Saturday, 03 October 2026
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सेंट्रल KYC एक्सेस से VDA सेक्टर में नियमों का पालन और भरोसे की दिशा में अहम कदम

नई दिल्ली, 13 अप्रैल 2026

भारत का क्रिप्टो इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में मजबूत नियमों का पालन (कम्प्लायंस) पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है और इसी दिशा में एक अहम हिस्सा है सेंट्रल KYC (CKYC) रजिस्ट्री तक पहुंच। धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत हुए बदलावों ने वर्चुअल डिजिटल एसेट सेवा प्रदाताओं को “रिपोर्टिंग एंटिटी” की श्रेणी में शामिल कर दिया है। इसका मतलब है कि अब उन्हें सख्त केवाईसी प्रक्रिया अपनानी होगी, पूरा रिकॉर्ड रखना होगा और संदिग्ध लेन-देन की जानकारी एफआईयू-इंडिया (FIU-IND) को देनी होगी।

बदलते हालात के साथ तालमेल बैठाने और सिस्टम की कमियों को दूर करने के लिए एफआईयू-इंडिया ने ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को और सख्त करते हुए अपने दिशा-निर्देश अपडेट किए हैं। ऐसे में CKYC का उपयोग बहुत जरूरी हो जाता है।

सेंट्रल केवाईसी एक ऐसा एकीकृत और मानकीकृत डेटाबेस है, जिसमें पूरे भारत के वित्तीय सिस्टम में व्यक्तियों और संस्थाओं की सत्यापित केवाईसी जानकारी होती है, जिसे सेंट्रल रजिस्ट्री ऑफ सिक्योरिटाइजेशन, एसेट रिकंस्ट्रक्शन एंड सिक्योरिटी इंटरेस्ट ऑफ इंडिया (CERSAI) चलाता है। CKYC प्लेटफॉर्म का मकसद ग्राहक ऑनबोर्डिंग को आसान बनाना, बार-बार केवाईसी जमा करने की जरूरत खत्म करना और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) नियमों के पालन को बेहतर करना है। आधिकारिक CKYC FAQs के अनुसार, इसकी पहुंच केवल उन्हीं संस्थाओं को दी जाती है जिन्हें PMLA या RBI, SEBI, IRDAI या PFRDA जैसे वित्तीय नियामकों से अनुमति मिली हो।

एफआईयू-इंडिया के साथ पंजीकृत होने के बाद भी — जो एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग निगरानी के लिए जिम्मेदार संस्था है — वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स को अभी तक CKYC डेटाबेस तक पहुंच नहीं मिली है। यह हैरान करने वाली बात है, खासकर जब CERSAI और अन्य वित्तीय संस्थाएं वित्त मंत्रालय के दायरे में आती हैं। वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स को इससे बाहर रखने से उनके लिए अपना काम करना मुश्किल हो जाता है और इससे पूरे वित्तीय सिस्टम में नियमों के तालमेल पर भी सवाल उठते हैं। उन्हें CKYC एक्सेस देने से न केवल उनका काम आसान होगा, बल्कि भारत के एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग सिस्टम को भी मजबूती मिलेगी।

यह रुकावट के पीछे एक अहम कारण यह है कि CKYC की पहुंच आमतौर पर उन्हीं संस्थाओं को मिलती है जो भारतीय रिज़र्व बैंक या सेबी जैसे पारंपरिक वित्तीय नियामकों के तहत आती हैं। चूंकि वर्चुअल डिजिटल एसेट प्लेटफॉर्म इन ढांचों के तहत नहीं आते, इसलिए वे अभी पात्रता के दायरे से बाहर हैं। हालांकि, अब जब वे औपचारिक रूप से एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों के तहत आ चुके हैं, तो यह एक तकनीकी समस्या है, जिसे नीति-निर्माता साफ अधिसूचना या संशोधन के जरिए हल कर सकते हैं।

यह मुद्दा तब और अहम हो जाता है जब इसे अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद केवाईसी से जुड़ी चुनौतियों के संदर्भ में देखा जाए। एक साल पहले वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (FSDC) ने एक समान केवाईसी मानकों की जरूरत पर चर्चा की थी। तत्कालीन वित्त सचिव टी. वी. सोमनाथन की अगुवाई में एक समिति बनाई गई थी, जिसका मकसद इन नियमों को आसान और एक जैसा बनाना था। ऐसी समितियों में वर्चुअल डिजिटल एसेट सेक्टर को शामिल करने से यह सुनिश्चित होगा कि मजबूत केवाईसी ढांचा बनाने की प्रक्रिया में कोई भी अहम पक्ष छूट न जाए।

वर्चुअल डिजिटल एसेट उद्योग के लिए PMLA का पालन केवल नियमों को पूरा करना नहीं है; यह उपयोगकर्ताओं का भरोसा बनाने और इस क्षेत्र की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। मजबूत केवाईसी प्रक्रिया और समय पर रिपोर्टिंग से वित्तीय अपराधों का खतरा कम होता है, उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी से बचाया जा सकता है और भारत में डिजिटल एसेट्स का सही तरीके से विकास होता है। वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स को CKYC सिस्टम का उपयोग करने की अनुमति देना एक व्यावहारिक कदम होगा, जिससे नियमों का पालन और उपभोक्ता सुरक्षा दोनों मजबूत होंगे, और भारत के डिजिटल एसेट इकोसिस्टम में भरोसा भी बढ़ेगा।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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