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रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन तक: सर्जन ने व्यक्तिगत अनुभव से घुटनों के इलाज को दी नई दिशा

पंजाब , 14 अप्रैल 2026

भारतीय घरों में घुटनों का दर्द अक्सर उम्र बढ़ने का एक सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। इसकी शुरुआत हल्की परेशानी से होती है जैसे सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत, बैठने या खड़े होने में दर्द—लेकिन धीरे-धीरे यह चलने-फिरने और रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगता है। लंबे समय से इसका इलाज लगभग तय रहा है: जब दवाइयों, फिजियोथेरेपी और इंजेक्शन से राहत नहीं मिलती, तो नी रिप्लेसमेंट को अगला कदम माना जाता है। लेकिन अब यह सोच बदलती हुई नजर या रही है।

डॉ. एन. के. अग्रवाल, एक अनुभवी आर्थोपेडिक सर्जन जिनके पास 50 से अधिक वर्षों का अनुभव है और जो भारत में नी रिप्लेसमेंट के शुरुआती विशेषज्ञों में से रहे हैं, पहले इसी समाधान में पूरी तरह विश्वास रखते थे। उन्होंने भारत, यूके, यूरोप और अमेरिका के प्रमुख संस्थानों में प्रशिक्षण और काम किया है, और लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में आर्थोपेडिक्स विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर के रूप में सेवा दी है। अपने करियर में उन्होंने हजारों सर्जरी की हैं और कई मरीजों को चलने-फिरने की क्षमता वापस दिलाई है। लेकिन समय के साथ उन्हे एक बात खटकने लगी, जो थी ऑपरेशन के बाद मरीजों में संतुष्टि।

करीब 15–20 वर्षों तक लगातार नी रिप्लेसमेंट करने के बाद उन्होंने पाया कि सर्जरी सफल होने के बावजूद, लगभग 20–25 प्रतिशत मरीज पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते। कई मामलों में दर्द या जकड़न बनी रहती है और चलने-फिरने की क्षमता पहले जैसी नहीं हो पाती। तकनीक में सुधार, रोबोटिक्स और नई विधियों ने सर्जरी को अधिक सटीक तो बनाय, लेकिन मरीजों की संतुष्टि में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। यहीं से यह सवाल उठा कि क्या इलाज समस्या की जड़ तक पहुंच भी रहा है या नहीं।

इसी दौरान एक व्यक्तिगत अनुभव ने उनकी सोच को और स्पष्ट कर दिया। करीब दस साल पहले उनकी पत्नी, जो खुद डॉक्टर हैं, को गंभीर घुटनों का दर्द होने लगा। हालत इतनी बिगड़ गई कि उनका चलना मुश्किल हो गया और यात्रा के लिए व्हीलचेयर की जरूरत पड़ने लगी। विशेषज्ञों ने उन्हें भी नी रिप्लेसमेंट की सलाह दी, लेकिन डॉ. अग्रवाल ने तुरंत यह फैसला नहीं लिया। अपने अनुभव से वह जानते थे कि सफल सर्जरी भी संतोषजनक परिणाम की गारंटी नहीं होती और उन्होंने इस समस्या को गहराई से समझने का निर्णय लिया।

जब उन्होंने दुनियाभर के शोध को विस्तार से देखा, तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आई। घुटनों का दर्द केवल घिसाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह शरीर में होने वाली धीमी और लगातार सूजन से जुड़ा होता है, जो उम्र के साथ बढ़ती है, जिसे “इनफ्लेमेजिंग” कहा जाता है। यह सूजन केवल घुटने के कार्टिलेज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लिगामेंट, मांसपेशियों और आसपास के ऊतकों को भी प्रभावित करती है। इस तरह घुटनों का दर्द केवल एक जोड़ की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर से जुड़ी स्थिति का हिस्सा बन जाता है।

यहीं से इलाज की दिशा में बदलाव शुरू हुआ और डॉ. अग्रवाल ने “रिप्लेसमेंट” के बजाय “रीजेनरेशन” पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कई ऐसे उपचारों को एक साथ जोड़ा, जिन्हें पहले अलग-अलग अपनाया जाता था। इसमें जोड़ों की सफाई, लुब्रिकेशन थेरेपी, पीआरपी और ग्रोथ फैक्टर जैसे उपचार शामिल हैं, जो मरीज के अपने खून से लिए जाते हैं। इसके साथ ही फैट और बोन मैरो से जुड़ी तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है।

इसके समानांतर, उन्होंने शरीर की कुल सूजन को कम करने के लिए दवाइयों, सप्लीमेंट्स और जीवनशैली में बदलाव को भी इलाज का हिस्सा बनाया और इस समग्र पद्धति को “लुधियाना प्रोटोकॉल” नाम दिया गया। जिसका उद्देश्य है सूजन को नियंत्रित करना, घुटने के अंदर के माहौल को बेहतर बनाना और शरीर की प्राकृतिक हीलिंग क्षमता को मजबूत करना। इस तरह इलाज का फोकस घुटना बदलने से हटकर उसे बचाने और ठीक करने पर आ गया।

इस पद्धति का पहला उपयोग उनकी पत्नी के इलाज में हुआ, जहां समय के साथ स्पष्ट सुधार देखा गया। इसके बाद उन्होंने इस तरीके को अन्य मरीजों पर लागू किया। अब तक सैकड़ों मरीजों का इलाज किया जा चुका है और 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में दर्द और चलने-फिरने की क्षमता में सुधार दर्ज किया गया है। खास बात यह है कि कई ऐसे मरीज, जिन्हें पहले नी रिप्लेसमेंट की सलाह दी गई थी, अब बिना सर्जरी के बेहतर स्थिति में हैं।

यह उपचार न्यूनतम इनवेसिव है, यानी इसमें बड़े ऑपरेशन की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं होता, एनेस्थीसिया की आवश्यकता नहीं पड़ती और मरीज उसी दिन घर लौट सकता है। इससे इलाज आसान और कम जोखिम वाला बन जाता है।

हालांकि, डॉ. अग्रवाल यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह हर मरीज के लिए समाधान नहीं है। जिन मामलों में घुटना बहुत अधिक खराब या टेढ़ा हो चुका है, वहां सर्जरी जरूरी हो सकती है। लेकिन शुरुआती और मध्यम अवस्था में अगर समय पर इलाज शुरू किया जाए, तो सर्जरी को टाला जा सकता है। इस उपचार का असर धीरे-धीरे दिखाई देता है—कुछ हफ्तों में बदलाव नजर आने लगता है और पूरा लाभ 2–3 महीनों में मिलता है।

भारत में घुटनों की समस्या तेजी से बढ़ रही है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में यह अधिक देखी जाती है, खासकर महिलाओं में। बदलती जीवनशैली, मोटापा और बढ़ती उम्र इसके मुख्य कारण हैं। अब यह समस्या युवाओं में भी सामने आने लगी है, जो इसे और गंभीर बनाती है।

डॉ. अग्रवाल का यह सफर इलाज की सोच में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। अब ध्यान केवल नी बदलने पर नहीं, बल्कि बीमारी को समझकर उसे जड़ से ठीक करने पर है। जैसा कि वे कहते हैं, “हम उम्र बढ़ने को रोक नहीं सकते, लेकिन उसके दर्दनाक असर को नियंत्रित कर सकते हैं। अगर समय पर इलाज शुरू हो जाए, तो घुटनों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।”

वे आज भी जरूरत पड़ने पर नी रिप्लेसमेंट करते हैं, लेकिन इसे पहला नहीं बल्कि आखिरी विकल्प मानते हैं। मरीजों के लिए संदेश साफ है—घुटनों के दर्द को नजरअंदाज न करें और इलाज के लिए केवल सर्जरी पर निर्भर न रहें। अब रीजेनरेशन आधारित इलाज एक मजबूत और उभरता हुआ विकल्प बनकर सामने आ रहा है।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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