पुरुष और महिला की पारंपरिक पहचान से अलग खुद को देखने वाले लोगों के अधिकारों और सम्मान के लिए हर साल 14 जुलाई को International Non-Binary People’s Day मनाया जाता है। जानिए इसका महत्व, इतिहास, कानूनी मान्यता और इससे जुड़ी चुनौतियां।
नई दिल्ली: 14 जुलाई को दुनिया भर में International Non-Binary People’s Day मनाया जाता है। यह दिन उन लोगों की पहचान, सम्मान और अधिकारों को समर्पित है, जो खुद को केवल पुरुष (Male) या महिला (Female) की पारंपरिक लैंगिक पहचान तक सीमित नहीं मानते।
समाज में लंबे समय से गैर-द्विआधारी (Non-Binary) लोगों को गलतफहमियों, भेदभाव और सामाजिक अस्वीकार्यता का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह दिन केवल जागरूकता बढ़ाने का अवसर नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का भी दिन है कि हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है।
हाल के वर्षों में दुनिया के कई देशों में गैर-द्विआधारी लोगों को कानूनी पहचान, समान अवसर और भेदभाव से सुरक्षा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। हालांकि सामाजिक स्वीकृति की राह अभी भी आसान नहीं है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक जीवन में आज भी उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
क्या है Non-Binary पहचान?
आमतौर पर समाज में लिंग (Gender) को दो श्रेणियों पुरुष और महिला में देखा जाता है। लेकिन Non-Binary वे लोग होते हैं, जिनकी लैंगिक पहचान इन दोनों पारंपरिक श्रेणियों में पूरी तरह फिट नहीं बैठती।
कुछ लोग खुद को पुरुष और महिला दोनों का मिश्रण मानते हैं, कुछ इनमें से किसी एक से भी अपनी पहचान नहीं जोड़ते, जबकि कुछ की लैंगिक पहचान समय के साथ बदलती रहती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि Gender Identity और Sex दो अलग-अलग बातें हैं।
जन्म के समय शरीर के आधार पर निर्धारित जैविक लिंग (Sex) और व्यक्ति की स्वयं की लैंगिक पहचान (Gender Identity) हमेशा एक जैसी हो, यह आवश्यक नहीं है।
कैसे शुरू हुआ International Non-Binary People’s Day?
International Non-Binary People’s Day पहली बार 2012 में मनाया गया था। इसकी शुरुआत अमेरिकी कार्यकर्ता Katje van Loon ने की थी। इसका उद्देश्य उन लोगों को एक अलग पहचान और मंच देना था, जिनकी आवाज़ अक्सर LGBTQIA+ समुदाय के भीतर भी पर्याप्त रूप से सामने नहीं आ पाती थी।
इस दिन को चुनने के पीछे भी एक प्रतीकात्मक सोच है। 14 जुलाई, International Women’s Day (8 मार्च) और International Men’s Day (19 नवंबर) के ठीक बीच का दिन पड़ता है। यह संदेश देता है कि समाज केवल दो लैंगिक पहचान तक सीमित नहीं है और उनके बीच भी अनेक पहचानें मौजूद हैं, जिन्हें समान सम्मान मिलना चाहिए।
आज यह दिवस यूरोप, उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के कई अन्य हिस्सों में जागरूकता अभियानों, सेमिनार, सामुदायिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से मनाया जाता है।
LGBTQIA+ समुदाय में Non-Binary की जगह
LGBTQIA+ समुदाय में अलग-अलग लैंगिक पहचान और यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) शामिल हैं। इनमें Non-Binary पहचान लैंगिक पहचान (Gender Identity) से जुड़ी है, न कि यौन आकर्षण (Sexual Orientation) से।
यानी कोई Non-Binary व्यक्ति समलैंगिक (Gay), विषमलैंगिक (Straight), उभयलिंगी (Bisexual), पैनसेक्शुअल (Pansexual) या किसी अन्य यौन पहचान का हो सकता है। दोनों बातों को एक जैसा मानना एक सामान्य लेकिन गलत धारणा है।
इतिहास में कब से मौजूद है यह पहचान?
अक्सर यह माना जाता है कि Non-Binary पहचान आधुनिक दौर की अवधारणा है, जबकि इतिहास में भी इसकी कहानी देखी जाती है।
दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताओं में दो से अधिक लैंगिक पहचानों का उल्लेख मिलता है। दक्षिण एशिया में हिजड़ा समुदाय, उत्तर अमेरिका की कई स्वदेशी जनजातियों में Two-Spirit परंपरा, समोआ में Fa’afafine और मेक्सिको के ज़ापोटेक समुदाय में Muxe जैसी पहचानें सदियों से मौजूद रही हैं।
यानी गैर-द्विआधारी पहचान कोई नया विचार नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति का भी हिस्सा रही है। आधुनिक समय में केवल इसके लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा और कानूनी मान्यता अधिक स्पष्ट हुई है।
Non-Binary समुदाय को वैश्विक पहचान दिलाने वाले लोग
पिछले कुछ वर्षों में कई प्रसिद्ध हस्तियों ने सार्वजनिक रूप से स्वयं को Non-Binary घोषित किया, जिससे इस समुदाय को वैश्विक स्तर पर अधिक दृश्यता मिली।
अमेरिकी कवि, लेखक और जेंडर-अधिकार कार्यकर्ता आलोक वैद-मेनन (Alok Vaid-Menon) दुनिया भर में गैर-द्विआधारी लोगों के अधिकारों की सबसे प्रमुख आवाज़ों में गिने जाते हैं। वे अपने लेखन, व्याख्यान और सार्वजनिक अभियानों के माध्यम से लैंगिक विविधता को स्वीकार करने की वकालत करते हैं।
ब्रिटिश गायक सैम स्मिथ (Sam Smith) ने 2019 में स्वयं को Non-Binary बताते हुए they/them pronouns अपनाने की घोषणा की थी। उनके इस फैसले ने दुनिया भर में Gender Identity को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी।
अमेरिकी गायिका डेमी लोवाटो (Demi Lovato) ने भी स्वयं को Non-Binary के रूप में पहचान दी थी और लैंगिक पहचान पर खुलकर बात की। हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि वे she/her pronouns का भी उपयोग करती हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक बातचीत ने Gender Identity को लेकर जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रिटिश अभिनेत्री एम्मा कोरिन (Emma Corrin), जिन्हें The Crown में प्रिंसेस डायना की भूमिका के लिए जाना जाता है, भी स्वयं को Non-Binary के रूप में पहचानती हैं और जेंडर-न्यूट्रल पहचान के समर्थन में लगातार आवाज़ उठाती रही हैं।
दुनिया भर में उठते अधिकारों की मांग
हाल के वर्षों में Non-Binary समुदाय ने केवल सामाजिक स्वीकृति ही नहीं, बल्कि कानूनी और संस्थागत बदलावों की भी मांग तेज़ की है। उनकी प्रमुख मांगों में सरकारी दस्तावेजों में पुरुष और महिला के अलावा तीसरे या जेंडर-न्यूट्रल विकल्प की सुविधा, शिक्षा और रोजगार में भेदभाव से सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच, सार्वजनिक स्थानों पर समावेशी सुविधाएं तथा अपनी पसंद के नाम और सर्वनाम (Pronouns) को सम्मानपूर्वक स्वीकार किए जाने की मांग शामिल है।
कई मानवाधिकार संगठन यह भी कहते हैं कि पहचान से जुड़े दस्तावेज़ बदलने की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए और किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान को केवल चिकित्सीय प्रमाणपत्रों के आधार पर निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए।
किन देशों ने दी है कानूनी मान्यता?
दुनिया के कई देशों ने गैर-द्विआधारी या तीसरे जेंडर की कानूनी पहचान को अलग-अलग रूपों में स्वीकार किया है।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड पासपोर्ट में ‘X’ जेंडर मार्कर की सुविधा देने वाले शुरुआती देशों में शामिल रहे हैं। जर्मनी ने जन्म पंजीकरण में पुरुष और महिला के अलावा एक अतिरिक्त जेंडर विकल्प उपलब्ध कराया।
कनाडा के कई प्रांतों और संघीय दस्तावेजों में भी ‘X’ जेंडर मार्कर का विकल्प मौजूद है। नीदरलैंड सहित कई यूरोपीय देशों में भी जेंडर पहचान से जुड़े कानूनों में लगातार सुधार किए जा रहे हैं।
हालांकि दुनिया के अधिकांश देशों में गैर-द्विआधारी लोगों को अब भी पूर्ण कानूनी मान्यता नहीं मिली है और कई स्थानों पर उन्हें केवल पुरुष या महिला के रूप में ही दस्तावेज़ बनवाने पड़ते हैं।
भारत में क्या है स्थिति?
भारत में Non-Binary पहचान पर चर्चा अपेक्षाकृत नई है, लेकिन लैंगिक विविधता को लेकर न्यायपालिका और कानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत सरकार मामले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे जेंडर के रूप में संवैधानिक मान्यता दी थी। इसके बाद Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 लागू किया गया, जिसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ भेदभाव रोकना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।
हालांकि कई गैर-द्विआधारी कार्यकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में Non-Binary पहचान को लेकर अब भी स्पष्टता और अलग पहचान की जरूरत है। उनका मानना है कि सरकारी दस्तावेजों, शिक्षा संस्थानों और कार्यस्थलों पर अधिक समावेशी नीतियां बनाई जानी चाहिए।
आज भी चुनौतियों का सामना करते Non-Binary लोग
तमाम कानूनी सुधारों के बावजूद वास्तविक जीवन में गैर-द्विआधारी लोगों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
शिक्षा संस्थानों में गलत संबोधन (Misgendering), कार्यस्थलों पर भेदभाव, परिवार द्वारा अस्वीकार किए जाने, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और स्वास्थ्य सेवाओं में संवेदनशीलता की कमी जैसी चुनौतियां आज भी आम हैं।
अनेक अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि LGBTQIA+ समुदाय के लोगों में मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव का खतरा सामान्य आबादी की तुलना में अधिक हो सकता है। विशेषज्ञ इसके लिए सामाजिक भेदभाव, अस्वीकार्यता और लगातार होने वाले पूर्वाग्रहों को प्रमुख कारण मानते हैं।
सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं की भूमिका
दुनिया भर में कई संगठन गैर-द्विआधारी लोगों के अधिकारों के लिए लगातार काम कर रहे हैं। Workplace Pride, Stonewall, Human Rights Campaign, ILGA World और कई स्थानीय संगठन कार्यस्थलों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में समावेशी नीतियों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।
इन संगठनों का मानना है कि केवल कानून बदलने से समाज नहीं बदलता। इसके लिए शिक्षा, जागरूकता और संवेदनशील व्यवहार भी उतना ही जरूरी है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई आवाज़
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने Non- Binary समुदाय को अपनी बात रखने का एक नया मंच दिया है। पहले जहां मुख्यधारा की मीडिया में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित थी, वहीं अब सोशल मीडिया के जरिए वे अपने अनुभव, संघर्ष और उपलब्धियां दुनिया के सामने साझा कर पा रहे हैं।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि ऑनलाइन ट्रोलिंग, नफरत फैलाने वाले संदेश और साइबर बुलिंग जैसी समस्याएं अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
समानता का संदेश देता एक खास दिवस
International Non-Binary People’s Day केवल एक प्रतीकात्मक दिवस नहीं है। यह समाज को समझाने का प्रयास भी है कि हर व्यक्ति की पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए, चाहे वह पारंपरिक लैंगिक श्रेणियों में आता हो या नहीं।
आज दुनिया के कई देशों में कानून बदल रहे हैं, संस्थाएं अधिक समावेशी बनने की कोशिश कर रही हैं और सामाजिक जागरूकता भी बढ़ रही है। इसके बावजूद समानता और सम्मान की मंजिल अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुई है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती इसी में है कि वह विविधता को स्वीकार करे और हर नागरिक को बिना भेदभाव के समान अवसर उपलब्ध कराए। यही संदेश International Non-Binary People’s Day भी दुनिया को देता है। पहचान चाहे जो भी हो, सम्मान और अधिकार सभी के लिए समान होने चाहिए।
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