बेटे की तलाश में नाले में खुद उतरकर कचरा हटाते रहे मिथुन के पिता की उम्मीद चार दिन बाद टूट गई। जसौला में खुले नाले में गिरे 15 वर्षीय छात्र का शव मंगलवार को मिला।
नई दिल्ली: दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जसौला इलाके में खुले नाले में गिरने के चार दिन बाद 15 वर्षीय मिथुन का शव मंगलवार को बरामद कर लिया गया। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला मिथुन शनिवार, 22 अगस्त की सुबह पतंग पकड़ने की कोशिश के दौरान खुले नाले में गिर गया था। इसके बाद दिल्ली फायर सर्विस, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), पुलिस, गोताखोरों और अन्य बचाव दलों ने लगातार उसकी तलाश की, लेकिन शुरुआती तीन दिनों तक उसका कोई पता नहीं चल सका। मंगलवार को कई दिनों की तलाश के बाद उसका शव नाले से बरामद हुआ।
इस घटना ने दिल्ली में खुले और असुरक्षित नालों की स्थिति, नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और संबंधित विभागों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद दिल्ली नगर निगम (MCD) ने कथित ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में एक जूनियर इंजीनियर को निलंबित कर दिया और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की।
पतंग पकड़ने के दौरान नाले में गिरा मिथुन
घटना 22 अगस्त की सुबह करीब 11 बजे जसौला गांव इलाके में हुई। मिथुन, जो आठवीं कक्षा का छात्र था, एक पतंग पकड़ने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान वह खुले नाले में जा गिरा और तेज बहाव में बह गया। घटना को एक अन्य बच्चे ने देखा और परिवार को इसकी जानकारी दी। इसके बाद परिवार ने अधिकारियों को सूचना दी और बचाव अभियान शुरू किया गया।
दिल्ली फायर सर्विस के अनुसार, घटना की सूचना शनिवार को करीब 11:54 बजे मिली थी। सूचना मिलते ही दो फायर टेंडर मौके पर भेजे गए और तलाश शुरू की गई। बाद में NDRF, Boat Club और अन्य बचाव दल भी अभियान में शामिल हुए।
मिथुन का परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। उसके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य दिल्ली में मजदूरी करते हैं और जसौला इलाके में रहते हैं। रिश्तेदारों के अनुसार, मिथुन पढ़ाई में अच्छा था और परिवार को उससे काफी उम्मीदें थीं।
परिवार चार दिन तक करता रहा बेटे का इंतजार
मिथुन के नाले में गिरने के बाद उसके परिवार के लिए अगले चार दिन बेहद मुश्किल रहे। बचाव दल लगातार उसकी तलाश कर रहे थे, लेकिन तेज बहाव और नाले में जमा कचरे के कारण अभियान में लगातार मुश्किलें आती रहीं।
मिथुन के पिता अवधेश कुमार अपने बेटे को तलाशने के लिए खुद भी नाले में उतर गए। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में वह नाले के भीतर हाथ और डंडे की मदद से कचरा हटाते दिखाई दिए। उनका कहना था कि अगर नाले में जमा कचरा हटाया जाए तो शायद उनका बेटा मिल सके।
मंगलवार को शव बरामद होने से पहले तक परिवार को उम्मीद थी कि शायद मिथुन जीवित मिल जाए। लेकिन करीब चार दिन बाद शव मिलने के साथ ही यह उम्मीद भी टूट गई। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।
पानी का तेज बहाव बना बड़ी चुनौती
बचाव अभियान के दौरान सबसे बड़ी चुनौती नाले में पानी का तेज और लगातार बहाव था। अधिकारियों के अनुसार, पानी के बहाव के कारण बचाव दलों के लिए नाले के भीतर लंबे समय तक तलाश करना मुश्किल हो रहा था। NDRF के गोताखोरों ने नाले और उसके आसपास के हिस्सों में तलाश की, लेकिन शुरुआती प्रयासों में कोई सफलता नहीं मिली।
यह नाला जसौला और शाहीन बाग इलाके से होकर गुजरता है। आगे जाकर इसका पानी आगरा नहर की ओर जाते हुए यमुना नदी की दिशा में पहुंचता है। नाला रिहायशी इलाके के बीच से गुजरता है और उसके दोनों ओर घर बने हुए हैं। ऐसे में खुले नाले का मौजूद होना स्थानीय लोगों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि नाले में बड़ी मात्रा में कचरा और गंदगी जमा थी, जिससे बचाव अभियान और मुश्किल हो गया। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय निवासियों ने कहा कि जमा कचरे के कारण बच्चे का पता लगाने और शव निकालने में बाधा आई।
कई एजेंसियों ने चलाया बचाव अभियान
मिथुन की तलाश के लिए एक बहु-एजेंसी अभियान चलाया गया। इसमें दिल्ली फायर सर्विस, NDRF, दिल्ली पुलिस, Boat Club के बचाव दल और गोताखोर शामिल थे। टीमों ने नाले के उस हिस्से के साथ-साथ उसके निचले क्षेत्र में भी तलाश की, जहां तेज बहाव के कारण मिथुन के बह जाने की आशंका थी।
शनिवार को कई घंटे तक तलाश के बाद अभियान रात में रोकना पड़ा और रविवार को इसे दोबारा शुरू किया गया। इसके बाद भी कई घंटों तक तलाश जारी रही। लगातार पानी के बहाव, नाले की संरचना और जमा कचरे ने बचाव टीमों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की।
MCD के जूनियर इंजीनियर पर कार्रवाई
घटना के बाद दिल्ली सरकार और नगर निगम ने जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू की। MCD ने सोमवार को जूनियर इंजीनियर अनुज कुमार को निलंबित कर दिया। उस पर ड्यूटी में कथित लापरवाही का आरोप लगाया गया है। उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की गई है।
यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई जब मिथुन का शव अभी बरामद नहीं हुआ था और बचाव अभियान जारी था। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मुख्य सचिव से घटना और नाले के अधिकार क्षेत्र से जुड़ी जानकारी मांगी थी तथा जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद MCD ने जूनियर इंजीनियर के निलंबन की कार्रवाई हुई।
खुले नाले ने फिर उठाए सुरक्षा पर सवाल
दिल्ली में खुले नालों और जल निकासी व्यवस्था से जुड़े हादसे कोई नई समस्या नहीं हैं। बारिश के मौसम में नालों में पानी का स्तर बढ़ने और बहाव तेज होने के कारण इनके आसपास रहने वाले लोगों के लिए खतरा और बढ़ जाता है।
जसौला की घटना में सबसे गंभीर बात यह है कि नाला रिहायशी क्षेत्र के बीच से गुजरता है। आसपास घर और लोगों की आवाजाही होने के बावजूद नाला खुला था। ऐसे में बच्चों के लिए इसका खतरा और अधिक है।
मिथुन पतंग पकड़ने के दौरान नाले के करीब पहुंचा। यह कोई असामान्य गतिविधि नहीं थी। लेकिन खुले और असुरक्षित नाले के कारण एक सामान्य बचपन की गतिविधि कुछ ही क्षणों में जानलेवा हादसे में बदल गई।
इसी वजह से घटना के बाद स्थानीय लोगों में गुस्सा भी देखा गया। उनका सवाल है कि अगर नाले को पूरी तरह ढकना संभव नहीं था तो कम से कम उसके आसपास मजबूत सुरक्षा अवरोध, जाली या बैरिकेड क्यों नहीं लगाए गए?
कचरा और गाद ने बढ़ाई परेशानी
बचाव अभियान के दौरान नाले में जमा कचरा भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया। स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि नाले में कचरे का ढेर जमा था और इससे बचाव दलों को तलाश करने में कठिनाई हुई।
मिथुन के पिता का खुद नाले में उतरकर कचरा हटाने की कोशिश करना इस स्थिति की गंभीरता को दिखाता है। परिवार के लिए उस समय प्राथमिकता सिर्फ अपने बेटे को ढूंढना थी, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी जोखिम क्यों न उठाना पड़े।
हालांकि, बचाव अभियानों में प्रशिक्षित टीमों की मौजूदगी के बावजूद परिवार के सदस्य को नाले में उतरने की जरूरत महसूस होना प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार को सुरक्षित रखते हुए प्रभावी खोज अभियान चलाना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है।
पहले भी सामने आ चुकी है ऐसी घटनाएं
जसौला की घटना ने दिल्ली में खुले नालों से होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर चिंता फिर बढ़ा दी है। घटना से कुछ ही समय पहले दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के मदनपुर खादर इलाके में भी एक 18 वर्षीय व्यक्ति की नाले में गिरने के बाद मौत हुई थी। वह बारिश के पानी के तेज बहाव में बह गया था और उसका शव अगले दिन आगरा नहर से बरामद किया गया था।
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि मानसून के दौरान खुले नाले और जल निकासी चैनल कितने खतरनाक हो सकते हैं। खासकर उन इलाकों में जहां नाले घरों, सड़कों और पैदल रास्तों के करीब से गुजरते हैं।
बारिश के दौरान इन नालों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ता है। ऊपर से कचरा और गाद जमा होने के कारण नाले की वास्तविक गहराई और बहाव का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में किसी व्यक्ति के फिसलने या गिरने पर कुछ ही सेकंड में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
नागरिक जिम्मेदारी पर भी उठते सवाल
इस घटना में प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ-साथ नागरिक सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण है। खुले नालों के पास बच्चों को जाने से रोकने के लिए परिवारों और स्थानीय समुदाय की भूमिका भी अहम है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी सार्वजनिक खतरे की जिम्मेदारी केवल नागरिकों पर डाल दी जाए। अगर कोई बड़ा नाला रिहायशी क्षेत्र के बीच से गुजरता है तो उसकी सुरक्षा, रखरखाव और निगरानी संबंधित नागरिक निकाय की जिम्मेदारी होती है।
जसौला की घटना में अब जांच का एक अहम हिस्सा यह होना चाहिए कि नाले की स्थिति पहले से कैसी थी, वहां सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं थी, नाले की सफाई और रखरखाव कितनी नियमितता से होता था और घटना के समय संबंधित अधिकारियों ने सुरक्षा मानकों का पालन किया था या नहीं।
चार दिन की तलाशी का दुखद अंत
22 अगस्त को जब मिथुन नाले में गिरा था, तब परिवार और बचाव दलों को उम्मीद थी कि उसे जल्द ढूंढ लिया जाएगा। लेकिन समय बीतने के साथ उम्मीद कमजोर होती गई। परिवार लगातार मौके पर मौजूद रहा और बचाव टीमों ने भी नाले के अलग-अलग हिस्सों में तलाश जारी रखी।
चार दिन बाद मंगलवार को मिथुन का शव मिलने के साथ इस खोज अभियान का दुखद अंत हुआ। यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह दिल्ली के शहरी बुनियादी ढांचे से जुड़ा ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ एक अधिकारी के निलंबन से नहीं मिलेगा। असली सवाल यह है कि क्या शहर में मौजूद खुले नालों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित किया जाएगा?
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