Sunday, 19 July 2026
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RTI रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, हर दिन विज्ञापनों पर औसतन ₹1.3 करोड़ खर्च कर रही है छत्तीसगढ़ सरकार

RTI रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने सत्ता संभालने के बाद विज्ञापनों पर ₹1,095.20 करोड़ खर्च किए। जानिए सरकारी प्रचार, जनहित और सार्वजनिक धन पर पूरी रिपोर्ट।

रायपुर/ नई दिल्ली: हर साल करोड़ों भारतीय टैक्स इसलिए चुकाते हैं ताकि सरकार उस धन से स्कूल बनाए, अस्पतालों को बेहतर करे, सड़कें तैयार करे और जनकल्याणकारी योजनाओं को मजबूत बनाए। लेकिन जब इसी सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों और प्रचार पर खर्च होने लगे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्राथमिकता आखिर किसे मिल रही है।

RTI की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने सत्ता संभालने के बाद लगभग 27 महीनों की अवधि में प्रचार और विज्ञापनों पर ₹1,095.20 करोड़ खर्च किए हैं। इसका मतलब है कि सरकार ने औसतन हर दिन लगभग ₹1.3 करोड़ विज्ञापनों पर खर्च किए।

यह आंकड़ा सामने आने के बाद सरकारी विज्ञापन नीति, सार्वजनिक धन के उपयोग और उसकी प्राथमिकताओं पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है।

क्या कहती है RTI रिपोर्ट?

यह जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2023 में नई सरकार बनने के बाद से लेकर अब तक राज्य सरकार ने विभिन्न सरकारी योजनाओं, उपलब्धियों, अभियानों और आयोजनों के प्रचार-प्रसार पर कुल ₹1,095.20 करोड़ खर्च किए।

यदि इस अवधि को औसत में बांटा जाए तो यह खर्च प्रतिदिन लगभग ₹1.3 करोड़ बैठता है। यह राशि प्रिंट मीडिया, टीवी, रेडियो, आउटडोर होर्डिंग्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया प्रचार, प्रचार सामग्री और अन्य संचार माध्यमों पर खर्च की गई।

हालांकि सरकार का तर्क है कि जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर प्रचार पर खर्च किए जाने की प्राथमिकताओं की भी समीक्षा होनी चाहिए।

राज्योत्सव पर अकेले ₹6.90 करोड़ का प्रचार

रिपोर्ट की माने तो पिछले साल 1 नवंबर 2025 को आयोजित छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस समारोह के प्रचार-प्रसार पर अकेले ₹6.90 करोड़ खर्च किए गए।

इस राशि का उपयोग विभिन्न समाचार पत्रों, टीवी चैनलों, डिजिटल मीडिया, बैनर, होर्डिंग्स और अन्य प्रचार माध्यमों में विज्ञापन जारी करने के लिए किया गया था।

राज्य स्थापना दिवस छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा सरकारी आयोजन माना जाता है, इसलिए सरकार ने इसे व्यापक स्तर पर प्रचारित किया।

सरकार के विज्ञापन देने का उद्देश्य

सरकारी विज्ञापन का उद्देश्य केवल सरकार की छवि बनाना नहीं होता। इसके पीछे कई प्रशासनिक कारण भी होते हैं।

सरकारें विज्ञापनों के माध्यम से नागरिकों तक नई योजनाओं, स्वास्थ्य अभियानों, टीकाकरण कार्यक्रमों, शिक्षा योजनाओं, कृषि योजनाओं, रोजगार कार्यक्रमों, आपदा संबंधी चेतावनियों और विभिन्न सरकारी सेवाओं की जानकारी पहुंचाती हैं।

इनमें –

  • नई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत
  • किसानों के लिए नई सब्सिडी
  • भर्ती संबंधी घोषणाएं
  • स्वास्थ्य जागरूकता अभियान
  • परीक्षा, प्रवेश और छात्रवृत्ति से जुड़ी जानकारी
  • आपदा प्रबंधन से जुड़े संदेश जैसे मामलों में विज्ञापन एक महत्वपूर्ण संचार माध्यम माने जाते हैं।

लेकिन जब प्रचार का दायरा केवल योजनाओं की जानकारी से आगे बढ़कर सरकार की उपलब्धियों के व्यापक प्रचार तक पहुंच जाता है, तब खर्च की मात्रा को लेकर बहस शुरू हो जाती है।

केंद्र सरकार का विज्ञापन खर्च कितना रहा है?

केंद्र सरकार के विज्ञापन खर्च को लेकर भी समय-समय पर संसद और आरटीआई के माध्यम से आंकड़े सामने आते रहे हैं।

उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के माध्यम से लगभग ₹6,000 करोड़ से अधिक की राशि विज्ञापनों और जनसंपर्क अभियानों पर खर्च की।

इन विज्ञापनों का उपयोग कई राष्ट्रीय अभियानों के लिए किया गया, जिनमें प्रमुख रूप से –

  • स्वच्छ भारत मिशन
  • आयुष्मान भारत
  • प्रधानमंत्री आवास योजना
  • उज्ज्वला योजना
  • जल जीवन मिशन
  • कोविड-19 जागरूकता अभियान
  • टीकाकरण अभियान
  • डिजिटल इंडिया
  • जी-20 भारत अध्यक्षता
  • विभिन्न मंत्रालयों की जनजागरूकता योजनाएं जैसे कार्यक्रम शामिल रहे।

डिजिटल विज्ञापन का बढ़ता दौर

पहले सरकारी विज्ञापन मुख्य रूप से अखबारों, रेडियो और दूरदर्शन तक सीमित रहते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल मीडिया के विस्तार के बाद प्रचार की रणनीति भी तेजी से बदली है।

अब सरकारें और राजनीतिक दल गूगल विज्ञापन, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर), ओटीटी मंचों और विभिन्न समाचार वेबसाइट जैसे डिजिटल माध्यमों का व्यापक उपयोग कर रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने भी पिछले कुछ वर्षों में Google और YouTube जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगभग ₹120 करोड़ से अधिक खर्च किए। इसका उद्देश्य विशेष रूप से युवाओं और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाना था।

क्या सरकारी विज्ञापन लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं?

इस सवाल का जवाब पूरी तरह “हां” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों को नई योजनाओं, कानूनों, आपदाओं, स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों और जनहित कार्यक्रमों की जानकारी समय पर दे।

यदि सरकार विज्ञापन बिल्कुल बंद कर दे, तो कई महत्वपूर्ण योजनाओं की जानकारी दूरदराज़ क्षेत्रों तक पहुंचाना कठिन हो सकता है।

उदाहरण के लिए—

  • कोविड-19 टीकाकरण अभियान
  • पल्स पोलियो अभियान
  • आपदा चेतावनी
  • किसानों के लिए नई योजनाएं
  • छात्रवृत्ति कार्यक्रम
  • भर्ती और प्रवेश संबंधी सूचनाएं

इन सभी में सरकारी विज्ञापनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

समस्या कब उत्पन्न होती है?

ऐसे मामलों में विवाद तब शुरू होता है जब विज्ञापन का फोकस “योजना की जानकारी” से हटकर “सरकार की उपलब्धियों के प्रचार” पर अधिक दिखाई देता है। जनहित सूचना और राजनीतिक ब्रांडिंग के बीच एक स्पष्ट अंतर होना चाहिए।

यदि किसी विज्ञापन में नागरिकों के लिए उपयोगी जानकारी अधिक हो और राजनीतिक संदेश कम, तो उसे जनहित का विज्ञापन माना जाता है। लेकिन यदि विज्ञापन मुख्य रूप से सरकार या नेतृत्व की उपलब्धियों को प्रचारित करता दिखाई दे, तो उसके औचित्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या केवल भारत में ही ऐसा होता है?

अब सवाल ये है कि क्या प्रचार पर खर्च केवल भारत नें ही होता हैं? तो इसका जवाब है, नहीं।

अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में भी सरकारें सार्वजनिक जागरूकता अभियानों पर करोड़ों डॉलर खर्च करती हैं।

हालांकि कई देशों में इस खर्च की निगरानी के लिए स्वतंत्र ऑडिट, संसदीय समितियां और स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं, ताकि सरकारी विज्ञापनों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के बजाय जनहित सूचना तक सीमित रहे।

ये ही वजह है कि भारत में भी समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि सरकारी विज्ञापनों के लिए पारदर्शी मानक (Transparent Guidelines) और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाए।

विज्ञापनों पर खर्च बनती है अर्थव्यवस्था पर बोझ?

सरकारी विज्ञापनों पर होने वाला खर्च हमेशा से दो अलग-अलग नजरियों से देखा जाता रहा है। एक पक्ष का मानना है कि यदि सरकार अपनी योजनाओं की जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचाएगी, तो करोड़ों नागरिक उन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाएंगे।

वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि जब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे जैसी कई चुनौतियां मौजूद हों, तब प्रचार-प्रसार पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की प्राथमिकताओं की समीक्षा होनी चाहिए।

क्या कम खर्च में भी सरकार जनता तक पहुंच सकती है?

डिजिटल युग में सरकारों के पास ऐसे कई विकल्प मौजूद हैं, जिनसे कम लागत में भी करोड़ों नागरिकों तक सूचना पहुंचाई जा सकती है।

इनमें प्रमुख हैं—

1. व्हाट्सऐप चैनल और चैटबॉट

आज देश में करोड़ों लोग स्मार्टफोन और व्हाट्सऐप का उपयोग करते हैं। ऐसे में सरकार अपने आधिकारिक व्हाट्सऐप चैनलों और चैटबॉट के माध्यम से योजनाओं, सरकारी सेवाओं, आवेदन प्रक्रियाओं और जरूरी घोषणाओं की जानकारी सीधे नागरिकों तक पहुंचा सकती है।

यह माध्यम पारंपरिक विज्ञापनों की तुलना में कम खर्चीला, तेज और अधिक प्रभावी माना जाता है, क्योंकि संदेश कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं।

2. एसएमएस और सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट

आपदा, स्वास्थ्य चेतावनी, परीक्षा, छात्रवृत्ति, मौसम या किसान योजनाओं जैसी महत्वपूर्ण सूचनाएं सरकार एसएमएस और सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट के जरिए कम लागत में सीधे लोगों तक पहुंचा सकती है।

यह तरीका विशेष रूप से उन क्षेत्रों में भी प्रभावी है जहां इंटरनेट की पहुंच सीमित है। मोबाइल फोन रखने वाला लगभग हर व्यक्ति इस माध्यम से समय पर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है।

3. उमंग, डिजिलॉकर और अन्य सरकारी ऐप

सरकार पहले से उपलब्ध डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे उमंग, डिजिलॉकर और अन्य आधिकारिक मोबाइल ऐप के जरिए योजनाओं, सेवाओं और नई घोषणाओं की जानकारी नागरिकों तक पहुंचा सकती है।

इन प्लेटफॉर्म पर नोटिफिकेशन भेजकर लोगों को समय पर अपडेट देना संभव है। इससे अलग-अलग विज्ञापन अभियानों पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है और सरकारी सूचनाएं एक ही मंच पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

4. सोशल मीडिया का प्रभावी उपयोग

हर जानकारी के लिए महंगे विज्ञापन अभियान चलाना आवश्यक नहीं है। सरकार अपने आधिकारिक सोशल मीडिया खातों, यूट्यूब चैनलों, प्रेस वार्ताओं और नियमित डिजिटल अपडेट के माध्यम से भी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है।

यदि सोशल मीडिया का योजनाबद्ध और नियमित उपयोग किया जाए, तो कम खर्च में भी सरकारी योजनाओं और जनहित संदेशों का व्यापक प्रचार-प्रसार संभव है।

5. पंचायत और स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी

ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में पंचायतें, आंगनवाड़ी केंद्र, आशा कार्यकर्ता, कृषि विस्तार अधिकारी, स्वयं सहायता समूह और सामुदायिक रेडियो आज भी सूचना पहुंचाने के प्रभावी माध्यम हैं।

सरकार यदि इन स्थानीय संस्थाओं को अधिक सक्रिय रूप से जोड़े, तो बिना बड़े विज्ञापन खर्च के भी योजनाओं की जानकारी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाई जा सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर जागरूकता और जनभागीदारी दोनों बढ़ती हैं।

एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए जनता तक योजनाओं की जानकारी पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि सार्वजनिक धन का उपयोग पारदर्शिता, जवाबदेही और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर किया जाए।

आने वाले वर्षों में सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे कम लागत के साथ अधिक प्रभाव से नागरिकों तक अपनी बात पहुंचाएं। तभी सरकारी विज्ञापन वास्तव में जनहित का माध्यम बन पाएंगे, न कि केवल खर्च का एक बड़ा आंकड़ा।

ये भी पढ़ें :- पत्रकार ने ‘नमो एम्बुलेंस’ योजना पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप, तो सांसद ने करा दी Income Tax की रेड? जाने क्या है पूरा मामला

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MD Faijan

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लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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