Monday, 13 July 2026
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भारत ने ग्रामीण बौद्ध विरासत को सशक्त बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर लिया नेतृत्व

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भारत के नेतृत्व और समन्वित संरक्षण मॉडल की सराहना की

नई दिल्ली: भारत ने ग्रामीण बौद्ध स्थलों के संरक्षण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया, जिसमें दिल्ली घोषणा और नागार्जुनकोंडा में राष्ट्रीय अकादमी शामिल हैं।

भारतीय ग्रामीण विरासत एवं विकास ट्रस्ट (ITRHD) द्वारा आयोजित तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से हुए इस तीन दिवसीय सम्मेलन में एशिया, यूरोप और अमेरिका से विद्वान, बौद्ध भिक्षु, विरासत संरक्षण विशेषज्ञ और नीति-निर्माता शामिल हुए। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत के सैकड़ों कम-ज्ञात ग्रामीण बौद्ध स्थलों के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करना था। प्रस्तावित राष्ट्रीय अकादमी के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने पांच एकड़ भूमि आवंटित की है। इस अकादमी को ग्रामीण बौद्ध विरासत के प्रशिक्षण, प्रलेखन और समुदाय-केंद्रित संरक्षण के लिए समर्पित देश की पहली विशेषीकृत संस्था के रूप में विकसित किए जाने की योजना है।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में ITRHD के अध्यक्ष एस. के. मिश्रा ने ग्रामीण बौद्ध स्थलों के प्रलेखन और संरक्षण के लिए समन्वित व संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। अपने संबोधन में पद्म विभूषण डॉ. करण सिंह ने कहा कि “भारत हमेशा बुद्ध की धरती रहेगा” और इस बात को रेखांकित किया कि स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना विरासत संरक्षण के प्रयास टिकाऊ नहीं हो सकते।

धर्माचार्य शांतुम सेठ ने ग्रामीण कारीगरों, जीवित परंपराओं और स्थानीय ज्ञान की भूमिका को रेखांकित करते हुए बौद्ध विरासत के पुनरुद्धार को “संघ का कार्य” बताया, जिसके लिए सामूहिक और सतत सहभागिता आवश्यक है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के प्रतिनिधियों ने कहा कि प्रभावी संरक्षण केवल भौतिक स्मारकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनसे जुड़े समुदायों और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सम्मेलन के पहले दिन के पहले तकनीकी सत्र में स्पीति घाटी स्थित ताबो मठ के आध्यात्मिक सिंहासन धारक परम पूज्य क्याबजे सर्कोंग त्सेनशप रिनपोछे ने ग्रामीण भारत में बौद्ध विरासत स्थलों के संरक्षण से जुड़ी विशिष्ट और जटिल चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

विश्व-प्रसिद्ध ताबो मठ, जिसका निर्माण 996 ईस्वी में हुआ था और जो गौतम बुद्ध के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाने वाली उत्कृष्ट भित्ति चित्रों और फ्रेस्को कला के लिए जाना जाता है का उदाहरण देते हुए रिनपोछे ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही असामान्य और अत्यधिक वर्षा ने इस मठ को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हिमालय के मध्य 10,760 फीट की ऊंचाई पर स्थित, पारंपरिक रूप से शुष्क इस क्षेत्र में बादल फटने और लगातार भारी बारिश की घटनाओं ने संकुचित मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों से निर्मित एक हजार वर्ष से अधिक पुराने ढांचे को व्यापक क्षति पहुंचाई है।

उन्होंने बताया कि अत्यधिक नमी के रिसाव के कारण भित्ति चित्रों में फफोले पड़ गए हैं, रंग फीके पड़ गए हैं और मठ के मुख्य देवता अमिताभ की प्रतिमा भी क्षतिग्रस्त हुई है। ताबो मठ दुनिया का सबसे प्राचीन जीवित बौद्ध मठ है, जहां एक हजार वर्षों से अधिक समय से निरंतर बौद्ध अध्ययन और साधना की परंपरा चली आ रही है।

रिनपोछे ने बताया कि संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक होने के कारण ताबो मठ का प्रबंधन प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत लगे कानूनी प्रतिबंधों के कारण स्वयं मरम्मत या पुनरस्थापन कार्य नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा, “ताबो मठ केवल एक बौद्ध स्थल नहीं है; यह राष्ट्रीय और वैश्विक विरासत की अमूल्य धरोहर है। जलवायु परिवर्तन अब इसके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। यदि समय रहते संवेदनशील और वैज्ञानिक हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो जीवंत इतिहास, कला और आध्यात्मिक परंपरा के सदियों पुराने प्रमाण नष्ट हो सकते हैं। ऐसे स्थलों का संरक्षण व्यक्तिगत या संस्थागत प्रयासों से आगे बढ़कर सामूहिक और समन्वित कार्रवाई की मांग करता है।”

सम्मेलन के दूसरे दिन, नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अमिताभ कांत ने कहा कि बौद्ध विरासत के संरक्षण को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने ऐसे बौद्ध पर्यटन मॉडल विकसित करने का आह्वान किया, जो चिंतनशील हों और स्थानीय समुदायों को वास्तविक लाभ पहुंचाएं।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े विरासत विशेषज्ञ प्रोफेसर अमरेश्वर गल्ला और डॉ. प्रजापति त्रिवेदी सहित अन्य विशेषज्ञों ने मजबूत प्रलेखन, अकादमिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत उस विरासत की रक्षा नहीं कर सकता, जिसे उसने अभी पूरी तरह समझा ही नहीं है।
सम्मेलन का समापन दिल्ली घोषणा को अपनाने के साथ हुआ। आठ बिंदुओं वाली इस घोषणा में ग्रामीण बौद्ध विरासत को जीवंत संस्कृति के रूप में मान्यता दी गई है। इसमें समुदाय की भागीदारी को मजबूत करने, प्रौद्योगिकी आधारित प्रलेखन, प्रस्तावित एशियाई कंसोर्टियम के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग और नागार्जुनकोंडा अकादमी की स्थापना के लिए संस्थागत समर्थन का आह्वान किया गया है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भारत के नेतृत्व की सराहना करते हुए इस सम्मेलन को समन्वित विरासत संरक्षण का संभावित वैश्विक मॉडल बताया।

भूमि आवंटन और साझा रोडमैप के साथ, दिल्ली में हुआ यह सम्मेलन ग्रामीण बौद्ध विरासत के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रस्तावित अकादमी से दीर्घकालिक शोध, प्रशिक्षण और समुदाय विकास प्रयासों को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिससे संरक्षण को सतत ग्रामीण आजीविका से जोड़ा जा सकेगा और एशिया में बौद्ध विरासत के भविष्य को आकार देने में भारत की भूमिका और सुदृढ़ होगी।

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Mansi Sharma

लेखक

Mansi Sharma is a journalist covering Global Affairs, and wellness, known for turning complex ideas into sharp, engaging narratives. Her work is driven by curiosity, depth, and a constant urge to question and explore. When she’s not writing, you’ll often find her diving into new ideas—preferably with a cup of coffee in hand, one sip at a time.

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