चीन सीमा के करीब न्योमा एयरबेस पर भारी सैन्य परिवहन विमान की सफल लैंडिंग, वायुसेना ने इसे रणनीतिक एयरलिफ्ट क्षमता और क्रू के कौशल का बड़ा प्रदर्शन बताया
लेह/ नई दिल्ली: भारतीय वायुसेना ने सैन्य विमानन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। लद्दाख के बेहद ऊंचाई वाले इलाके में एक ऐसा कारनामा किया गया है, जिसने दुनिया का ध्यान भारत की सैन्य और तकनीकी क्षमताओं की ओर खींचा है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में भारी विमान का संचालन अपने आप में चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में भारतीय वायुसेना ने अपने एक बड़े परिवहन विमान के जरिए नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
यह उपलब्धि पूर्वी लद्दाख के न्योमा एयरबेस पर हासिल की गई। यहां भारतीय वायुसेना के IL-76MD परिवहन विमान ने सफलतापूर्वक लैंडिंग की। वायुसेना के मुताबिक, इस विमान ने दुनिया में अब तक की अपनी सबसे अधिक ऊंचाई पर लैंडिंग की है।
इस कामयाबी को सिर्फ विमान के प्रदर्शन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे भारत की सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य रसद और भारी उपकरण पहुंचाने की क्षमता को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
IL-76MD की ऐतिहासिक लैंडिंग
भारतीय वायुसेना ने शनिवार, 7 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। वायुसेना के अनुसार, उसके IL-76MD विमान ने लद्दाख के न्योमा एयरफील्ड पर 13,629 फीट की ऊंचाई पर सफल लैंडिंग की। यह इस विमान प्रकार की दुनिया में अब तक की सबसे अधिक ऊंचाई पर की गई लैंडिंग है।
वायुसेना ने इस उपलब्धि को विमानन इतिहास में एक नया अध्याय बताया। अपने संदेश में उसने कहा कि यह लैंडिंग विमान की क्षमता और उसके क्रू के असाधारण कौशल, सटीकता तथा पेशेवर दक्षता का प्रदर्शन है। वायुसेना ने यह भी कहा कि यह उपलब्धि भारत की रणनीतिक एयरलिफ्ट क्षमता को और मजबूत करती है।
इस ऑपरेशन में IL-76MD जैसे भारी परिवहन विमान का इस्तेमाल खास महत्व रखता है। यह विमान सामान्य यात्री विमानों की तरह केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए नहीं बनाया गया है। इसका प्रमुख काम सैनिकों, सैन्य वाहनों, भारी उपकरणों और जरूरी सामान को लंबी दूरी तक पहुंचाना है।
क्यों खास है न्योमा एयरबेस?
न्योमा एयरबेस पूर्वी लद्दाख में स्थित है और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) यानी भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े क्षेत्र के काफी करीब है। अलग-अलग रिपोर्टों में इसकी दूरी करीब 23 से 40 किलोमीटर के बीच बताई गई है। इसकी स्थिति के कारण यह सीमावर्ती इलाकों में सैन्य गतिविधियों और रसद पहुंचाने के लिहाज से अहम भूमिका निभा सकता है।
यह एयरबेस समुद्र तल से लगभग 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इतनी ऊंचाई पर विमान संचालन करना आसान नहीं होता। यहां हवा का घनत्व कम होता है, जिसका असर विमान के इंजन के प्रदर्शन और पंखों से पैदा होने वाली लिफ्ट पर पड़ता है। ऐसे में विमान को उड़ाने, उतारने और सुरक्षित रूप से नियंत्रित करने के लिए विशेष सावधानी और सटीक योजना की जरूरत होती है।
न्योमा एयरबेस का महत्व केवल इसकी ऊंचाई तक सीमित नहीं है। यह पूर्वी लद्दाख के उन इलाकों के करीब स्थित है, जहां भारतीय सेना को लगातार निगरानी और सैन्य तैयारियां बनाए रखनी होती हैं। ऐसे क्षेत्र में एक मजबूत एयरबेस होने से सैनिकों और जरूरी सैन्य सामग्री को पहुंचाने के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होते हैं।
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IL-76MD विमान की खासियत
IL-76MD रूस में विकसित किया गया एक भारी सैन्य परिवहन विमान है। भारतीय वायुसेना में इसे ‘गजराज’ के नाम से भी जाना जाता है। यह चार इंजन वाला विमान है और इसे लंबी दूरी तक भारी सामान ले जाने के लिए तैयार किया गया है।
इस विमान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भारी सामान ढोने की क्षमता है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, IL-76MD लगभग 40 से 45 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है। इसका इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य वाहनों, हथियारों, उपकरणों और अन्य जरूरी सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में किया जाता है।
भारतीय वायुसेना के लिए यह विमान खासतौर पर उन अभियानों में उपयोगी है, जहां बड़ी मात्रा में सामान और सैनिकों को तेजी से पहुंचाना जरूरी होता है। लद्दाख जैसे दुर्गम इलाके में सड़क मार्ग से भारी सैन्य सामग्री पहुंचाना समय लेने वाला और मौसम पर निर्भर हो सकता है। ऐसे में बड़े परिवहन विमानों की मदद से जरूरी सामान को हवाई मार्ग से पहुंचाने का विकल्प महत्वपूर्ण बन जाता है।
2025 में शुरू हुआ था न्योमा एयरबेस का नया अध्याय
न्योमा में हवाई पट्टी का इतिहास काफी पुराना है। इसे मूल रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान विकसित किया गया था। हालांकि, इसके बाद लंबे समय तक यहां नियमित रूप से फिक्स्ड-विंग विमानों का संचालन नहीं हुआ।
18 सितंबर 2009 को भारतीय वायुसेना के AN-32 परिवहन विमान ने यहां लैंडिंग की थी। यह न्योमा में फिक्स्ड-विंग विमान की पहली दर्ज लैंडिंग थी। इसके बाद इस स्थान का इस्तेमाल सीमित सैन्य हवाई गतिविधियों के लिए किया जाता रहा। समय के साथ यहां बड़े और आधुनिक एयरबेस की जरूरत महसूस की गई।
पूर्वी लद्दाख में 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसी क्रम में न्योमा एयरफील्ड को आधुनिक एयरबेस के रूप में विकसित करने की योजना आगे बढ़ी। सितंबर 2023 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसके उन्नयन की आधारशिला रखी थी।
इस परियोजना की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (BRO) को सौंपी गई थी। इसके तहत यहां करीब 2.7 किलोमीटर लंबा पक्का रनवे तैयार किया गया। एयरबेस को इस तरह विकसित किया गया कि यहां लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों का संचालन किया जा सके।
12 नवंबर 2025 को तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने C-130J विशेष अभियान परिवहन विमान से यहां उतरकर एयरबेस का उद्घाटन किया था। इस तरह न्योमा एक आधुनिक और पूर्ण सैन्य एयरबेस के रूप में विकसित हुआ। इसकी अनुमानित निर्माण लागत करीब 218 करोड़ रुपये बताई गई थी।
सैन्य तैयारियों के लिए क्यों अहम है यह एयरबेस?
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास स्थित होने के कारण न्योमा एयरबेस की रणनीतिक अहमियत काफी अधिक है। पूर्वी लद्दाख में सैन्य तैनाती बनाए रखने के लिए सैनिकों, ईंधन, भोजन, दवाइयों और दूसरे जरूरी सामान की नियमित आपूर्ति की जरूरत होती है। ऊंचे पहाड़ों और कठिन मौसम के कारण सड़क मार्ग से यह काम कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ऐसी परिस्थितियों में हवाई मार्ग से आपूर्ति पहुंचाने की क्षमता सेना के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। न्योमा जैसे एयरबेस से सैन्य परिवहन विमानों को सीमावर्ती इलाकों के करीब पहुंचने का विकल्प मिलता है। इससे सैनिकों और जरूरी सामान की आवाजाही में मदद मिल सकती है।
IL-76MD की लैंडिंग इस लिहाज से अहम है कि अब इस एयरफील्ड पर पहले की तुलना में अधिक क्षमता वाले भारी परिवहन विमान के संचालन की संभावना प्रदर्शित हुई है।
न्योमा एयरबेस के विकास को पूर्वी लद्दाख में भारत के व्यापक सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के प्रयासों का हिस्सा माना जा रहा है। इस क्षेत्र में लेह और कारगिल जैसे अन्य एयरबेस भी हैं। इसके अलावा दौलत बेग ओल्डी और फुकचे जैसे अग्रिम लैंडिंग ग्राउंड भी सैन्य गतिविधियों में उपयोग किए जाते हैं।
सीमा तनाव के बाद बढ़ी हवाई परिवहन की अहमियत
पूर्वी लद्दाख में 2020 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनाव के बाद इस क्षेत्र में सैन्य तैनाती और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत और बढ़ गई थी। उस दौरान भारतीय वायुसेना ने बड़ी संख्या में सैनिकों और सैन्य वाहनों को क्षेत्र में पहुंचाने के लिए परिवहन विमानों का इस्तेमाल किया था।
2020 के तनाव के दौरान वायुसेना ने 68,000 से अधिक सैनिकों, करीब 90 टैंकों और 330 BMP पैदल सेना लड़ाकू वाहनों को हवाई मार्ग से पहुंचाया था। यह उदाहरण बताता है कि सीमावर्ती इलाकों में सैन्य परिवहन विमानों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
IL-76MD जैसे भारी विमान इस तरह के अभियानों में बड़ी मात्रा में सामान और उपकरण ले जाने की क्षमता रखते हैं। न्योमा में इसकी सफल लैंडिंग से यह संकेत मिलता है कि भारत दुर्गम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बड़े सैन्य विमानों के संचालन की संभावनाओं को लगातार बढ़ा रहा है।




