Saturday, 18 July 2026
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Nelson Mandela Birth Anniversary: रंगभेद की दीवारें गिराकर दुनिया को इंसानियत का अर्थ सिखाने वाले नेता

जानिए कैसे नेल्सन मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी, 27 साल जेल में बिताए, नोबेल शांति पुरस्कार जीता और दक्षिण अफ्रीका को नई लोकतांत्रिक पहचान दिलाई।

जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका: कल्पना कीजिए कि किसी इंसान को सिर्फ इसलिए अपने ही देश में बराबरी का अधिकार न मिले क्योंकि उसकी त्वचा का रंग काला है। उसे अच्छे स्कूल, अस्पताल, नौकरी, वोट देने का अधिकार, यहां तक कि कहीं आने-जाने की आजादी भी सीमित कर दी जाए।

अगर वह इसके खिलाफ आवाज उठाए तो उसे देशद्रोही करार देकर जेल भेज दिया जाए। ऐसी ही व्यवस्था को दुनिया Apartheid (रंगभेद) के नाम से जानती है।

लेकिन इतिहास गवाह है कि जब अन्याय अपनी सीमा पार करता है, तब कोई न कोई उसके खिलाफ खड़ा जरूर होता है। दक्षिण अफ्रीका में यह भूमिका निभाई नेल्सन रोलीह्लाह्ला मंडेला (Nelson Rolihlahla Mandela) ने।

उन्होंने न केवल रंगभेद की जड़ें हिलाईं, बल्कि दुनिया को यह भी सिखाया कि नफरत का जवाब बदले से नहीं, बल्कि न्याय और मेल-मिलाप से दिया जा सकता है।

कौन थे नेल्सन मंडेला?

नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के म्वेज़ो (Mvezo) गांव, केप प्रांत (अब Eastern Cape) में हुआ था। उनका जन्म नाम रोलीह्लाह्ला मंडेला (Rolihlahla Mandela) था।

स्थानीय खोसा (Xhosa) भाषा में इस नाम का अर्थ लगभग “शरारती” या “पेड़ की डाल हिलाने वाला” माना जाता है।

उनके पिता गाडला हेनरी म्फाकान्यिस्वा (Gadla Henry Mphakanyiswa) थे, जो थेम्बू (Thembu) शाही परिवार के स्थानीय प्रमुख थे। उनकी मां नोसेकेनी फैनी (Nosekeni Fanny) थीं।

बचपन में मंडेला गांव के अन्य बच्चों की तरह खुले मैदानों में खेलते, पशु चराते और पारंपरिक जीवन जीते थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही बच्चा एक दिन दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाएगा।

नेल्सननाम कैसे पड़ा?

मंडेला का असली नाम रोलीह्लाह्ला था। लेकिन जब उन्होंने मिशनरी स्कूल में पढ़ाई शुरू की, तब उनकी शिक्षिका मिस म्डिंगाने (Miss Mdingane) ने उन्हें अंग्रेजी नाम “Nelson” दिया।

उस समय दक्षिण अफ्रीका में यह आम प्रथा थी कि अफ्रीकी बच्चों को स्कूलों में अंग्रेजी नाम दिए जाते थे ताकि यूरोपीय शिक्षकों के लिए उन्हें पुकारना आसान हो।

शिक्षा ने बदली सोच

मंडेला ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा क्लार्कबेरी बोर्डिंग इंस्टीट्यूट और फिर Healdtown Methodist College से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने University of Fort Hare में दाखिला लिया, जो उस समय अश्वेत छात्रों के लिए सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक था।

यहीं उनके भीतर नेतृत्व और सामाजिक न्याय की भावना मजबूत हुई। छात्र राजनीति में सक्रिय होने के कारण उन्हें विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा।

बाद में वे जोहान्सबर्ग पहुंचे, जहां उन्होंने छोटी-मोटी नौकरियां करते हुए कानून की पढ़ाई जारी रखी। अंततः उन्होंने University of South Africa और बाद में University of the Witwatersrand में लॉ का अध्ययन किया।

यही वह दौर था जब उन्होंने पहली बार नस्लीय भेदभाव को बेहद करीब से महसूस किया।

रंगभेद जिसने पूरे देश को बांट दिया

दक्षिण अफ्रीका में 1948 से लागू Apartheid नीति दुनिया की सबसे कठोर नस्लीय व्यवस्थाओं में से एक थी।

इस व्यवस्था के तहत गोरे (White) और अश्वेत (Black) लोगों के लिए अलग-अलग स्कूल, अस्पताल, बसें, ट्रेनें, समुद्र तट, पार्क और यहां तक कि रहने के इलाके भी तय कर दिए गए थे।

अश्वेत नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था। वे बिना सरकारी अनुमति के कई इलाकों में प्रवेश भी नहीं कर सकते थे। नौकरी, शिक्षा और राजनीतिक अधिकारों में भी उनके साथ व्यापक भेदभाव किया जाता था।

यह केवल सामाजिक भेदभाव नहीं था, बल्कि कानून द्वारा लागू की गई व्यवस्था थी।

यहीं से शुरू हुआ संघर्ष

साल 1944 में नेल्सन मंडेला African National Congress (ANC) में शामिल हुए। इसी वर्ष उन्होंने अपने साथियों ओलिवर टैम्बो (Oliver Tambo) और वाल्टर सिसुलु (Walter Sisulu) के साथ ANC Youth League की स्थापना की।

युवाओं का यह संगठन चाहता था कि रंगभेद के खिलाफ आंदोलन अधिक संगठित, व्यापक और प्रभावी बनाया जाए।

मंडेला का मानना था कि केवल भाषणों से बदलाव नहीं आएगा। लोगों को संगठित करना और अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से खड़ा होना जरूरी है।

गांधी से मिली प्रेरणा

दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी ने 1893 से 1914 के बीच सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध की नींव रखी थी। हालांकि उस समय मंडेला का जन्म भी नहीं हुआ था, लेकिन गांधी के संघर्ष ने वहां के स्वतंत्रता और समानता आंदोलनों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

मंडेला ने कई अवसरों पर स्वीकार किया कि गांधी के विचारों ने उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने कहा था कि गांधी ने दिखाया कि बिना हथियार उठाए भी अन्यायपूर्ण सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।

दक्षिण अफ्रीका का पहला ब्लैक लॉ फर्म

साल 1952 में नेल्सन मंडेला और उनके मित्र ओलिवर टैम्बो ने जोहान्सबर्ग में Mandela & Tambo नाम से दक्षिण अफ्रीका की पहली अश्वेतों द्वारा संचालित लॉ फर्म शुरू की।

उस दौर में अश्वेत नागरिकों को कानूनी सहायता मिलना बेहद मुश्किल था। यह फर्म हजारों गरीब और अश्वेत लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी। यहां वे कम फीस या कई बार मुफ्त में भी कानूनी सलाह देते थे।

यहीं से मंडेला केवल एक वकील नहीं, बल्कि आम लोगों के नेता के रूप में पहचाने जाने लगे।

अहिंसक आंदोलन से सशस्त्र संघर्ष तक का सफर

1950 के दशक में नेल्सन मंडेला का मानना था कि रंगभेद के खिलाफ लड़ाई अहिंसक आंदोलनों के जरिए लड़ी जानी चाहिए। उन्होंने 1952 के Defiance Campaign में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अभियान में हजारों अश्वेत नागरिकों ने नस्लभेदी कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन कर गिरफ्तारी दी। इसका उद्देश्य सरकार को यह दिखाना था कि अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है।

इसी दौरान मंडेला ने देशभर में लोगों को संगठित करना शुरू किया। उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। सरकार ने उन पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए। उन्हें सार्वजनिक सभाओं में बोलने, यात्रा करने और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया।

पास कानूनों के खिलाफ संघर्ष

रंगभेदी सरकार ने अश्वेत लोगों पर Pass Laws (पास कानून) लागू किए थे। इनके तहत अश्वेत नागरिकों को हर समय एक विशेष पासबुक साथ रखनी पड़ती थी। पुलिस कभी भी इसे जांच सकती थी और पास न मिलने पर तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता था।

यह कानून अश्वेतों की आवाजाही, रोजगार और रहने की आजादी को नियंत्रित करने का एक बड़ा हथियार था।

इन्हीं कानूनों के विरोध में पूरे दक्षिण अफ्रीका में बड़े आंदोलन हुए। कई जगह लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से अपनी पासबुकें जलाईं, हालांकि यह आंदोलन विभिन्न संगठनों द्वारा अलग-अलग समय पर चलाया गया था।

शार्पविल नरसंहार ने बदला आंदोलन का रुख

21 मार्च 1960 को दक्षिण अफ्रीका के Sharpeville शहर में पास कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था। पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं।

इस घटना में 69 लोगों की मौत हुई और लगभग 180 लोग घायल हुए।

Sharpeville Massacre ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी आलोचना हुई।

मंडेला भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सरकार केवल शांतिपूर्ण विरोध से पीछे हटने वाली नहीं है।

गिरफ्तारी और ऐतिहासिक मुकदमा

5 अगस्त 1962 को पुलिस ने मंडेला को गिरफ्तार कर लिया। पहले उन्हें देश छोड़ने और बिना अनुमति यात्रा करने के मामलों में सजा हुई।

बाद में पुलिस ने जोहान्सबर्ग के पास Rivonia इलाके में ANC के एक गुप्त ठिकाने पर छापा मारा।

यहीं से कई दस्तावेज मिले, जिनके आधार पर मंडेला और उनके साथियों पर सरकार के खिलाफ साजिश रचने तथा तोड़फोड़ की योजना बनाने के आरोप लगाए गए।

यह मुकदमा इतिहास में रिवोनिया ट्रायल (Rivonia Trial) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आजीवन कारावास की सजा

12 जून 1964 को अदालत ने नेल्सन मंडेला और उनके कई साथियों को आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा सुनाई।

उस समय दुनिया को डर था कि उन्हें फांसी दी जा सकती है, लेकिन अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई।

इसके बाद उन्हें रॉबेन आइलैंड (Robben Island) जेल भेज दिया गया।

Robben Island, केप टाउन के पास समुद्र के बीच स्थित एक छोटा द्वीप है।

यहीं मंडेला ने अपने जीवन के 18 वर्ष बिताए। बाद में उन्हें Pollsmoor और Victor Verster जेल में भी रखा गया। कुल मिलाकर उन्होंने 27 वर्ष जेल में बिताए।

जेल में उनका कैदी नंबर था— 466/64

इसका अर्थ था कि वे वर्ष 1964 के 466वें कैदी थे।

27 साल बाद मिली आजादी

करीब तीन दशक जेल में बिताने के बाद आखिरकार वह दिन भी आया, जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी। 11 फरवरी 1990 को दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति एफ. डब्ल्यू. डी. क्लार्क (F.W. de Klerk) की सरकार ने नेल्सन मंडेला को रिहा कर दिया।

जेल से बाहर निकलते समय उनकी पत्नी विनी मंडेला उनके साथ थीं। हजारों लोग सड़कों पर उनका स्वागत करने के लिए खड़े थे। यह केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं थी, बल्कि रंगभेद के अंत की शुरुआत थी। पूरी दुनिया की नजरें दक्षिण अफ्रीका पर थीं और मंडेला अब केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की वैश्विक आवाज बन चुके थे।

दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति

रिहाई के बाद मंडेला ने बदले की राजनीति के बजाय संवाद और लोकतंत्र का रास्ता चुना। उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) का नेतृत्व संभाला और रंगभेद समाप्त करने के लिए सरकार के साथ बातचीत शुरू की।

लंबी राजनीतिक प्रक्रिया के बाद 27 अप्रैल 1994 को दक्षिण अफ्रीका में पहली बार सभी नस्लों के लोगों को समान मतदान का अधिकार मिला। इसे देश का पहला लोकतांत्रिक आम चुनाव माना जाता है।

इन चुनावों में ANC ने जीत हासिल की और 10 मई 1994 को नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। उनके शपथ ग्रहण समारोह में दुनिया भर के 140 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक ऐसे देश का पुनर्जन्म था, जो दशकों तक नस्लीय भेदभाव से जूझता रहा।

ब्लैक कम्युनिटी के लिए सबसे बड़ा योगदान

नेल्सन मंडेला का सबसे बड़ा योगदान केवल रंगभेद खत्म करना नहीं था, बल्कि अश्वेत समुदाय को सम्मान और समान अधिकार दिलाना था।

उनके नेतृत्व में –

  • सभी नागरिकों को समान मतदान का अधिकार मिला।
  • नस्ल के आधार पर बने भेदभावपूर्ण कानून समाप्त किए गए।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक अश्वेत समुदाय की पहुंच बढ़ाने की कोशिश हुई।
  • गरीब और पिछड़े इलाकों में आवास, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया गया।
  • लोकतांत्रिक संविधान लागू किया गया, जिसने सभी नागरिकों को समान अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी दी।

हालांकि उनके कार्यकाल में गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हो सकीं, लेकिन उन्होंने दक्षिण अफ्रीका को गृहयुद्ध से बचाते हुए लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी।

नेल्सन मंडेला से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

1. ‘46664’ बना उनकी पहचान
जेल में उनका कैदी नंबर 466/64 था। बाद में उन्होंने इसी संख्या 46664 को HIV/AIDS जागरूकता अभियान का वैश्विक प्रतीक बना दिया।

2. रग्बी से जोड़ा पूरा देश
1995 के रग्बी वर्ल्ड कप के दौरान मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका की टीम स्प्रिंगबोक्स की जर्सी पहनकर मैदान में प्रवेश किया। यह टीम पहले गोरे समुदाय का प्रतीक मानी जाती थी। मंडेला के इस कदम ने अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच विश्वास बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3. सिर्फ एक कार्यकाल तक रहे राष्ट्रपति
उन्होंने 1999 में दूसरा कार्यकाल लड़ने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि लोकतंत्र मजबूत तभी होगा, जब सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हो।

4. बच्चों से था विशेष लगाव
राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद उन्होंने शिक्षा, बच्चों के अधिकार, गरीबी उन्मूलन और HIV/AIDS के खिलाफ जागरूकता अभियानों पर विशेष ध्यान दिया।

नोबेल शांति पुरस्कार और वैश्विक सम्मान

रंगभेद समाप्त करने और लोकतांत्रिक परिवर्तन की दिशा में योगदान के लिए 1993 में नेल्सन मंडेला और तत्कालीन राष्ट्रपति एफ. डब्ल्यू. डी. क्लार्क को संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।

इसके अलावा उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (1990) भी मिला। दुनिया के अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया।

Mandela Day क्यों मनाया जाता है?

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नवंबर 2009 में घोषणा की कि हर वर्ष 18 जुलाई को Nelson Mandela International Day मनाया जाएगा। पहली बार यह दिवस 18 जुलाई 2010 को आधिकारिक रूप से मनाया गया।

इस दिन लोगों से अपील की जाती है कि वे 67 मिनट समाज सेवा करें। यह 67 मिनट उन 67 वर्षों का प्रतीक हैं, जो मंडेला ने मानवाधिकार, समानता और न्याय के लिए संघर्ष करते हुए समाज को समर्पित किए।

5 दिसंबर 2013 को 95 वर्ष की आयु में नेल्सन मंडेला का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी दुनिया को प्रेरित करते हैं। जब भी कहीं नस्लीय भेदभाव, मानवाधिकारों का हनन या सामाजिक अन्याय की बात होती है, मंडेला का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने दुनिया को सिखाया कि महान नेता वह नहीं होता जो सत्ता हासिल कर ले, बल्कि वह होता है जो सत्ता मिलने के बाद भी समाज को जोड़ने का काम करे।

ये भी पढ़ें :- जब एक छात्रा की पढ़ाई के लिए चलता रहा पूरा रेलवे स्टेशन! जानिए जापान के Kyu-Shirataki Station की चर्चित कहानी

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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