असम में बाढ़ का कहर जारी है। 75 लोगों की मौत और 3.32 लाख से अधिक लोग प्रभावित हैं। जानिए सरकार ने राहत, मुआवजे और छात्रों के लिए क्या बड़े फैसले लिए।
गुवाहाटी/नई दिल्ली: असम एक बार फिर बाढ़ की गंभीर मार झेल रहा है। लगातार बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने राज्य के कई इलाकों में जनजीवन को प्रभावित किया है। मंगलवार (28 जुलाई) तक राज्य में बाढ़ से अपनी जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर 75 हो गई है। हालांकि, बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या में कुछ कमी आई है और अब भी करीब 3.32 लाख लोग सात जिलों में बाढ़ की चपेट में हैं।
इस बीच असम सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाने, राहत व्यवस्था को मजबूत करने और प्रभावित छात्रों को मदद देने जैसे कई अहम फैसलों की घोषणा की है।
सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की है। एक ओर बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, राहत सामग्री उपलब्ध कराना और स्वास्थ्य सेवाएं जारी रखना जरूरी है, तो दूसरी ओर फसल, घरों, स्कूलों और अन्य बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का आकलन भी करना है।
असम में हर साल आने वाली बाढ़ के बीच इस बार भी यह सवाल उठ रहा है कि तत्काल राहत के साथ-साथ राज्य को दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन के लिए किस तरह की रणनीति अपनानी होगी।
सात जिलों में अब भी बाढ़ का असर
असम स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (ASDMA) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 28 जुलाई तक राज्य के सात जिले शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट, जोरहाट, नगांव, सोनितपुर और कामरूप मेट्रोपॉलिटन बाढ़ से प्रभावित थे। इन जिलों के 21 रेवेन्यू सर्किल और 622 गांव बाढ़ की चपेट में हैं।
कुल प्रभावित आबादी 3,32,639 बताई गई है। इनमें चराइदेव सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है, जहां करीब 1,42,756 लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। इसके बाद शिवसागर में 97,074 और जोरहाट में 57,371 लोग प्रभावित बताए गए हैं।
हालांकि, यह संख्या कुछ दिन पहले के आंकड़ों से कम है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का पानी कम होना शुरू हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संकट पूरी तरह खत्म हो गया है। कई इलाकों में पानी उतरने के बाद भी लोगों के सामने घरों की सफाई, पेयजल, स्वास्थ्य, भोजन और आजीविका से जुड़ी बड़ी चुनौतियां बनी रहती हैं।
मौत का आंकड़ा 75 तक पहुंचा
असम में बाढ़ से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। 28 जुलाई को सात और मौतें सामने आने के बाद कुल मृतकों की संख्या 75 हो गई। ये सातों मौतें शिवसागर जिले के नाजिरा रेवेन्यू सर्किल से रिपोर्ट की गईं।
बाढ़ के दौरान मौतों का सबसे बड़ा कारण डूबना और तेज बहाव में फंसना होता है। इसके अलावा, कई बार बाढ़ के साथ आने वाली अन्य आपदाएं भी जोखिम बढ़ाती हैं। ऐसे में राहत और बचाव अभियान के दौरान प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की होती है।
सरकार ने मृतकों के परिवारों को मिलने वाली आर्थिक सहायता के नियमों में भी राहत देने की घोषणा की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को मुआवजा प्राप्त करने के लिए लंबी और जटिल प्रक्रिया से न गुजरना पड़े।
9 लाख रुपये की आर्थिक मदद का ऐलान
बाढ़ से प्रभावित परिवारों के लिए असम सरकार ने आर्थिक सहायता बढ़ाने का फैसला किया है। सरकार के अनुसार, मृतकों के परिवारों को मिलने वाली कुल सहायता राशि 9 लाख रुपये तक होगी। इसमें राज्य के मुख्यमंत्री राहत कोष से अतिरिक्त 5 लाख रुपये की सहायता शामिल है।
सरकार ने मुआवजे की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए भी नियमों में बदलाव किया है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मामलों में मुआवजा प्राप्त करने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट की अनिवार्यता को आसान किया गया है और संबंधित सर्किल अधिकारी का प्रमाणपत्र पर्याप्त हो सकता है।
बाढ़ में लापता लोगों के परिवारों के लिए भी सहायता का प्रावधान किया गया है। यदि किसी लापता व्यक्ति का शव एक महीने के भीतर नहीं मिलता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसके परिवार को भी कुल 9 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का प्रावधान बताया गया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में कई बार तेज बहाव के कारण शवों का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में परिवारों को आर्थिक सहायता के लिए लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े, इसके लिए नियमों में राहत देने की कोशिश की गई है।
राहत शिविरों में हजारों लोग
बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित रखने के लिए राज्य में राहत शिविर भी संचालित किए जा रहे हैं। ASDMA के आंकड़ों के अनुसार, 81 राहत शिविर चालू किए गए हैं, जहां करीब 32,477 विस्थापित लोगों ने शरण ली हुई है। इसके अलावा 34 राहत वितरण केंद्र भी काम कर रहे हैं।
राहत और बचाव कार्य में कई एजेंसियां शामिल हैं। इनमें भारतीय सेना, भारतीय वायुसेना, NDRF, SDRF, फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज और स्थानीय स्वयंसेवक शामिल हैं। इन एजेंसियों का काम प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को निकालना, राहत सामग्री पहुंचाना और जरूरतमंदों तक आवश्यक सेवाएं पहुंचाना है।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत कार्य केवल भोजन और पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। लोगों को दवाएं, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता सुविधाएं और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराना भी जरूरी है। बाढ़ का पानी लंबे समय तक जमा रहने पर संक्रमण और जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
फसल और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान
असम की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है और बाढ़ का सीधा असर किसानों पर पड़ता है। ASDMA के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 45,341.98 हेक्टेयर फसल क्षेत्र पानी में डूबा हुआ है।
फसल बर्बाद होने का असर केवल तत्काल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता। किसानों को आने वाले महीनों में बीज, खाद और खेती की लागत जुटाने में भी परेशानी हो सकती है। जिन परिवारों की आजीविका खेती या पशुपालन पर निर्भर है, उनके लिए बाढ़ का असर और गंभीर हो जाता है।
बाढ़ से कई स्थानों पर घरों, पशुशालाओं, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों को भी नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में पानी उतरने के बाद सरकार के सामने पुनर्वास और पुनर्निर्माण की बड़ी जिम्मेदारी होगी।
छात्रों के लिए भी राहत का ऐलान
असम सरकार ने बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित शिवसागर और चराइदेव जिलों के छात्रों के लिए भी सहायता की घोषणा की है। सरकार ने इन जिलों के छात्रों को दोबारा मुफ्त स्कूल यूनिफॉर्म और पाठ्यपुस्तकों के लिए सहायता देने का फैसला किया है।
यह सहायता उच्च माध्यमिक, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के छात्रों तक भी पहुंचाने की बात कही गई है। इसके अलावा, बाढ़ में शैक्षणिक दस्तावेजों के नुकसान की स्थिति में डुप्लीकेट मार्कशीट जारी करने की फीस माफ करने का भी फैसला किया गया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक आपदा के दौरान बच्चों की पढ़ाई अक्सर सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। घर और सामान खोने वाले परिवारों के लिए किताबें, यूनिफॉर्म और शैक्षणिक दस्तावेज दोबारा बनवाना अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है।
‘ओरुनोदोई‘ लाभार्थियों के लिए भी अतिरिक्त सहायता
राज्य सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा सहायता बढ़ाने की भी घोषणा की है। रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ से गंभीर रूप से प्रभावित चार जिलों में ओरुनोदोई योजना के लाभार्थियों को अगस्त महीने में सामान्य 1,250 रुपये के बजाय 2,500 रुपये देने की घोषणा की गई है।
सरकार का कहना है कि तत्काल राहत और छात्रों के लिए घोषित सहायता के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से राशि उपलब्ध कराई जाएगी। मुख्यमंत्री राहत कोष में बाढ़ की हालिया लहर के बाद 26 करोड़ रुपये से अधिक का दान जमा होने की बात भी सामने आई है।
असम के विधायकों ने भी मदद का ऐलान किया
बाढ़ संकट के बीच असम के विधायकों की तरफ से भी राहत कार्यों में योगदान देने की बात सामने आ रही है। राज्य के अधिकांश विधायकों ने बाढ़ राहत के लिए एक महीने का वेतन देने की प्रतिबद्धता जताई है।
हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक रायजोर दल के सदस्य इस पहल में शामिल नहीं हुए। यह राजनीतिक दलों के बीच राहत और सरकार की बाढ़ प्रबंधन नीति को लेकर अलग-अलग रुख को भी सामने लाता है।
ऐसे समय में जनप्रतिनिधियों की ओर से आर्थिक योगदान राहत कार्यों में मदद कर सकता है, लेकिन असम जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य के लिए केवल तत्काल राहत पर्याप्त नहीं है। राज्य को हर साल आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति की भी जरूरत है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्थिति की समीक्षा की
असम में बाढ़ की गंभीर स्थिति के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हालात की समीक्षा की है। केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच समन्वय के जरिए राहत और बचाव कार्यों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। राहत सामग्री, भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता प्रभावित लोगों तक पहुंचाना प्राथमिकता में है।
असम में आपदा प्रबंधन के लिए राज्य स्तर पर ASDMA के साथ-साथ NDRF और SDRF की टीमें भी सक्रिय रहती हैं। बाढ़ की स्थिति बिगड़ने पर स्थानीय प्रशासन की ओर से लोगों को राहत शिविरों में पहुंचाने और सुरक्षित स्थानों पर निकालने की कार्रवाई की जाती है।
नदियों का बढ़ता जलस्तर बना बड़ी चुनौती
असम की बाढ़ की समस्या का एक बड़ा कारण राज्य की नदी प्रणाली है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण तेजी से उफान पर आ जाती हैं। जब नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जाता है, तो निचले इलाकों और नदी किनारे बसे गांवों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

गोलाघाट जिले के नुमालीगढ़ में धनसिरी (दक्षिण) नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य के साथ-साथ जलस्तर की लगातार निगरानी भी जरूरी है।
असम की भौगोलिक स्थिति भी बाढ़ की समस्या को जटिल बनाती है। राज्य का बड़ा हिस्सा नदी घाटियों और निचले इलाकों में स्थित है। भारी बारिश के साथ जब ऊपरी क्षेत्रों से पानी नीचे आता है, तो कई स्थानों पर अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
फिलहाल असम में राहत और बचाव कार्य जारी है और प्रभावित आबादी का आंकड़ा कुछ कम हुआ है। लेकिन 75 लोगों की मौत और 3.32 लाख से अधिक लोगों के प्रभावित होने का आंकड़ा बताता है कि संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। प्रभावित जिलों में पानी उतरने के बाद भी पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका बहाल करने में समय लगेगा।
राज्य सरकार की ओर से मृतकों के परिवारों को 9 लाख रुपये तक की सहायता, छात्रों के लिए शैक्षणिक मदद, राहत शिविरों का संचालन और प्रभावित परिवारों के लिए अंतरिम सहायता जैसे कदम तत्काल राहत देने की दिशा में हैं। वहीं केंद्र और राज्य की एजेंसियां बचाव अभियान में जुटी हैं।
लेकिन असम की बाढ़ की चुनौती हर साल लौटती है। इसलिए इस बार का संकट एक बार फिर यह सवाल सामने ला रहा है कि क्या राज्य को राहत और मुआवजे से आगे बढ़कर ऐसी स्थायी रणनीति तैयार करनी होगी, जो बाढ़ के प्रभाव को कम कर सके।
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