दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने ब्रजभूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बरी कर दिया। जानिए फैसले के बाद विनेश फोगाट और पहलवानों ने क्या कहा।
नई दिल्ली: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार, 3 अगस्त को भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व बीजेपी सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह को छह महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बरी कर दिया। अदालत ने इस मामले में सह-आरोपी और WFI के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को भी आरोपों से बरी कर दिया।
फैसले के बाद पहलवानों की ओर से निराशा जताई गई है। ओलंपियन विनेश फोगाट ने कहा कि पहलवानों ने उम्मीद नहीं खोई है और वे फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।
यह मामला पिछले तीन वर्षों से देश की राजनीति, खेल प्रशासन और महिला सुरक्षा से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में रहा है। 2023 में देश के शीर्ष पहलवानों द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर किए गए विरोध प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान खींचा था।
पहलवानों ने तत्कालीन WFI अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
अब दिल्ली की अदालत के फैसले के बाद इस मामले में एक नया मोड़ आया है। जहां बचाव पक्ष ने फैसले को न्याय की जीत बताया है, वहीं शिकायतकर्ता पहलवानों ने इसे अंतिम फैसला नहीं माना है और उच्च अदालत का रुख करने की बात कही है।
अदालत ने क्या फैसला सुनाया?
राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार ने ब्रजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को मामले में बरी कर दिया। यह फैसला उस आपराधिक मामले में आया, जिसमें छह महिला पहलवानों ने ब्रजभूषण पर अलग-अलग मौकों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
अदालत ने जुलाई 2026 में मामले की सुनवाई और अंतिम दलीलें पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। 2 जुलाई को अदालत ने घोषणा की थी कि फैसला 3 अगस्त को सुनाया जाएगा। इसके बाद सोमवार को अदालत ने अपना निर्णय सुनाते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया।
फैसले के विस्तृत कारणों और अदालत की पूरी टिप्पणी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह मामला लंबे समय तक देशव्यापी बहस का केंद्र रहा। अदालत के विस्तृत फैसले में यह स्पष्ट होगा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और गवाहियों को अदालत ने किस आधार पर आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बचाव पक्ष ने मामले में कथित विरोधाभासों, असंगतियों और शिकायतों में हुई देरी को अपने पक्ष में प्रमुख आधार के रूप में रखा था।
इन धाराओं के तहत चला था मामला
दिल्ली पुलिस ने जून 2023 में ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354, 354A, 354D और 506(1) के तहत आरोप शामिल थे। ये धाराएं महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल प्रयोग, यौन उत्पीड़न, पीछा करने और आपराधिक धमकी से संबंधित थीं।
मामले में WFI के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर भी आरोपी थे। अदालत ने मई 2024 में ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कुछ आरोप तय किए थे और तोमर के खिलाफ भी आपराधिक धमकी से संबंधित आरोपों पर सुनवाई आगे बढ़ी थी। हालांकि, छह शिकायतकर्ताओं में से एक की शिकायत के संबंध में ब्रजभूषण को अदालत ने आरोपों से मुक्त कर दिया था।
छह महिला पहलवानों ने लगाए थे आरोप
यह मामला छह महिला पहलवानों की शिकायतों से जुड़ा था। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि 2016 से 2019 के बीच अलग-अलग मौकों पर उनका कथित यौन उत्पीड़न किया गया।
आरोपों में WFI कार्यालय, ब्रजभूषण के आधिकारिक आवास और विदेशों में आयोजित प्रतियोगिताओं तथा आधिकारिक कार्यक्रमों के दौरान कथित घटनाओं का उल्लेख किया गया था।
दिल्ली पुलिस ने जांच के बाद ब्रजभूषण के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया और अदालत में मामला आगे बढ़ा। मुकदमे की सुनवाई बंद कमरे यानी इन-कैमरा कार्यवाही में हुई। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ताओं के अलावा WFI और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) से जुड़े अधिकारियों समेत कई गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन
इस मामले ने मई 2023 में उस समय देशभर में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद पैदा किया, जब विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया समेत कई शीर्ष पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया।
पहलवानों की मांग थी कि ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की जाए और उन्हें WFI के अध्यक्ष पद से हटाया जाए। प्रदर्शन लंबे समय तक चला और धीरे-धीरे यह आंदोलन महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा, खेल संस्थानों में जवाबदेही और यौन उत्पीड़न की शिकायतों से निपटने की व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय बहस में बदल गया।
प्रदर्शन के दौरान पहलवानों और दिल्ली पुलिस के बीच टकराव की तस्वीरें भी सामने आई थीं। इस पूरे घटनाक्रम ने खेल जगत के साथ-साथ राजनीतिक दलों को भी आमने-सामने ला दिया था।
बाद में दिल्ली पुलिस ने मामले में FIR दर्ज की और जून 2023 में आरोपपत्र दाखिल किया। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और मई 2024 में आरोप तय किए गए।
नाबालिग पहलवान से जुड़ा POCSO मामला
ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ एक नाबालिग पहलवान से जुड़े POCSO कानून के तहत भी मामला दर्ज हुआ था। यह मामला वर्तमान छह महिला पहलवानों से जुड़े आपराधिक मामले से अलग था।
बाद में दिल्ली पुलिस ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। नाबालिग शिकायतकर्ता के अपने पुराने आरोपों से पीछे हटने के बाद अदालत ने इस मामले को बंद कर दिया था। इसलिए सोमवार को आया फैसला उस अलग POCSO मामले पर नहीं, बल्कि छह महिला पहलवानों की शिकायतों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले पर था।
विनेश फोगाट की प्रतिक्रिया
अदालत के फैसले के बाद पहलवानों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ओलंपियन विनेश फोगाट ने फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि उन्हें न्याय की उम्मीद अभी भी है और पहलवान इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।
फोगाट ने यह भी आरोप लगाया कि पूरा सिस्टम ब्रजभूषण शरण सिंह को बचाने की कोशिश कर रहा था। हालांकि, यह उनका राजनीतिक और व्यक्तिगत आरोप है, जबकि अदालत का फैसला अपने न्यायिक मूल्यांकन पर आधारित है।
फोगाट ने स्पष्ट किया कि अदालत से बरी होने के बावजूद उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। उनके अनुसार, शिकायतकर्ता पहलवान उच्च न्यायालय का रुख करने की तैयारी कर रहे हैं। बजरंग पूनिया ने भी इस मामले में आगे कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है।
यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2023 के आंदोलन में विनेश फोगाट उन प्रमुख चेहरों में थीं, जिन्होंने ब्रजभूषण के खिलाफ कार्रवाई की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया था। बाद में फोगाट राजनीति में भी सक्रिय हुईं और कांग्रेस में शामिल होकर हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ा।
ब्रजभूषण शरण सिंह ने क्या कहा?
फैसले के बाद ब्रजभूषण शरण सिंह ने अदालत के निर्णय पर संतोष जताया और इसे अपने लिए राहत का दिन बताया। उनके पक्ष की ओर से कहा गया कि अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहियों में कथित विरोधाभास और देरी जैसे पहलुओं का भी बचाव पक्ष ने उल्लेख किया था।
बचाव पक्ष के वकील ने मामले में कथित असंगतियों और गवाहियों के बीच विरोधाभास को महत्वपूर्ण बताया। हालांकि, फैसले के विस्तृत कारण सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा कि अदालत ने किन साक्ष्यों को किस तरह देखा और किन कानूनी आधारों पर आरोपों को सिद्ध नहीं माना।
WFI और भारतीय कुश्ती में भी आया बड़ा बदलाव
यह विवाद केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं रहा। इसका असर भारतीय कुश्ती प्रशासन पर भी पड़ा। ब्रजभूषण शरण सिंह लंबे समय तक WFI के अध्यक्ष रहे और उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय कुश्ती में उनका प्रभाव काफी मजबूत माना जाता था।
2023 के विरोध प्रदर्शन के बाद WFI के प्रशासन और चुनाव प्रक्रिया को लेकर भी विवाद हुए। भारतीय कुश्ती महासंघ की गतिविधियों पर निगरानी, चुनावों और उसके बाद के प्रशासन को लेकर खेल मंत्रालय तथा अन्य संस्थाओं की भूमिका चर्चा में रही।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी उठाया कि खेल संस्थानों में खिलाड़ियों की शिकायतों को किस तरह सुना जाए और किसी भी पदाधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगने पर निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित की जाए।
क्या अब मामला पूरी तरह खत्म हो गया?
अदालत से बरी होने के बाद भी इस मामले की कानूनी यात्रा पूरी तरह खत्म होती नजर नहीं आ रही है। शिकायतकर्ता पहलवानों ने फैसले को चुनौती देने की बात कही है। ऐसे में अगला कानूनी कदम ऊपरी अदालत में अपील के रूप में सामने आ सकता है।
हालांकि, अपील की प्रक्रिया और उसके परिणाम पर अभी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यदि शिकायतकर्ता पक्ष ऊपरी अदालत में जाता है, तो वहां निचली अदालत के फैसले और मामले से जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा की जा सकती है।
इसलिए 3 अगस्त 2026 का फैसला इस मामले का एक महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन यह संभव है कि इसकी कानूनी कहानी आगे भी जारी रहे।
एक लंबी लड़ाई का नया मोड़
ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों की शिकायतों से शुरू हुआ विवाद भारतीय खेल इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों में शामिल रहा है। जंतर-मंतर का धरना, पहलवानों का आंदोलन, दिल्ली पुलिस की जांच, आरोपपत्र, अदालत में आरोप तय होना और फिर दो साल से अधिक चली सुनवाई, इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय कुश्ती को गहराई से प्रभावित किया।
अब 3 अगस्त 2026 को दिल्ली की अदालत ने ब्रजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया है। लेकिन शिकायतकर्ता पहलवानों ने साफ कर दिया है कि वे इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई आगे जारी रखेंगे।
इसलिए फिलहाल यह मामला एक निर्णायक अंत से ज्यादा एक नए कानूनी अध्याय की शुरुआत जैसा दिखाई दे रहा है। एक तरफ अदालत का फैसला है, दूसरी तरफ शिकायतकर्ता पक्ष की अपील की तैयारी। आने वाले समय में ऊपरी अदालत की कार्यवाही यह तय कर सकती है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले की कानूनी दिशा आगे किस ओर जाती है।
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