Thursday, 27 August 2026
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27 अगस्त 1896: जब सिर्फ 38 मिनट में खत्म हो गई इतिहास की सबसे छोटी जंग, जानिए एंग्लो-जांजीबार युद्ध की पूरी कहानी

एक सुल्तान की मौत, सत्ता पर दावा और ब्रिटिश अल्टीमेटम ने जांजीबार को युद्ध में धकेल दिया। जानिए 38 मिनट की इस ऐतिहासिक जंग की पूरी कहानी।

जांजीबार, तंजानिया: कल्पना कीजिए कि किसी युद्ध के लिए सेना तैयार हो, तोपें तैनात हों, समुद्र में युद्धपोत खड़े हों और एक शाही महल निशाने पर हो। गोलाबारी शुरू हो और करीब 38 मिनट बाद सब कुछ खत्म भी हो जाए।

इतिहास में ऐसी ही एक जंग आज से 130 साल पहले,  27 अगस्त 1896 को पूर्वी अफ्रीका के जांजीबार में लड़ी गई थी। इसे आज आम तौर पर दुनिया का सबसे छोटा दर्ज युद्ध माना जाता है। ब्रिटिश साम्राज्य और जांजीबार सल्तनत के बीच हुई इस लड़ाई ने भले ही एक घंटे से भी कम समय लिया, लेकिन इसके पीछे सत्ता, औपनिवेशिक प्रभाव और उत्तराधिकार की गहरी राजनीतिक कहानी छिपी थी।

इस युद्ध को Anglo-Zanzibar War के नाम से जाना जाता है। यह 27 अगस्त 1896 को ब्रिटेन और जांजीबार सल्तनत के बीच हुआ। अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोत इसकी अवधि 38, 40, 43 या लगभग 45 मिनट बताते हैं, लेकिन 38 मिनट का आंकड़ा सबसे ज्यादा प्रचलित है। ब्रिटिश जीत के साथ यह संघर्ष समाप्त हुआ और जांजीबार में ब्रिटिश राजनीतिक नियंत्रण और मजबूत हो गया।

जांजीबार आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

आज का जांजीबार तंजानिया का हिस्सा है, लेकिन 19वीं सदी के अंत में यह हिंद महासागर के महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों में से एक था। पूर्वी अफ्रीका के तट से दूर स्थित यह द्वीपसमूह अरब, अफ्रीकी और यूरोपीय व्यापारिक हितों के बीच महत्वपूर्ण स्थान रखता था। उस दौर में यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका में अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थीं, जिसे इतिहास में ‘अफ्रीका के लिए होड़’ (Scramble for Africa) के नाम से जाना जाता है।

1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच हुए Heligoland-Zanzibar Treaty ने पूर्वी अफ्रीका में दोनों साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभाव के क्षेत्रों को स्पष्ट करने में भूमिका निभाई। इसके बाद जांजीबार ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में आ गया और ब्रिटेन ने वहां संरक्षित राज्य के रूप में अपना प्रभाव कायम किया। इस व्यवस्था ने जांजीबार के शासक की सत्ता को पूरी तरह स्वतंत्र नहीं छोड़ा।

यहीं से आगे चलकर उत्तराधिकार का सवाल ब्रिटेन और जांजीबार के बीच टकराव का कारण बना।

एक सुल्तान की मौत ने बदल दिया पूरा घटनाक्रम

25 अगस्त 1896 को जांजीबार के सुल्तान हमद बिन थुवैनी (Hamad bin Thuwaini) की अचानक मौत हो गई। वह ब्रिटेन के अनुकूल माने जाते थे। उनकी मौत के कुछ ही समय बाद उनके रिश्तेदार खालिद बिन बरगश (Khalid bin Barghash) ने सत्ता पर दावा कर दिया और खुद को नया सुल्तान घोषित कर दिया।

समस्या यह थी कि ब्रिटिश अधिकारी खालिद को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। ब्रिटेन चाहता था कि उसकी पसंद का उम्मीदवार सत्ता संभाले। इसके पीछे केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं थी, बल्कि जांजीबार पर ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की व्यापक औपनिवेशिक रणनीति भी थी।

खालिद ने ब्रिटिश अनुमति के बिना महल पर कब्जा कर लिया और अपने समर्थकों को वहां इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में लगभग 2,800 लोग उसके समर्थन में जुट गए। इनमें महल के सुरक्षाकर्मी, सैनिक, सेवक और आम लोग भी शामिल थे। महल के आसपास तोपें भी तैनात कर दी गईं।

ब्रिटेन ने दिया अल्टीमेटम

ब्रिटिश राजनयिक प्रतिनिधि बेसिल केव (Basil Cave) और ब्रिटिश नौसेना के अधिकारी रियर एडमिरल हैरी रॉसन (Harry Rawson) ने खालिद को सत्ता छोड़ने का आदेश दिया। ब्रिटेन की मांग साफ थी, खालिद महल खाली करें और सुल्तान पद से हट जाएं।

लेकिन खालिद पीछे हटने को तैयार नहीं थे। उन्हें उम्मीद थी कि ब्रिटेन शायद वास्तविक सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा। ब्रिटिश अधिकारियों ने बातचीत के जरिए संकट खत्म करने की कोशिश की, लेकिन कोई समझौता नहीं हुआ।

26 अगस्त को ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रतिनिधियों को जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई करने की अनुमति दे दी। इसके बाद जांजीबार के बंदरगाह में ब्रिटिश युद्धपोतों की स्थिति और मजबूत कर दी गई। ब्रिटिश पक्ष के पास आधुनिक हथियारों से लैस नौसैनिक ताकत थी, जबकि खालिद की सेना मुख्य रूप से महल और उसके आसपास मौजूद सैनिकों और समर्थकों पर निर्भर थी।

27 अगस्त की सुबह आया निर्णायक पल

27 अगस्त 1896 की सुबह तनाव चरम पर पहुंच गया। ब्रिटेन ने खालिद को अंतिम मौका दिया। अल्टीमेटम की समय सीमा सुबह 9 बजे खत्म होनी थी।

खालिद ने आत्मसमर्पण नहीं किया। इसके बाद ब्रिटिश नौसेना ने कार्रवाई शुरू कर दी। करीब 9:02 बजे ब्रिटिश जहाजों ने सुल्तान के महल पर गोलाबारी शुरू कर दी। महल पर लगातार गोले बरसने लगे और कुछ ही मिनटों में उसमें आग लग गई।

यह हमला केवल जमीन तक सीमित नहीं था। समुद्र में भी छोटी-सी नौसैनिक भिड़ंत हुई। जांजीबार की शाही नौका ग्लास्गो ने ब्रिटिश जहाज HMS St George पर गोली चलाने की कोशिश की। ब्रिटिश जवाबी कार्रवाई में ग्लास्गो डूब गई। इसके अलावा दो छोटी नौकाएं भी नष्ट कर दी गईं।

महल के आसपास मौजूद जांजीबारी तोपों को भी ब्रिटिश गोलाबारी ने जल्दी ही निष्क्रिय कर दिया। ब्रिटिश नौसेना की तकनीकी और सैन्य बढ़त इतनी स्पष्ट थी कि खालिद की सेना ज्यादा देर तक मुकाबला नहीं कर सकी।

सिर्फ 38 मिनट में खत्म हुई जंग

करीब सुबह 9:40 पर ब्रिटिश गोलाबारी बंद हो गई। सुल्तान के महल पर लगा झंडा नीचे गिर चुका था और महल का बड़ा हिस्सा आग और गोलाबारी से तबाह हो चुका था। इस तरह लगभग 38 मिनट में युद्ध समाप्त हो गया।

यही वह वजह है जिसके कारण एंग्लो-जांजीबार युद्ध को इतिहास का सबसे छोटा युद्ध कहा जाता है। हालांकि इतिहासकारों के बीच इसकी सटीक अवधि को लेकर थोड़ा अंतर है। कुछ स्रोत इसे 40, 43 या 45 मिनट तक बताते हैं। इतनी कम अवधि के बावजूद लड़ाई बेहद हिंसक थी।

500 के करीब जांजीबारी हताहत, ब्रिटेन का सिर्फ एक घायल

युद्ध की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी अवधि ही नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के नुकसान में भारी अंतर था। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार करीब 500 जांजीबारी लोग मारे गए या घायल हुए। इनमें महल के सुरक्षाकर्मी और अन्य लोग शामिल थे। ब्रिटिश पक्ष को केवल एक नौसैनिक के घायल होने का नुकसान उठाना पड़ा।

इतिहासकारों के अनुसार महल की संरचना और वहां बड़ी संख्या में मौजूद लोगों के कारण ब्रिटिश गोलाबारी का प्रभाव बेहद घातक रहा। महल में लगी आग ने भी जान-माल के नुकसान को बढ़ाया।

ब्रिटिश सेना की आधुनिक नौसैनिक ताकत और हथियारों ने इस छोटे से संघर्ष का परिणाम कुछ ही मिनटों में तय कर दिया। यह युद्ध 19वीं सदी के अंत में यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों की सैन्य तकनीकी बढ़त का भी उदाहरण बन गया।

खालिद कहां गए?

गोलाबारी शुरू होने के बाद खालिद बिन बरगश महल से निकलकर जर्मन वाणिज्य दूतावास में शरण लेने में सफल रहे। वहां से उन्हें बाद में जर्मन पूर्वी अफ्रीका ले जाया गया। इस तरह ब्रिटिश सेना उन्हें तत्काल गिरफ्तार नहीं कर सकी।

ब्रिटेन ने इसके बाद अपना पसंदीदा उम्मीदवार हमूद बिन मोहम्मद (Hamoud bin Mohammed) को जांजीबार का सुल्तान बनाया। उनकी सत्ता ब्रिटिश प्रभाव के अधीन रही और जांजीबार में ब्रिटेन की पकड़ पहले से अधिक मजबूत हो गई।

खालिद का निर्वासन लंबे समय तक चला। 1916 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पूर्वी अफ्रीका में ब्रिटिश सैन्य अभियान के दौरान वह ब्रिटिश नियंत्रण में आए। बाद में उन्हें सेशेल्स और सेंट हेलेना में निर्वासित किया गया। अंततः वह पूर्वी अफ्रीका लौटे और 1927 में उनकी मृत्यु हुई।

युद्ध के बाद जांजीबार में क्या बदला?

युद्ध खत्म होते ही ब्रिटिश प्रभाव निर्णायक हो गया। नया सुल्तान ब्रिटेन के अनुकूल था और जांजीबार की राजनीतिक व्यवस्था में ब्रिटिश हस्तक्षेप और बढ़ गया। इसलिए इस युद्ध को सिर्फ दो पक्षों के बीच हुई एक छोटी सैन्य झड़प मानना अधूरा होगा।

यह संघर्ष उस दौर के औपनिवेशिक विस्तार की बड़ी तस्वीर का हिस्सा था। ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी सैन्य ताकत के जरिए यह स्पष्ट कर दिया था कि जांजीबार में उसकी इच्छा को चुनौती देना आसान नहीं था। इस युद्ध ने पूर्वी अफ्रीका में यूरोपीय सैन्य और राजनीतिक प्रभुत्व का प्रदर्शन किया और जांजीबार पर ब्रिटिश नियंत्रण को लंबे समय तक मजबूत किया।

उस समय की ब्रिटिश प्रेस में युद्ध को अक्सर ब्रिटिश ‘सभ्यता’ और स्थानीय समाज की कथित ‘पिछड़ेपन’ के विरोधाभास के रूप में पेश किया गया। आधुनिक इतिहास लेखन इस औपनिवेशिक भाषा को आलोचनात्मक नजर से देखता है और बताता है कि साम्राज्यवादी सत्ता किस तरह सैन्य हिंसा को वैध ठहराने के लिए ‘सभ्यता’ की अवधारणा का इस्तेमाल करती थी।

गुलामी और औपनिवेशिक राजनीति से जुड़ा जांजीबार का इतिहास

जांजीबार उस समय दास व्यापार और हिंद महासागर के व्यापारिक नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था। ब्रिटेन लंबे समय से पूर्वी अफ्रीका में दास व्यापार पर रोक लगाने के लिए दबाव डाल रहा था। ब्रिटिश Online Archives में संरक्षित 1896 की समकालीन सामग्री दिखाती है कि ब्रिटिश प्रेस ने जांजीबार की राजनीति और दास व्यापार के सवाल को ब्रिटिश हस्तक्षेप के औचित्य से जोड़ा था।

हालांकि युद्ध का तत्काल कारण दास व्यापार नहीं, बल्कि सुल्तान के उत्तराधिकार और ब्रिटिश अनुमति के बिना खालिद का सत्ता संभालना था।

जांजीबार पर ब्रिटिश नियंत्रण कब तक रहा?

एंग्लो-जांजीबार युद्ध के बाद ब्रिटेन का प्रभाव दशकों तक कायम रहा। जांजीबार ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र बना रहा और यह स्थिति 10 दिसंबर 1963 तक चली। यानी 27 अगस्त 1896 की केवल 38 मिनट की लड़ाई का राजनीतिक प्रभाव कुछ मिनटों तक सीमित नहीं रहा। इसके बाद बनी सत्ता-व्यवस्था ने जांजीबार के इतिहास को कई दशकों तक प्रभावित किया।

घटना के 130 साल बाद इस युद्ध को याद करने की सबसे बड़ी वजह इसकी असाधारण कम अवधि है। दुनिया के कई युद्ध वर्षों तक चले, लेकिन यह संघर्ष एक सुबह शुरू हुआ और उसी सुबह खत्म हो गया।

फिर भी इसकी कहानी सिर्फ ’38 मिनट की जंग’ तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ब्रिटेन और जर्मनी की पूर्वी अफ्रीका में प्रतिस्पर्धा, जांजीबार का रणनीतिक महत्व, औपनिवेशिक प्रभाव, सुल्तान के उत्तराधिकार का विवाद, ब्रिटिश सैन्य शक्ति और स्थानीय सत्ता की सीमाएं जैसी कई परतें मौजूद थीं।

करीब 38 मिनट की इस लड़ाई ने यह दिखा दिया कि युद्ध की लंबाई हमेशा उसके ऐतिहासिक महत्व को तय नहीं करती। कभी-कभी कुछ ही मिनटों की गोलाबारी आने वाले कई दशकों की राजनीति की दिशा बदल देती है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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