Monday, 27 July 2026
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105 साल पहले शुरू हुई इंसुलिन की ऐतिहासिक कहानी, जिसने करोड़ों डायबिटीज मरीजों को दी नई जिंदगी

1921 में इंसुलिन की खोज ने डायबिटीज के इलाज की दुनिया बदल दी। जानिए बैंटिंग, बेस्ट और उनकी टीम की ऐतिहासिक खोज ने कैसे करोड़ों मरीजों को नई जिंदगी दी।

टोरंटो, कनाडा: सोचिए, एक ऐसी बीमारी जिसमें मरीज का शरीर धीरे-धीरे कमजोर होकर हड्डियों का ढांचा बन जाता था और डॉक्टरों के पास इलाज के नाम पर लगभग कुछ नहीं होता था।

डायबिटीज का गंभीर रूप कभी ऐसी ही एक खामोश मौत की सजा माना जाता था। खासकर बच्चों और युवाओं में टाइप-1 डायबिटीज का निदान होने के बाद जिंदगी अक्सर महीनों या बहुत कम वर्षों तक सीमित रह जाती थी। मरीजों को जिंदा रखने के लिए बेहद कम कैलोरी वाला भोजन दिया जाता था, लेकिन यह इलाज बीमारी को रोक नहीं सकता था।

फिर आया साल 1921, कनाडा के टोरंटो में एक युवा डॉक्टर, एक मेडिकल छात्र और बाद में एक बायोकेमिस्ट की टीम ने अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज से उस रहस्यमयी पदार्थ को अलग करने की दिशा में सफलता हासिल की, जिसे आगे चलकर इंसुलिन (Insulin)  के नाम से जाना गया। इस खोज ने सिर्फ एक दवा नहीं दी, बल्कि डायबिटीज को एक घातक बीमारी से ऐसी स्थिति में बदल दिया, जिसे नियंत्रित किया जा सकता था।

27 जुलाई 1921 की तारीख इसी ऐतिहासिक यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में गिनी जाती है। इसके बाद के महीनों में प्रयोगशाला से अस्पताल तक का सफर तय हुआ और जनवरी 1922 में पहली बार किसी इंसान को इंसुलिन का सफल उपचार मिला।

आज इस ऐतिहासिक खोज के 105 साल पूरे हो रहे हैं। इन 105 वर्षों में इंसुलिन ने लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी को बदलने में भूमिका निभाई है।

इंसुलिन से पहले क्या था डायबिटीज का इलाज?

इंसुलिन की खोज को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि 1921 से पहले डायबिटीज का मतलब क्या था।

वैज्ञानिकों को धीरे-धीरे यह समझ आने लगा था कि डायबिटीज का संबंध शरीर में शुगर के असामान्य स्तर से है। 19वीं सदी के अंत तक वैज्ञानिकों ने यह भी देख लिया था कि पैंक्रियाज की भूमिका इस बीमारी में महत्वपूर्ण है।

1889 में जर्मन वैज्ञानिक ऑस्कर मिन्कोव्स्की (Oskar Minkowski) और जोसेफ वॉन मेरिंग (Joseph von Mering) ने एक कुत्ते का पैंक्रियाज निकालने के बाद देखा कि उसमें डायबिटीज के लक्षण विकसित हो गए। इस प्रयोग ने यह संकेत दिया कि पैंक्रियाज में कोई ऐसा पदार्थ जरूर है, जो शरीर में ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लेकिन असली समस्या उस पदार्थ को पैंक्रियाज से अलग कैसे किया जाये। पैंक्रियाज केवल हार्मोन बनाने वाला अंग नहीं है। यह पाचन से जुड़े एंजाइम भी बनाता है। वैज्ञानिकों की कोशिशों में बार-बार यह समस्या सामने आई कि जिस पदार्थ को वे निकालना चाहते थे, वह पैंक्रियाज के ही पाचक एंजाइमों से नष्ट हो जाता था। दशकों तक वैज्ञानिक इस पहेली को हल नहीं कर पाए।

इस बीच गंभीर डायबिटीज के मरीजों के लिए सबसे चर्चित उपचार था बेहद सख्त भुखमरी या Starvation Diet… इससे कुछ मरीजों की जिंदगी थोड़ी लंबी हो सकती थी, लेकिन यह वास्तविक इलाज नहीं था। मरीज बेहद कमजोर और कुपोषित हो जाते थे। गंभीर मामलों में बीमारी आखिरकार जानलेवा साबित होती थी।

एक युवा डॉक्टर के दिमाग में आया विचार

इसी पृष्ठभूमि में कनाडा के युवा डॉक्टर फ्रेडरिक बैंटिंग (Frederick Banting) की कहानी शुरू होती है।

1920 में पैंक्रियाज पर पढ़ते और तैयारी करते हुए बैंटिंग के दिमाग में एक विचार आया। उन्होंने सोचा कि अगर पैंक्रियाज की उन कोशिकाओं को बचा लिया जाए जो डायबिटीज को नियंत्रित करने वाला पदार्थ बनाती हैं और पाचन एंजाइम बनाने वाले हिस्से को निष्क्रिय कर दिया जाए, तो शायद उस पदार्थ को अलग किया जा सकता है।

यह विचार उस समय पूरी तरह सिद्ध नहीं था। लेकिन बैंटिंग इसे प्रयोग के जरिए जांचना चाहते थे।

उन्होंने टोरंटो विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध डायबिटीज शोधकर्ता प्रोफेसर जॉन मैक्लियोड (Professor John McLeod) से संपर्क किया। मैक्लियोड शुरुआत में बैंटिंग के विचार को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे, लेकिन उन्होंने उन्हें प्रयोग करने के लिए प्रयोगशाला, कुछ कुत्ते और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए।

बैंटिंग के साथ मेडिकल छात्र चार्ल्स बेस्ट (Charles Best) को भी काम करने के लिए जोड़ा गया।

सबसे पहले कुत्तों पर हुआ प्रयोग

इंसुलिन की खोज के शुरुआती प्रयोग कुत्तों पर किए गए थे। बैंटिंग और बेस्ट ने ऐसे कुत्तों पर प्रयोग किए जिनमें पैंक्रियाज के काम को प्रभावित करके डायबिटीज जैसी स्थिति पैदा की गई थी। इसके बाद उन्होंने पैंक्रियाज से तैयार किए गए अर्क को इन जानवरों में इस्तेमाल किया।

प्रयोगों में देखा गया कि इस अर्क के इस्तेमाल से कुत्तों का ब्लड शुगर कम होने लगा और डायबिटीज के लक्षणों में सुधार दिखाई दिया। कुछ प्रयोगों में अर्क की मदद से ऐसे कुत्तों को जीवित रखने में सफलता मिली, जिन्हें गंभीर डायबिटीज थी।

इन प्रयोगों ने वैज्ञानिकों को पहली बार मजबूत संकेत दिया कि वे सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

इंसुलिन की खोज में आया निर्णायक मोड़

1921 की गर्मियों में बैंटिंग और बेस्ट के प्रयोग तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने पैंक्रियाज से सक्रिय अर्क निकालने के तरीकों पर काम किया। शुरुआती विचार यह था कि पैंक्रियाज के कुछ हिस्सों को निष्क्रिय करके उस सक्रिय पदार्थ को बचाया जाए।

टीम ने आगे चलकर पाया कि वयस्क जानवरों के ताजे पूरे पैंक्रियाज से भी सक्रिय अर्क तैयार किया जा सकता है। इस दिशा में काम करते हुए उन्होंने ऐसा अर्क हासिल किया, जिसमें ब्लड शुगर कम करने की क्षमता थी।

इसी ऐतिहासिक दौर में 1921 में उस सक्रिय पदार्थ को अलग करने और उसके प्रभाव को साबित करने की दिशा में सफलता मिली। बाद में इसी पदार्थ को Insulin नाम दिया गया।

हालांकि, एक बात यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि, 27 जुलाई 1921 को इंसुलिन का पहला सफल मानव इंजेक्शन नहीं दिया गया था। इंसुलिन की खोज और isolation की प्रयोगशाला उपलब्धियों के बाद मानव उपचार की तैयारी हुई और पहला सफल मानव उपचार जनवरी 1922 में हुआ।

जेम्स कॉलिप का योगदान

इंसुलिन की खोज को इंसानों तक पहुंचाने में जेम्स कॉलिप (James Collip) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। कॉलिप एक बायोकेमिस्ट थे, जो 1921 के अंत में टीम से जुड़े। उनका मुख्य पैंक्रियाज के अर्क को इतना शुद्ध करना था कि उसे इंसानों में सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सके।

शुरुआती अर्क में अशुद्धियां थीं। जब इसे इंसानों पर इस्तेमाल किया गया, तो इसके दुष्प्रभाव सामने आए। इसलिए कॉलिप ने शुद्धिकरण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर काम किया। उनकी कोशिशों से ऐसा अधिक शुद्ध अर्क तैयार हुआ, जिसका इस्तेमाल आगे मानव उपचार में किया जा सका।

यही वह चरण था जहां एक प्रयोगशाला खोज धीरे-धीरे वास्तविक चिकित्सा उपचार में बदलने लगी।

पहला इंसान कौन था जिसे इंसुलिन दिया गया?

इंसुलिन के इतिहास में जिस नाम को हमेशा याद किया जाता है, वह है लियोनार्ड थॉम्पसन (Leonard Thompson)

जनवरी 1922 में 14 वर्षीय लियोनार्ड थॉम्पसन टोरंटो जनरल हॉस्पिटल में गंभीर डायबिटीज से जूझ रहे थे। वह बेहद कमजोर थे और उनकी स्थिति गंभीर थी।

11 जनवरी 1922 को उन्हें बैंटिंग और बेस्ट की टीम द्वारा तैयार किया गया शुरुआती पैंक्रियाटिक अर्क दिया गया। लेकिन यह अर्क पर्याप्त शुद्ध नहीं था। इंजेक्शन से अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और इंजेक्शन वाली जगह पर एब्सेस भी विकसित हो गया। इसके बाद टीम ने मानव उपयोग के लिए अर्क को और शुद्ध करने पर ध्यान दिया।

इसके बाद 23 जनवरी 1922 को अर्क लियोनार्ड को अधिक शुद्ध इंसुलिन दिया गया। परिणाम बेहद प्रभावशाली रहा। उनके ब्लड शुगर में तेज गिरावट आई और डायबिटीज से जुड़े कई गंभीर संकेतों में सुधार हुआ। उनकी हालत तेजी से बेहतर होने लगी। यह इंसुलिन के सफल मानव उपचार का ऐतिहासिक क्षण था।

लियोनार्ड थॉम्पसन के उपचार ने यह साबित कर दिया कि इंसुलिन सिर्फ प्रयोगशाला में काम करने वाला पदार्थ नहीं था। यह गंभीर डायबिटीज से जूझ रहे इंसानों की जिंदगी बचा सकता था।

लियोनार्ड इसके बाद लगभग 13 वर्षों तक इंसुलिन के साथ जीवित रहे और 1935 में उनकी मृत्यु हुई।

इंसुलिन का उत्पादन कैसे शुरू हुआ?

एक मरीज के सफल उपचार के बाद अगली चुनौती इंसुलिन को बड़ी संख्या में मरीजों के लिए बनाने की थी।

शुरुआत में इंसुलिन जानवरों के पैंक्रियाज, मुख्य रूप से गाय और सूअर जैसे जानवरों के पैंक्रियाज से निकाला जाता था। लेकिन इसे बड़े पैमाने पर तैयार करना आसान नहीं था।

टोरंटो की Connaught Laboratories ने इंसुलिन के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1922 में टीम और Connaught के बीच उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए समझौता हुआ। इसके बाद अमेरिकी कंपनी Eli Lilly ने भी बड़े पैमाने पर इंसुलिन के उत्पादन और शुद्धिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कुछ ही वर्षों में इंसुलिन का उत्पादन कई देशों में शुरू हो गया और यह उन मरीजों तक पहुंचने लगा, जिनके लिए पहले डायबिटीज लगभग निश्चित मृत्यु का कारण बन सकती थी।

1923 तक इंसुलिन अमेरिका में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होने लगा था।

फ्रेडरिक बैंटिंग और जॉन मैक्लियोड नोबेल पुरस्कार से सम्मानित

इस खोज के महत्व को देखते हुए 1923 में फ्रेडरिक बैंटिंग और जॉन मैक्लियोड को फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार दिया गया। बैंटिंग ने अपनी पुरस्कार राशि चार्ल्स बेस्ट के साथ साझा की, जबकि मैक्लियोड ने अपनी हिस्सेदारी जेम्स कॉलिप के साथ साझा की। इससे साफ होता है कि इंसुलिन की कहानी किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि कई वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के सामूहिक प्रयास का परिणाम थी।

क्या इंसुलिन डायबिटीज को पूरी तरह ठीक कर सकता है?

इंसुलिन डायबिटीज का स्थायी इलाज नहीं है। लेकिन इसकी खोज ने डायबिटीज को नियंत्रित करने का रास्ता खोल दिया।

टाइप-1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। ऐसे मरीजों के लिए इंसुलिन जीवनरक्षक उपचार है। टाइप-2 डायबिटीज में भी कुछ मरीजों को बीमारी के दौरान इंसुलिन की आवश्यकता पड़ सकती है।

इंसुलिन शरीर की कोशिकाओं को ग्लूकोज का इस्तेमाल करने में मदद करता है और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इंसुलिन के बिना टाइप-1 डायबिटीज वाले लोगों के लिए सामान्य जीवन संभव नहीं होता।

यही कारण है कि इंसुलिन की खोज को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।

105 साल बाद इंसुलिन की दुनिया

1921 में इंसुलिन की खोज के समय वैज्ञानिक जानवरों के पैंक्रियाज से अर्क निकाल रहे थे। आज इंसुलिन का निर्माण कहीं अधिक उन्नत तकनीकों से किया जाता है।

20वीं सदी के अंत तक Recombinant DNA Technology ने इंसुलिन उत्पादन में बड़ा बदलाव ला दिया। इसके जरिए मानव इंसुलिन जैसे उत्पादों का उत्पादन सूक्ष्मजीवों, जैसे बैक्टीरिया या यीस्ट, की मदद से किया जा सका। इससे जानवरों से प्राप्त इंसुलिन पर निर्भरता कम हुई और बड़े पैमाने पर अधिक शुद्ध इंसुलिन उपलब्ध कराना संभव हुआ।

आज मरीजों के पास इंसुलिन के कई विकल्प हैं—तेजी से काम करने वाले इंसुलिन, लंबे समय तक असर करने वाले इंसुलिन, इंसुलिन पेन और इंसुलिन पंप। इनके साथ Continuous Glucose Monitoring (CGM) जैसी तकनीक ने भी डायबिटीज प्रबंधन को पूरी तरह बदल दिया है।

यानी 1921 की प्रयोगशाला में शुरू हुई खोज आज डिजिटल हेल्थ और बायोटेक्नोलॉजी के दौर तक पहुंच चुकी है।

आज जब हम इंसुलिन पेन से कुछ सेकंड में दवा लेते हैं या ग्लूकोज मॉनिटर पर अपने शुगर लेवल को देखते हैं, तो शायद यह कल्पना करना मुश्किल है कि कभी डायबिटीज का गंभीर रूप मौत की लगभग निश्चित सजा माना जाता था।

यही कारण है कि आज भी इंसुलिन की खोज सिर्फ चिकित्सा विज्ञान की एक पुरानी उपलब्धि नहीं, बल्कि आधुनिक दुनिया की उन महान वैज्ञानिक खोजों में से एक है, जिसने सचमुच इंसानी जिंदगी और उसके भविष्य को बदल दिया।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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