Wednesday, 09 September 2026
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DDGS आयात: क्या एक प्रतिशत का फैसला किसानों की आय पर भारी पड़ेगा?

New Delhi, 19th Feb, 2026 :

सरकार ने हाल ही में अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते के तहत सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) के रियायती आयात की अनुमति दी है। यह कहा गया है कि आयात 5 लाख टन तक सीमित रहेगा, जो घरेलू खपत का लगभग एक प्रतिशत है, और इसका उद्देश्य पोल्ट्री, डेयरी तथा जलीय कृषि क्षेत्र में चारे की लागत कम करना है। पहली नज़र में यह एक छोटा और तकनीकी निर्णय लगता है। पर क्या वाकई यह केवल एक प्रतिशत का मामला है? कृषि बाज़ार केवल आंकड़ों से नहीं चलते, वे संकेतों से चलते हैं। और कई बार संकेत ही सबसे बड़ा असर डालते हैं। कई बार छोटे दिखने वाले फैसले भी मूल्य संकेतों, सौदेबाज़ी की ताकत और ग्रामीण आय संरचना को गहराई से प्रभावित कर देते हैं। DDGS आयात का मुद्दा भी ऐसा ही मुद्दा है जिसके प्रभाव आंकड़ों से कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।

DDGS मक्का से बनने वाले एथेनॉल उद्योग का उप-उत्पाद है। अमेरिका में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, जहाँ अधिकांश मक्का जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) है। यही वह बिंदु है जहाँ यह मुद्दा केवल चारे की आपूर्ति तक सीमित नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि क्या हम अपने किसानों की आय और अपनी कृषि नीति की दिशा पर पर्याप्त विचार कर रहे हैं? कुछ लोग कहते हैं कि एक प्रतिशत आयात से कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन जब बड़े फ़ीड निर्माता और पोल्ट्री कंपनियाँ यह कह सकती हैं कि उनके पास सस्ता आयातित विकल्प उपलब्ध है, तो मंडी में मक्का की कीमतों पर दबाव बनना स्वाभाविक है। भले ही आयात कम हो, पर उसकी मौजूदगी ही घरेलू सौदेबाज़ी का समीकरण बदल देती है। भारत के संदर्भ में यह केवल एक चारे के विकल्प का सवाल नहीं है। यह मक्का किसानों की आय स्थिरता, घरेलू चारा बाज़ार की संरचनात्मक संतुलन और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के प्रति भारत की दीर्घकालिक सतर्क नीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

देश के अधिकांश मक्का किसान छोटे और सीमांत हैं। वे पहले से ही बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं, बीज महंगे, खाद महंगी, डीज़ल महंगा। उनके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती, इसलिए कटाई के तुरंत बाद उन्हें फसल बेचनी पड़ती है। वे इंतज़ार नहीं कर सकते कि कीमतें सुधरें। ऐसे में यदि मंडी में भाव पाँच से दस प्रतिशत भी गिरते हैं, तो उसका सीधा असर उनके घर की आय पर पड़ता है। शहरों में जो गिरावट मामूली लगती है, वह गांव में किसी परिवार के साल भर के संतुलन को बिगाड़ सकती है। इस नीति से लाभ किसे होगा? बड़े फ़ीड इंटीग्रेटर और औद्योगिक प्रोसेसर सस्ते विकल्प से अपनी लागत घटा सकते हैं। संभव है कि उपभोक्ताओं को भी कुछ राहत मिले, यदि लागत में कमी वास्तव में बाजार तक पहुँचे। लेकिन यह सुनिश्चित नहीं है। दूसरी ओर, जोखिम साफ़ तौर पर किसानों की ओर झुकता दिखाई देता है। स्थानीय व्यापारी, मंडी से जुड़े श्रमिक, परिवहन से जुड़े लोग, सब इस मूल्य शृंखला का हिस्सा हैं। यदि मक्का की मांग में हल्की भी कमी आती है, तो इसका असर इन सभी पर पड़ सकता है। एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है, हमारी GM नीति का। भारत ने अब तक खाद्य फसलों में GM को लेकर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। DDGS भले ही बीज नहीं है, पर उसका स्रोत GM मक्का है। यदि बिना व्यापक चर्चा और पारदर्शी समीक्षा के ऐसे आयात को स्वीकार किया जाता है, तो यह भविष्य की नीति दिशा का संकेत भी हो सकता है। कृषि केवल उत्पादन नहीं, बल्कि विश्वास का भी विषय है। किसान और उपभोक्ता दोनों पारदर्शिता चाहते हैं। भारत कुछ वैश्विक बाजारों में गैर-GM कृषि उत्पादों के भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। यदि यह धारणा कमजोर होती है, तो दीर्घकाल में निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए DDGS का सवाल केवल आज की लागत का नहीं, बल्कि कल की रणनीति का भी है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि पोल्ट्री या डेयरी क्षेत्र की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। चारे की लागत कम होना महत्वपूर्ण है। पर क्या यह संतुलन किसानों की आय की कीमत पर होना चाहिए? व्यापारिक लचीलापन जरूरी है, पर ग्रामीण अस्थिरता की कीमत पर नहीं। यदि आयात हो भी तो इसकी कठोर निगरानी आवश्यक है। हर खेप की जांच हो, स्रोत स्पष्ट हो, ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित हो। इस व्यवस्था की समयबद्ध समीक्षा हो, जिसमें किसान संगठनों की भागीदारी भी हो। फ़ीड मिलों के लिए स्पष्ट प्रकटीकरण मानदंड निर्धारित किए जाएँ। यदि मंडी में कीमतें दबाव में आती हैं, तो सरकार को समर्थन मूल्य और बाजार हस्तक्षेप जैसे उपायों के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही हमें अपनी घरेलू क्षमता भी बढ़ानी होगी। यदि चारे की मांग बढ़ रही है, तो क्यों न देश में ही एथेनॉल और उसके सह-उत्पाद उद्योग को सशक्त किया जाए? मूल्य संवर्धन देश के भीतर रहे, यही आत्मनिर्भरता का सार है। आख़िरकार सवाल यह नहीं है कि भारत व्यापार करे या नहीं। सवाल यह है कि क्या व्यापारिक निर्णय उन किसानों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं, जो हर मौसम में जोखिम उठाते हैं। कृषि नीति केवल टन और प्रतिशत में नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक आजीविका में मापी जानी चाहिए। एक प्रतिशत का निर्णय छोटा दिख सकता है। पर यदि वह संकेत बदल दे, तो उसका असर बहुत बड़ा हो सकता है।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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