुरे और रसुवागढ़ी के आसपास अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव आया।
27 अगस्त की सुबह तक नेपाल में मरने वालों की संख्या 160 से ऊपर पहुंच गई, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने इसे अभूतपूर्व आपदा बताया है। नेपाली सेना और अन्य सुरक्षा बल बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं।
इस आपदा का असर भारत तक भी पहुंचा है। नेपाल में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। वहीं नेपाल से आने वाले पानी के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों में हाई अलर्ट जारी किया गया है।
भोटेकोशी नदी में अचानक आया सैलाब
बाढ़ का सबसे भयावह असर नेपाल के रासुवा जिले में दिखाई दिया। बुधवार सुबह करीब 8:40 से 9 बजे के बीच भोटेकोशी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया। कुछ ही समय में पानी के साथ भारी मात्रा में चट्टानें, मिट्टी, बर्फ और मलबा नीचे की ओर बहने लगा।
तिमुरे, रसुवागढ़ी और स्याफ्रूबेसी जैसे इलाकों में इस तेज बहाव ने भारी नुकसान पहुंचाया। कई वाहन पानी में बह गए और सड़क तथा पुल क्षतिग्रस्त हो गए। भोटेकोशी के बाद बाढ़ का प्रभाव त्रिशूली नदी तंत्र तक भी पहुंचा। नेपाल पुलिस के अनुसार रासुवा, नुवाकोट और धादिंग समेत कई जिलों में इसका असर पड़ा।
पहाड़ी इलाकों में नदी घाटियां संकरी होने के कारण पानी को फैलने की जगह नहीं मिलती। ऐसे में जब अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे आता है तो उसका वेग बेहद खतरनाक हो जाता है। इस घटना में भी यही स्थिति देखने को मिली।
इतनी भयानक बाढ़ आई कैसे?
शुरुआत में इस घटना को लेकर कई तरह की आशंकाएं सामने आईं। लेकिन अब उपलब्ध शुरुआती वैज्ञानिक और उपग्रह विश्लेषण इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने या बर्फ-पत्थर के बड़े हिमस्खलन ने इस आपदा को जन्म दिया।
नेपाल के अधिकारियों और वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन के अनुसार, बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के गिरने से ल्हेंडे नदी का प्रवाह बाधित हुआ। इसके बाद पानी और मलबे ने अस्थायी झील जैसी स्थिति बना दी। जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटा तो पानी का विशाल प्रवाह नीचे की ओर आया और भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ आ गई।
उपग्रह तस्वीरों और अन्य शुरुआती विश्लेषणों ने भी ग्लेशियर के टूटने की संभावना को मजबूत किया है। रिपोर्टों के अनुसार, करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उससे बर्फ, चट्टान तथा मलबे का विशाल प्रवाह पैदा हुआ।
हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी इस घटना की पूरी प्रक्रिया और सटीक ट्रिगर का अध्ययन कर रहे हैं। इसलिए इसे अंतिम रूप से केवल एक कारण से जोड़ना जल्दबाजी होगी।
भूकंप को लेकर भी उठे सवाल
घटना के शुरुआती घंटों में भूकंप की आशंका भी जताई गई थी। इसका कारण यह था कि ग्लेशियर या चट्टान के बड़े हिस्से के गिरने से पैदा हुआ कंपन स्थानीय निगरानी प्रणालियों में दर्ज हुआ।
बाद के विश्लेषण में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने संकेत दिया कि दर्ज कंपन किसी पारंपरिक भूकंप के बजाय ग्लेशियर के बड़े हिस्से के गिरने से जुड़ा हो सकता है। इससे आपदा के पीछे ग्लेशियर के टूटने की संभावना और मजबूत हुई।
160 से ज्यादा मौतें, सैकड़ों लोग अब भी लापता
27 अगस्त की सुबह तक नेपाल में मृतकों की संख्या 160 से अधिक हो चुकी थी। नेपाल पुलिस और अन्य अधिकारियों के मुताबिक मृतकों की संख्या आगे बढ़ सकती है, क्योंकि कई इलाकों तक पहुंचना मुश्किल है और मलबे में दबे लोगों की तलाश अब भी जारी है।
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि हजारों लोगों के लापता होने की शुरुआती आशंका है। उन्होंने इस आपदा की भयावहता बताते हुए कहा कि कुछ स्थानों पर पूरे के पूरे इलाके कुछ ही घंटों में तबाह हो गए।
बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन इलाकों तक पहुंचना है जहां सड़कें और पुल बाढ़ में बह गए हैं। कई स्थानों पर संचार व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।
300 भारतीय भी लापता
नेपाल की इस आपदा में भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता वहां मौजूद भारतीय नागरिकों को लेकर है। सामने आ रहे आंकड़ों में मुताबिक लापता भारतीयों की संख्या करीब 300 तक पहुंच चुकी है। इनमें बड़ी संख्या कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालुओं की बताई जा रही है।
बाढ़ से प्रभावित रसुवागढ़ी और तिमुरे क्षेत्र में कई भारतीय तीर्थयात्री तिब्बत की ओर कैलाश मानसरोवर यात्रा के अगले चरण के लिए रुके हुए थे। अचानक आई बाढ़ के कारण उनके परिवारों का उनसे संपर्क टूट गया।
नेपाल पर्यटन बोर्ड की शुरुआती सूची में करीब 384 यात्रियों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी, जिनमें 291 विदेशी और 93 नेपाली नागरिक बताए गए थे। बाद की सूचनाओं में आंकड़ों में बदलाव हुआ है और अधिकारी लगातार सूची का सत्यापन कर रहे हैं।
इसलिए लापता भारतीयों की संख्या को फिलहाल अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
नेपाल सेना ने शुरू किया बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन
नेपाल सरकार ने राहत और बचाव के लिए सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस को प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने कहा कि सरकार उपलब्ध सभी संसाधनों का इस्तेमाल राहत कार्यों में कर रही है।
नेपाली सेना ने हेलीकॉप्टरों के जरिए प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को निकालना शुरू किया। प्रधानमंत्री के अनुसार, तिमुरे क्षेत्र से 116 लोगों को सुरक्षित निकाला गया, जिनमें 21 भारतीय नागरिक भी शामिल थे। बचाव दलों ने कई हवाई अभियानों के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया।
लेकिन खराब मौसम, कठिन पहाड़ी भूगोल और क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण अभियान आसान नहीं है। कई स्थानों पर जमीन के रास्ते पहुंचना लगभग असंभव हो गया है।
हाइड्रोपावर परियोजनाओं और सड़कों को भारी नुकसान
बाढ़ ने केवल लोगों और घरों को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि नेपाल के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचाया है।
भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास कई सड़कें, पुल और बिजली से जुड़ी परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। शुरुआती रिपोर्टों में छह प्रमुख हाइड्रोपावर और ट्रांसमिशन सुविधाओं के क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई थी।
नेपाल और चीन के बीच व्यापार तथा आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण सड़क संपर्क भी प्रभावित हुआ है। रसुवागढ़ी सीमा क्षेत्र तक पहुंचने वाले मार्गों के क्षतिग्रस्त होने से राहत कार्य और यात्रियों की आवाजाही दोनों प्रभावित हुए हैं।
बिहार-यूपी में हाई अलर्ट जारी
नेपाल में आई बाढ़ का असर भारत में मुख्य रूप से सीमा से लगे बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों में पानी के बढ़ते दबाव को लेकर है। नेपाल से निकलने वाली कई नदियां भारत में प्रवेश करती हैं, इसलिए अचानक बढ़ा जलप्रवाह निचले इलाकों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
केंद्र सरकार ने स्थिति पर नजर रखने के लिए संबंधित एजेंसियों को सक्रिय किया है। बिहार और उत्तर प्रदेश में NDRF को हाई अलर्ट पर रखा गया है। बिहार में कई जिलों के निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की तैयारी की गई और नदी के तटबंधों की निगरानी बढ़ाई गई।
गंडक नदी को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है। अधिकारियों ने नदी के जलस्तर और तटबंधों की लगातार निगरानी शुरू की है।
बिहार में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजने की तैयारी
बिहार सरकार ने नेपाल से आने वाले पानी के संभावित प्रभाव को देखते हुए निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को लेकर एहतियाती कदम उठाए हैं। पश्चिम चंपारण समेत कई इलाकों में प्रशासन को अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं।
NDRF की टीमें बिहार के संवेदनशील जिलों में तैनात की गई हैं। वहीं मुजफ्फरपुर सहित कुछ इलाकों में अधिकारियों ने गंडक के तटबंधों का निरीक्षण किया।
हालांकि, गुरुवार सुबह अधिकारियों ने बताया कि रात के दौरान गंडक में बढ़ा पानी कुछ हद तक कम हुआ और तत्काल घबराने जैसी स्थिति नहीं बनी। इसके बावजूद निगरानी जारी है क्योंकि नेपाल में मौसम और नदी के प्रवाह में बदलाव का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है।
भारत ने नेपाल को भेजी राहत सामग्री
भारत ने नेपाल की मदद के लिए राहत सामग्री और आवश्यक दवाएं भेजने की घोषणा की है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि भारत ने 10 टन HADR (Humanitarian Assistance and Disaster Relief) सामग्री और जरूरी दवाएं नेपाल भेजी हैं। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह नेपाल के राहत और बचाव प्रयासों में हर संभव सहायता के लिए तैयार है। भारतीय वायुसेना को भी संभावित राहत अभियान के लिए तैयार रखा गया है, जबकि NDRF की टीमें आवश्यकता पड़ने पर नेपाल में बचाव अभियान में शामिल हो सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन का कितना प्रभाव?
नेपाल की यह त्रासदी हिमालय में तेजी से बदलते पर्यावरण को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियरों के पीछे झीलें बन सकती हैं और बर्फ तथा चट्टानों की ढलानें अस्थिर हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने इस घटना में भी बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों की अस्थिरता को संभावित योगदानकारी कारकों में शामिल किया है। हालांकि, किसी एक आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा।
नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएं कितनी तेजी से बड़े मानवीय संकट में बदल सकती हैं। सैकड़ों लोगों का अब भी पता नहीं है, भारतीय तीर्थयात्रियों के परिवार अपने परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं और दोनों देशों की एजेंसियां राहत व बचाव अभियान में जुटी हैं। आने वाले घंटों में लापता लोगों की स्थिति और मृतकों की संख्या को लेकर तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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