19 वर्षीय NEET अभ्यर्थी अंकिता सांगले की मौत के बाद परीक्षा के दबाव और छात्र आत्महत्याओं का मुद्दा फिर चर्चा में है। जानिए क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े।
अहिल्यानगर, महाराष्ट्र: मेडिकल कॉलेज में दाखिले का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के लिए NEET-UG सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि उनके भविष्य की दिशा तय करने वाली परीक्षा बन चुका है। ऐसे में जब एक छात्र अपने लक्ष्य से कुछ अंकों से पीछे रह जाता है, तो निराशा और मानसिक दबाव कई बार बेहद गंभीर रूप ले सकता है।
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले से सामने आई 19 वर्षीय NEET अभ्यर्थी अंकिता सांगले की मौत ने इसी दबाव को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अंकिता ने NEET में 166 अंक हासिल किए थे और वह कथित तौर पर कटऑफ से 11 अंक पीछे रह गई थीं। इसके बाद वह मानसिक तनाव और निराशा से गुजर रही थीं।
शनिवार (25 जुलाई) को उनके निधन के बाद परिवार और रिश्तेदारों ने बताया कि वह परीक्षा के परिणाम को लेकर बेहद परेशान थीं। इस घटना ने न केवल एक परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर देश की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था में सफलता और असफलता का दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर कितना भारी पड़ रहा है।
अहिल्यानगर की अंकिता सांगले की कहानी
रिपोर्ट के अनुसार, 19 वर्षीय अंकिता सांगले महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के जालालपुर गांव की रहने वाली थीं। वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG की तैयारी कर रही थीं और डॉक्टर बनने का सपना देख रही थीं। परिवार के अनुसार, उन्होंने परीक्षा के लिए मेहनत की थी और उन्हें अपने प्रदर्शन से बेहतर परिणाम की उम्मीद थी।
उनके चचेरे भाई परेश जाधव के हवाले से बताया गया कि NEET के परिणाम के बाद अंकिता अवसाद और निराशा से गुजर रही थीं। परिवार के मुताबिक, वह परीक्षा में कम अंक आने के बाद खुद को परिवार की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने के लिए जिम्मेदार मान रही थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, अंकिता को 166 अंक मिले थे, जो कथित तौर पर संबंधित कटऑफ से 11 अंक कम थे। शनिवार को करीब 4:30 बजे वह अपने कमरे में मृत पाई गईं। पुलिस ने मामले में आकस्मिक मृत्यु का मामला दर्ज किया है।
पुलिस को उनके कमरे से मराठी में लिखा एक हस्तलिखित नोट भी मिला। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि इस नोट में उन्होंने अपने परिवार के प्रति प्रेम और उनके द्वारा किए गए त्याग का जिक्र किया तथा अपने भाई से माता-पिता की देखभाल करने की अपील की।
सिर्फ 11 अंकों के अंतर ने ले ली जान
अंकिता की घटना में सबसे ज्यादा चर्चा 11 अंकों के अंतर की हो रही है। लेकिन इस घटना को सिर्फ ’11 नंबर कम आने’ की कहानी के रूप में देखना काफी नहीं होगा। इसके पीछे उस व्यापक मानसिक और सामाजिक दबाव को समझना जरूरी है, जिसमें कई छात्र वर्षों तक जीते हैं।
NEET-UG भारत की सबसे प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है। मेडिकल सीटों की सीमित संख्या, लाखों अभ्यर्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा, परिवार की अपेक्षाएं, कोचिंग का दबाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता छात्रों के तनाव को बढ़ा सकते हैं।
कई छात्रों के लिए डॉक्टर बनने का सपना केवल व्यक्तिगत ही नहीं होता। परिवार वर्षों तक उनकी पढ़ाई पर पैसे खर्च करते हैं, अभिभावक अपनी उम्मीदें उनसे जोड़ते हैं और समाज में भी मेडिकल शिक्षा को प्रतिष्ठित करियर के रूप में देखा जाता है। ऐसी स्थिति में परीक्षा का परिणाम कई छात्रों को ऐसा महसूस करा सकता है कि उनकी पूरी मेहनत और पहचान एक ही स्कोर से तय हो रही है।
NEET विवाद और परीक्षा का बढ़ता दबाव
अंकिता के आत्महत्या की खबर ऐसे समय सामने आई है, जब देश में NEET-UG परीक्षा प्रणाली और कथित पेपर लीक को लेकर पहले से व्यापक बहस चल रही है। परीक्षा से जुड़े विवादों और दोबारा परीक्षा की परिस्थितियों ने भी कई छात्रों और परिवारों के तनाव को बढ़ाया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल उठाया है कि परीक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की अनिश्चितता का सबसे बड़ा बोझ आखिर छात्रों को ही क्यों उठाना पड़ता है। एक छात्र महीनों और वर्षों तक तैयारी करता है। वह एक परीक्षा में अपना भविष्य देखता है। ऐसे में परीक्षा से जुड़ी किसी भी गड़बड़ी, परिणाम में बदलाव या दोबारा परीक्षा का असर उसके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
भारत में छात्र आत्महत्या के डराने वाले आंकड़े
अंकिता की घटना को देश में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की बड़ी तस्वीर से अलग करके नहीं देखा जा सकता। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच भारत में 1,23,918 छात्रों की आत्महत्या से मौत दर्ज की गई।
इसी अवधि में छात्र आत्महत्याओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। 2014 में 8,068 छात्र आत्महत्याएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 14,488 हो गई।
अगर 2014 और 2024 के आंकड़ों की तुलना करें तो एक दशक में दर्ज छात्र आत्महत्याओं की संख्या लगभग 80 प्रतिशत बढ़ी। वहीं 2015 से 2024 के बीच कुल 1,15,850 छात्र आत्महत्याएं दर्ज होने की रिपोर्ट है।
2024 में ही छात्र आत्महत्याओं की संख्या 14,488 रही, जो उस वर्ष दर्ज कुल आत्महत्याओं का लगभग 8.5 प्रतिशत थी।
ये आंकड़े किसी एक परीक्षा या एक कारण से जुड़ी तस्वीर नहीं दिखाते। NCRB के अनुसार, पारिवारिक समस्याएं आत्महत्या के मामलों में प्रमुख रिपोर्टेड कारणों में शामिल रही हैं। 2024 में परीक्षा में असफलता से जुड़े 2,032 छात्र आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं
NCRB के उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टिंग के अनुसार, महाराष्ट्र में छात्र आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक रही है। इस सूची में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों का स्थान बताया गया है। इन चार राज्यों को मिलाकर देश में दर्ज छात्र आत्महत्याओं का बड़ा हिस्सा सामने आता है।
रिपोर्टों में छात्र आत्महत्याओं की भौगोलिक एकाग्रता को बड़े कोचिंग और शिक्षा केंद्रों से भी जोड़ा गया है। कोटा, दिल्ली-NCR, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में बड़ी संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं।

इन क्षेत्रों में बड़ी छात्र आबादी होने के कारण ऐसे मामलों की संख्या अधिक दिखाई दे सकती है और हर घटना के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।
क्या छात्रों पर बढ़ रहा है परीक्षा का दबाव?
आज प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव कई स्तरों पर काम करता है। पहला दबाव है सीटों और अवसरों की सीमित संख्या। दूसरा है लाखों छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा। तीसरा है परिवार और समाज की अपेक्षाएं। इसके साथ ही कोचिंग फीस, हॉस्टल का खर्च और वर्षों की तैयारी भी छात्रों में किसी भी हाल में सफल होने का मानसिक दबाव उत्पन्न कर सकती है।
इसके अलावा सोशल मीडिया और दोस्तों के बीच तुलना भी तनाव को बढ़ा सकती है। जब छात्र अपने आसपास सफल उम्मीदवारों की कहानियां देखते हैं, तो उन्हें अपनी असफलता अधिक बड़ी लग सकती है।
विशेषज्ञों ने भी छात्र आत्महत्याओं में परीक्षा का दबाव, अभिभावकों की अपेक्षाएं, करियर की चिंता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसे कारकों पर चिंता जताई है। लेकिन इस समस्या का समाधान सिर्फ परीक्षा प्रणाली में बदलाव से नहीं होगा। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर परिवार, स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थानों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी।
क्या सिर्फ नंबर ही है सफलता का पैमाना?
अंकिता सांगले की मौत इस सवाल को फिर सामने लाती है कि क्या एक परीक्षा का स्कोर किसी युवा के पूरे भविष्य का फैसला कर सकता है?
NEET जैसी परीक्षाओं में एक-दो अंक भी कई बार रैंक और सीट के अवसर में बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं। लेकिन जीवन के स्तर पर देखें तो किसी परीक्षा में कम अंक आना अंतिम परिणाम नहीं है। मेडिकल शिक्षा के अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई अन्य करियर विकल्प मौजूद हैं। इसके अलावा किसी छात्र के पास दोबारा परीक्षा देने, दूसरे विषय चुनने या अलग पेशे में जाने के रास्ते भी होते हैं।
समस्या यह है कि परीक्षा के तनाव के बीच कई छात्र इन विकल्पों को देख ही नहीं पाते। उन्हें लगता है कि जिस करियर का सपना उन्होंने वर्षों से देखा है, उसके पूरा न होने का मतलब सब कुछ खत्म हो जाना है। यहीं परिवार और समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
अभिभावकों को देना होगा ध्यान
अंकिता की मौत को सिर्फ एक दुखद खबर बनाकर भूल जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। भारत को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता को शिक्षा व्यवस्था का नियमित हिस्सा बनाने की जरूरत है।
कोचिंग संस्थानों में प्रशिक्षित काउंसलर, तनाव प्रबंधन कार्यक्रम और समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। अभिभावकों को भी बच्चों के परिणाम से ज्यादा उनकी मानसिक स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
छात्रों को यह भरोसा मिलना जरूरी है कि असफलता के बाद भी परिवार उनके साथ खड़ा रहेगा। परीक्षा में कम अंक आने पर उन्हें शर्मिंदा करने या दूसरों से तुलना करने के बजाय उनसे बातचीत करना अधिक जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी छात्र को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी जिंदगी की कीमत उसके परीक्षा परिणाम से कम या ज्यादा होती है।
अंकिता सांगले का मामला एक परिवार की अपूरणीय क्षति है, लेकिन यह घटना देश के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। जब पिछले 10 सालों में 1.23 लाख से ज्यादा छात्र आत्महत्याओं के आंकड़े सामने आते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि समस्या सिर्फ एक परीक्षा या एक परिणाम की नहीं है।
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