रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद में नमाजियों के प्रवेश, बिजली-पानी की आपूर्ति और संभावित तोड़फोड़ का मुद्दा उठा है। जानें हाई कोर्ट ने क्या कहा, केंद्र ने क्या आश्वासन दिया और अगली सुनवाई कब होगी।
नई दिल्ली: दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए प्रवेश की मांग करने वाले याचिकाकर्ता को दिल्ली हाई कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है। अदालत ने आसपास चल रहे तोड़फोड़ के काम से सुरक्षा संबंधी खतरे को देखते हुए श्रद्धालुओं को प्रवेश देने के लिए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
हालांकि, इसी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया कि दिल्ली वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधित्व पर फैसला होने तक मस्जिद के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी। अधिकारियों को इस मामले में चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेना है।
जस्टिस अनीश दयाल की अदालत में 29 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान मस्जिद में प्रवेश, बिजली-पानी की आपूर्ति और संभावित तोड़फोड़ को लेकर पक्षों की दलीलें सामने आईं। मामला सैयद अहमद सऊद की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने मस्जिद की सुरक्षा सुनिश्चित करने और नमाजियों के लिए प्रवेश का रास्ता खोलने की मांग की है।
प्रवेश की अनुमति देने से इनकार
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील अशोक नहीं, बल्कि केंद्रीय सरकारी स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने अदालत को बताया कि परिसर में तोड़फोड़ की गतिविधियां जारी हैं। ऐसे में मस्जिद तक लोगों की आवाजाही की अनुमति देना सुरक्षित नहीं होगा। सरकार की दलील थी कि निर्माण या तोड़फोड़ वाले क्षेत्र में लोगों के प्रवेश से दुर्घटना हो सकती है और किसी के घायल होने की स्थिति में मुआवजे की जिम्मेदारी का सवाल भी उठेगा।
न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने भी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यदि तोड़फोड़ के दौरान किसी को चोट लगती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। इसी आधार पर अदालत ने फिलहाल नमाजियों को प्रवेश देने के लिए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि परिसर में स्थित एक मंदिर तक भी फिलहाल लोगों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। सरकार का तर्क था कि प्रतिबंध केवल मस्जिद तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास चल रहे काम के कारण सुरक्षा को ध्यान में रखकर लगाया गया है।
याचिकाकर्ता के वकील एम. सुफियान सिद्दीकी ने इस दलील पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि परिसर में तोड़फोड़ का काम पूरा हो चुका है और इसलिए मस्जिद तक पहुंच बहाल करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर प्रवेश बहाल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया।
केंद्र सरकार ने क्या आश्वासन दिया?
मस्जिद को संभावित तोड़फोड़ से बचाने की मांग के बीच केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से दिए गए प्रतिनिधित्व पर चार सप्ताह के भीतर फैसला करेगा। तब तक मस्जिद के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मस्जिद को लेकर उठे विवाद में तत्काल तोड़फोड़ की आशंका पर अस्थायी रोक जैसी स्थिति बनी है।
केंद्र ने यह भी कहा कि वह वक्फ बोर्ड के 19 अक्टूबर के प्रतिनिधित्व पर निर्णय करेगा। सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि यदि हर नमाजी की व्यक्तिगत याचिका पर अलग-अलग कार्रवाई की जाने लगे, तो इसी तरह के कई मामले सामने आ सकते हैं। याचिकाकर्ता के वकील ने इस तर्क का विरोध किया।
अदालत ने केंद्र को अगली सुनवाई के समय स्थिति रिपोर्ट और संबंधित तस्वीरें प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होगी।
क्या है रेस कोर्स मस्जिद का पूरा मामला?
रेस कोर्स मस्जिद नई दिल्ली में रेस कोर्स क्लब परिसर के भीतर स्थित है। यह लगभग 53 एकड़ में फैले क्षेत्र का हिस्सा है, जो प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के नजदीक है। इस इलाके में दिल्ली रेस क्लब, जयपुर पोलो ग्राउंड और पहले झुग्गी बस्तियां भी मौजूद थीं।
केंद्र सरकार भूमि एवं विकास कार्यालय के माध्यम से इस क्षेत्र की जमीन को वापस अपने नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया चला रही है। इस दौरान आसपास की कई झुग्गी बस्तियों को हटाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां रहने वाले लगभग 700 परिवारों की झुग्गियां भी तोड़ी जा चुकी हैं।
इसी व्यापक कार्रवाई के बीच मस्जिद को लेकर भी चिंता बढ़ी। याचिकाकर्ता का दावा है कि मस्जिद को भी खाली कराने और संभावित रूप से गिराने का खतरा है। हालांकि, केंद्र ने अदालत में कहा कि फिलहाल मस्जिद को गिराने की कार्रवाई नहीं की जाएगी और वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधित्व पर विचार किया जाएगा।
विवाद का एक प्रमुख पहलू यह भी है कि मस्जिद उस जमीन पर स्थित है, जिस पर सरकार सार्वजनिक उद्देश्य से नियंत्रण वापस लेने की प्रक्रिया चला रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आसपास की जमीन को लेकर चल रही कार्रवाई के कारण मस्जिद के धार्मिक उपयोग और उसके अस्तित्व पर असर नहीं पड़ना चाहिए।
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मस्जिद को बताया गया वक्फ संपत्ति और हेरिटेज स्ट्रक्चर
याचिकाकर्ता सैयद अहमद सऊद ने अदालत में कहा है कि रेस कोर्स मस्जिद को 1977 से वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया गया है। उनका यह भी दावा है कि मस्जिद 150 साल से अधिक पुरानी है और इसे ग्रेड-II हेरिटेज स्ट्रक्चर का दर्जा प्राप्त है।
याचिका में कहा गया है कि मस्जिद की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान को ध्यान में रखे बिना उसके अस्तित्व को प्रभावित करने वाला कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि संरचना में बदलाव या उसे हटाने की कार्रवाई की जाती है, तो विरासत संरक्षण से जुड़े नियमों और आवश्यक अनुमतियों पर भी विचार करना होगा।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि मस्जिद में प्रवेश पर रोक लगाने के लिए कोई औपचारिक आदेश या नोटिस नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, नमाज पढ़ने के लिए आने वाले लोगों को प्रवेश से रोकना उनके धार्मिक अधिकारों को प्रभावित करता है।
बिजली और पानी की आपूर्ति काटी गई
मस्जिद को लेकर विवाद तब और बढ़ा, जब 7 अक्टूबर को वहां बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। याचिकाकर्ता और मस्जिद से जुड़े पक्षों का कहना है कि इस कदम से धार्मिक गतिविधियों पर असर पड़ा और भविष्य में संरचना को हटाए जाने की आशंका भी मजबूत हुई।
दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 19 अक्टूबर को भूमि एवं विकास कार्यालय को प्रतिनिधित्व भेजकर बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने की मांग की थी। बोर्ड ने अपने पत्र में मस्जिद की वक्फ संपत्ति और ग्रेड-II हेरिटेज स्ट्रक्चर की स्थिति का उल्लेख करते हुए मामले पर प्राथमिकता से विचार करने का अनुरोध किया।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कहा कि आसपास चल रहे तोड़फोड़ के काम के कारण बिजली और पानी की आपूर्ति बंद की गई थी, ताकि वहां मौजूद लोगों की सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम न हो। सरकार की दलील है कि यह कदम आसपास की गतिविधियों से जुड़े सुरक्षा संबंधी कारणों के तहत उठाया गया।
मस्जिद में प्रवेश और सुविधाओं की बहाली को लेकर इससे पहले भी अदालत में मामला पहुंचा था। 15 अक्टूबर को मस्जिद के इमाम की ओर से बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई थी।
संविधान के अनुच्छेद 25 का दिया हवाला
सैयद अहमद सऊद ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख किया है, जो धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता से जुड़ा है। उनका कहना है कि मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोकना उनके धार्मिक अभ्यास के अधिकार को प्रभावित करता है।
याचिका में अनुच्छेद 14 का भी हवाला दिया गया है, जो कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण से संबंधित है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि बिना औपचारिक आदेश के प्रवेश रोकना मनमाना कदम है।
उन्होंने अदालत से मांग की कि मस्जिद तक आने-जाने की अनुमति बहाल की जाए और संरचना को गिराने, सील करने, उसमें बदलाव करने या किसी अन्य तरह की कठोर कार्रवाई से सुरक्षा दी जाए। उन्होंने दिल्ली वक्फ बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बोर्ड ने मस्जिद की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
अगली सुनवाई पर सबकी नजर
अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम भूमि एवं विकास कार्यालय का फैसला होगा। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि दिल्ली वक्फ बोर्ड के 19 अक्टूबर के प्रतिनिधित्व पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाएगा। इस दौरान मस्जिद के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का आश्वासन दिया गया है।
अदालत ने केंद्र से अगली सुनवाई पर स्थिति रिपोर्ट और तस्वीरें पेश करने को कहा है। 16 दिसंबर को होने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित अधिकारी ने वक्फ बोर्ड के अनुरोध पर क्या निर्णय लिया और मस्जिद की सुरक्षा तथा प्रवेश से जुड़े मुद्दों पर क्या स्थिति बनी है।
फिलहाल दो सवाल अब भी अनसुलझे हैं। पहला, मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए प्रवेश कब और किन शर्तों पर बहाल किया जाएगा? दूसरा, मस्जिद की वक्फ संपत्ति और विरासत संरचना से जुड़ी स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकार आगे क्या कदम उठाएगी?
दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल प्रवेश की अनुमति नहीं दी है, लेकिन मस्जिद को गिराने की मंजूरी भी नहीं दी है। केंद्र का चार सप्ताह का आश्वासन तत्काल कार्रवाई को रोकता है, जबकि विवाद से जुड़े बाकी सवालों पर आगे की प्रक्रिया और अदालत की सुनवाई के बाद ही स्थिति साफ होगी।




