महज 18 साल की अनाहत सिंह ने भारतीय स्क्वैश को नया इतिहास दिया। World Junior Championship जीतने वाली पहली भारतीय बनकर उन्होंने मिस्र के लंबे वर्चस्व को भी खत्म कर दिया।
ओंटारियो/ कनाडा: भारतीय खेल इतिहास में 25 जुलाई का दिन एक नई उपलब्धि के रूप में दर्ज हो गया। भारत की युवा स्क्वैश खिलाड़ी अनाहत सिंह ने कनाडा में आयोजित 2026 World Squash Junior Championships के महिला एकल वर्ग का खिताब जीतकर इतिहास रच दिया।
फाइनल में उन्होंने मिस्र की रुकय्या सलेम (Ruqayya Salem) को सीधे गेमों में 11-3, 11-7, 11-9 से हराकर विश्व जूनियर चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया। इस जीत के साथ उन्होंने जूनियर महिला स्क्वैश में वर्षों से चले आ रहे मिस्र के वर्चस्व को भी समाप्त कर दिया।
यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय स्क्वैश के इतिहास का सबसे बड़ा क्षण माना जा रहा है। जिस खेल में मिस्र पिछले डेढ़ दशक से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत रहा है, उसी मंच पर भारत की एक किशोर खिलाड़ी का विश्व चैंपियन बनना इस बात का संकेत है कि भारतीय स्क्वैश अब वैश्विक स्तर पर नई पहचान बना रहा है।
2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक में पहली बार स्क्वैश को शामिल किया जाएगा और ऐसे समय में आई यह जीत भारत के लिए उम्मीदों का नया अध्याय खोलती है।
फाइनल में पूरी तरह छाईं अनाहत
कनाडा के नियाग्रा-ऑन-द-लेक (Ontario) में खेले गए फाइनल मुकाबले में शीर्ष वरीय अनाहत सिंह ने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया। पहले गेम में उन्होंने मिस्र की खिलाड़ी को केवल तीन अंक लेने दिए। दूसरे गेम में रुकय्या सलेम ने वापसी की कोशिश की, लेकिन अनाहत ने अपने सटीक ड्रॉप शॉट्स, बेहतरीन कोर्ट कवरेज और संयमित खेल से बढ़त बनाए रखी।
तीसरा गेम मुकाबले का सबसे रोमांचक चरण रहा। मिस्र की खिलाड़ी ने स्कोर बराबर करने का प्रयास किया, लेकिन निर्णायक मौकों पर अनाहत ने लगातार अंक जुटाकर मैच अपने नाम कर लिया।
लगभग हर रैली में उनकी फिटनेस, फुटवर्क और मानसिक मजबूती साफ दिखाई दी। सीधे तीन गेमों में जीत दर्ज करना इस बात का प्रमाण था कि वह पूरे टूर्नामेंट की सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी थीं।
पूरे टूर्नामेंट में दिखा चैंपियन जैसा आत्मविश्वास
विश्व जूनियर चैंपियनशिप में अनाहत पूरे समय शानदार लय में रहीं। शीर्ष वरीय खिलाड़ी होने के कारण उन पर खिताब जीतने का दबाव था, लेकिन उन्होंने हर दौर में खुद को साबित किया।
सेमीफाइनल में उन्होंने मिस्र की बार्ब सामेह (Barb Sameh) को 11-3, 8-11, 11-4, 11-6 से हराकर फाइनल में जगह बनाई।
पिछले वर्ष इसी प्रतियोगिता में उन्हें सेमीफाइनल में हारकर कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था। इस बार उन्होंने उस निराशा को प्रेरणा में बदल दिया और पूरे टूर्नामेंट में कहीं भी दबाव में नजर नहीं आईं। यही निरंतरता उन्हें विश्व चैंपियन बनाने में सबसे बड़ा कारण बनी।
तोड़ा मिस्र का दबदबा
स्क्वैश की दुनिया में मिस्र का नाम लगभग एक महाशक्ति की तरह लिया जाता है। पिछले कई वर्षों से विश्व रैंकिंग, जूनियर प्रतियोगिताओं और प्रोफेशनल सर्किट पर मिस्र के खिलाड़ियों का दबदबा रहा है। महिलाओं के जूनियर वर्ग में भी लगातार मिस्र की खिलाड़ियों ने विश्व खिताब अपने नाम किए थे।
ऐसे में अनाहत सिंह की यह जीत केवल भारत का पहला विश्व जूनियर खिताब नहीं, बल्कि स्क्वैश की सबसे बड़ी ताकत को चुनौती देने का भी प्रतीक है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाएगी और भारत को स्क्वैश की नई वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे ले जाएगी।
कौन हैं अनाहत सिंह?
अनाहत सिंह का जन्म 13 मार्च 2008 को दिल्ली में हुआ। बचपन में उनकी रुचि कई खेलों में थी और उन्होंने कुछ समय तक बैडमिंटन भी खेला, लेकिन बाद में स्क्वैश को अपना करियर चुना।
बहुत कम उम्र से ही उनकी प्रतिभा साफ दिखाई देने लगी थी। जिस उम्र में अधिकांश खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, उस उम्र में अनाहत अंतरराष्ट्रीय जूनियर प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीत रही थीं।
उन्होंने दिल्ली के Delhi Public School (R.K. Puram) में पढ़ाई के साथ-साथ पेशेवर प्रशिक्षण भी जारी रखा। परिवार का पूरा सहयोग और नियमित अभ्यास उनकी सफलता की बड़ी वजह बना। उनके पिता और कोचिंग स्टाफ ने शुरू से ही उनकी तकनीक, फिटनेस और मानसिक मजबूती पर विशेष ध्यान दिया, जिसका परिणाम आज पूरी दुनिया देख रही है।
महज 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने 2022 बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उस टूर्नामेंट की सबसे युवा भारतीय खिलाड़ियों में शामिल रहीं। इसके बाद उन्होंने एशियाई जूनियर प्रतियोगिताओं, ब्रिटिश जूनियर ओपन और PSA टूर में लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए खुद को दुनिया की सबसे होनहार जूनियर खिलाड़ियों में स्थापित कर लिया।
रिकॉर्ड्स से भरा रहा अनाहत का शुरुआती करियर
विश्व जूनियर चैंपियन बनने से पहले ही अनाहत कई बड़ी उपलब्धियां अपने नाम कर चुकी थीं। उन्होंने विभिन्न आयु वर्गों में British Junior Open के कई खिताब जीते, जिसे जूनियर स्क्वैश का सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट माना जाता है।
इसके अलावा उन्होंने Asian Junior Championships में भी स्वर्ण पदक जीतकर अपनी क्षमता साबित की। PSA (Professional Squash Association) के प्रोफेशनल सर्किट में भी उन्होंने लगातार रैंकिंग अंक हासिल किए और कई अनुभवी खिलाड़ियों को हराया। यही कारण था कि विश्व जूनियर चैंपियनशिप में उन्हें Top Seed के रूप में उतारा गया था।
भारत के लिए क्यों ऐतिहासिक है यह खिताब?
भारत में स्क्वैश का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है, लेकिन विश्व जूनियर व्यक्तिगत चैंपियनशिप का खिताब कभी किसी भारतीय खिलाड़ी ने नहीं जीता था।
भारतीय स्क्वैश को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में जोशना चिनप्पा, दीपिका पल्लिकल, सौरव घोषाल, हरिंदर पाल संधू, अभय सिंह और वेलावन सेंथिलकुमार जैसे खिलाड़ियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
2005 में जोशना चिनप्पा विश्व जूनियर चैंपियनशिप के फाइनल तक पहुंची थीं, लेकिन खिताब जीतने से चूक गईं। उसके बाद भी कई भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन विश्व जूनियर चैंपियन बनने का सपना अधूरा ही रहा।
अनाहत सिंह ने लगभग दो दशकों का इंतजार खत्म करते हुए भारत को पहली बार यह प्रतिष्ठित खिताब दिलाया। यही वजह है कि उनकी इस जीत की तुलना भारतीय बैडमिंटन में साइना नेहवाल या पी.वी. सिंधु की शुरुआती ऐतिहासिक उपलब्धियों से की जा रही है। यह जीत केवल एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि भारतीय स्क्वैश प्रणाली की सफलता भी मानी जा रही है।
मिस्र को हराना क्यों माना जाता है सबसे कठिन चुनौती?
यदि क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया, हॉकी में नीदरलैंड्स या टेबल टेनिस में चीन का दबदबा माना जाता है, तो स्क्वैश में वही स्थान मिस्र का है।
पिछले डेढ़ दशक में विश्व स्क्वैश की अधिकांश बड़ी प्रतियोगिताओं पर मिस्र के खिलाड़ियों का कब्जा रहा है। पुरुष और महिला दोनों वर्गों में विश्व नंबर-1 खिलाड़ियों की लंबी सूची मिस्र से आती रही है। जूनियर स्तर पर भी उनकी अकादमी प्रणाली दुनिया की सबसे मजबूत मानी जाती है।
ऐसे माहौल में किसी भारतीय खिलाड़ी का फाइनल में मिस्र की शीर्ष खिलाड़ी को सीधे गेमों में हराना साधारण उपलब्धि नहीं है। यह दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ी अब तकनीकी, शारीरिक और मानसिक तीनों स्तरों पर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं के बराबर पहुंच रहे हैं।
स्क्वैश में भारत का भविष्य
अनाहत सिंह की जीत ऐसे समय आई है, जब भारत में स्क्वैश तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में नए स्क्वैश सेंटर, निजी अकादमियां और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं बढ़ी हैं। इससे युवा खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा का अवसर मिल रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह निवेश और प्रशिक्षण जारी रहा, तो अगले 8–10 वर्षों में भारत विश्व स्क्वैश की प्रमुख ताकतों में शामिल हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब भारत के पास केवल एक स्टार खिलाड़ी नहीं, बल्कि जूनियर स्तर पर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पूरी नई पीढ़ी तैयार हो रही है।
2028 ओलंपिक से पहले बढ़ी उम्मीद
स्क्वैश पहली बार 2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक का हिस्सा बनने जा रहा है। वर्षों तक ओलंपिक में जगह पाने का इंतजार करने वाले इस खेल के लिए यह एक नया अध्याय है। ऐसे में भारत के लिए भी यह जीत केवल एक जूनियर विश्व खिताब नहीं, बल्कि भविष्य के ओलंपिक अभियान की मजबूत नींव मानी जा रही है।
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि अनाहत की उम्र उनके पक्ष में है। अभी उनके पास सीनियर स्तर पर अनुभव हासिल करने, PSA World Tour में रैंकिंग सुधारने और दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों के खिलाफ नियमित मुकाबले खेलने के लिए पर्याप्त समय है।
यदि वह इसी तरह निरंतर प्रदर्शन करती रहीं, तो लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारत की सबसे मजबूत पदक उम्मीदों में उनका नाम शामिल हो सकता है।
भारत सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) और भारतीय स्क्वैश महासंघ की योजनाएं भी युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर अवसर उपलब्ध करा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अनाहत जैसी प्रतिभाओं को यदि लगातार विश्वस्तरीय कोचिंग, खेल विज्ञान (Sports Science) और विदेशी प्रतियोगिताओं का अनुभव मिलता रहा, तो वे आने वाले वर्षों में सीनियर विश्व चैंपियनशिप में भी भारत के लिए पदक जीत सकती हैं।
सिर्फ एक जीत नहीं, मानसिक बाधा भी टूटी
विश्व खेलों में अक्सर सबसे कठिन चुनौती तकनीक या फिटनेस नहीं, बल्कि मानसिक दबाव को पार करना होता है। कई वर्षों तक भारतीय खिलाड़ी विश्व जूनियर स्क्वैश में अच्छे प्रदर्शन तो करते रहे, लेकिन खिताब जीतने से एक कदम दूर रह जाते थे।
अनाहत सिंह ने इस मानसिक बाधा को भी तोड़ दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि भारतीय खिलाड़ी अब केवल फाइनल तक पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि विश्व चैंपियन बनने के लिए खेल रहे हैं।
फाइनल में मिस्र जैसी मजबूत प्रतिद्वंद्वी को सीधे गेमों में हराना उनके आत्मविश्वास, रणनीति और मानसिक मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण माना जा रहा है।
यही कारण है कि कई पूर्व खिलाड़ियों ने इसे भारतीय स्क्वैश के लिए “गेम-चेंजर मोमेंट” बताया है। इस तरह की जीत केवल रिकॉर्ड नहीं बनातीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का नजरिया भी बदल देती हैं।
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