जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के बीच सुप्रीम कोर्ट के लॉन में वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़कर न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को याद किया। जानिए पूरा मामला।
नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी छात्र विरोध प्रदर्शन के बीच गुरुवार, 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़कर लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। यह कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट परिसर के लॉन में आयोजित किया गया, जहां अधिवक्ताओं ने एकत्र होकर संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब दिल्ली में Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़े छात्र प्रदर्शन को लेकर तनाव बना हुआ है। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़पों तथा पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के वकीलों द्वारा संविधान की प्रस्तावना का पाठ करना इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक प्रतीकात्मक और संवैधानिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के लॉन में हुआ प्रस्तावना का पाठ
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के कुछ अधिवक्ता अदालत परिसर के लॉन में एकत्र हुए। उन्होंने संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया।
कार्यक्रम में शामिल वकीलों ने संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को याद किया। प्रस्तावना का पाठ ऐसे समय में किया गया, जब देश की राजधानी में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर बहस चल रही है।
कार्यक्रम में शामिल अधिवक्ताओं का संदेश यह था कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार है तथा संविधान इन मूल्यों की रक्षा का आधार है।
जंतर-मंतर पर हो रहा है छात्र प्रदर्शन
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र विरोध प्रदर्शन है। प्रदर्शनकारी छात्र Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़े मुद्दों और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
छात्रों के विरोध का एक प्रमुख मुद्दा NEET-UG परीक्षा से जुड़ा विवाद है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि परीक्षा और भर्ती व्यवस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी रही है।
छात्रों का कहना है कि देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य कथित अनियमितताओं से लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होता है। उनके मुताबिक, परीक्षा प्रणाली में किसी भी तरह की गड़बड़ी का सीधा असर उन छात्रों पर पड़ता है, जो वर्षों तक तैयारी करने के बाद परीक्षा में शामिल होते हैं।
यही वजह है कि प्रदर्शनकारी परीक्षा व्यवस्था में सुधार, कथित अनियमितताओं की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
CJP प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई पर विवाद
जंतर-मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन को लेकर पुलिस की कार्रवाई भी विवाद का विषय बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग किया और छात्रों के साथ सख्ती की। दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और निर्धारित नियमों के तहत कार्रवाई किए जाने की बात कही जाती रही है।
पुलिस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी बहस तेज हुई है। कई लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की कार्रवाई के बीच संतुलन का सवाल उठाया है।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के वकीलों द्वारा संविधान की प्रस्तावना पढ़ना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रस्तावना में क्या है?
भारत के संविधान की प्रस्तावना देश के संवैधानिक दर्शन की मूल भावना को सामने रखती है।
इसमें भारत को ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बताया गया है। इसके साथ नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
प्रस्तावना में न्याय को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप में परिभाषित किया गया है। स्वतंत्रता में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता का उल्लेख है। समानता में अवसर और प्रतिष्ठा की समानता की बात कही गई है।
बंधुत्व के माध्यम से व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को सुनिश्चित करने का संकल्प व्यक्त किया गया है। इसी वजह से संविधान की प्रस्तावना को अक्सर भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना का संक्षिप्त परिचय माना जाता है।
कब अपनाई गई संविधान की प्रस्तावना?
भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान के साथ ही 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाई गई थी। इसी दिन संविधान को स्वीकार, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया था। बाद में संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना।
प्रस्तावना में वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। इस संशोधन के माध्यम से ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े गए।
इस प्रकार आज संविधान की प्रस्तावना भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे की आधारभूत अवधारणाओं को व्यक्त करती है।
सुप्रीम कोर्ट और संवैधानिक अधिकार
भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक माना जाता है। अदालत नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के वकीलों द्वारा संविधान की प्रस्तावना का सार्वजनिक पाठ किए जाने को प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, प्रस्तावना स्वयं नागरिकों को सीधे कोई अलग से मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करती, लेकिन यह संविधान की व्याख्या और उसके मूल उद्देश्यों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में संविधान की प्रस्तावना के महत्व पर चर्चा की है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में 1973 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के Basic Structure Doctrine को मान्यता दी। इस सिद्धांत के अनुसार संविधान की मूल संरचना को संसद के संशोधन अधिकार के जरिए नष्ट नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र, कानून का शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे सिद्धांत इसी व्यापक संवैधानिक ढांचे का हिस्सा माने जाते हैं।
क्या वकीलों का कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल का समर्थन है?
वकीलों द्वारा प्रस्तावना पढ़ने का कार्यक्रम एक संवैधानिक और नागरिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया। हालांकि यह कार्यक्रम जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र विरोध की पृष्ठभूमि में हुआ, लेकिन इसे किसी राजनीतिक दल या संगठन के आधिकारिक समर्थन के रूप में पेश नहीं किया गया है।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी मुद्दे पर संवैधानिक मूल्यों की बात करना और किसी राजनीतिक संगठन का समर्थन करना दो अलग-अलग बातें हैं।
वकीलों ने प्रस्तावना के जरिए लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों पर जोर दिया। इस कार्यक्रम का राजनीतिक अर्थ निकाला जा सकता है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में इसे किसी राजनीतिक दल की आधिकारिक गतिविधि नहीं बताया गया है।
शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक महत्व
भारतीय लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं और कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक सीमाओं के अधीन हैं।
यही वजह है कि किसी भी प्रदर्शन में दो पक्षों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रदर्शनकारियों को अपनी मांग रखने का अधिकार है, जबकि प्रशासन की जिम्मेदारी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की होती है।
विवाद तब पैदा होता है, जब प्रदर्शनकारी पुलिस कार्रवाई को अपने अधिकारों का उल्लंघन बताते हैं और प्रशासन कानून-व्यवस्था का हवाला देता है।
जंतर-मंतर पर जारी विरोध के बीच संविधान की प्रस्तावना का पाठ इसी व्यापक बहस को फिर से सामने लाता है कि लोकतंत्र में असहमति को किस तरह संभाला जाना चाहिए।
छात्रों के आंदोलन के बीच इस घटनाक्रम का महत्तव?
युवा और छात्र किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के महत्वपूर्ण वाहक रहे हैं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक समय तक छात्रों ने विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई है।
आज के दौर में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों का प्रभाव भी बहुत व्यापक है। NEET जैसी परीक्षाओं में लाखों छात्र शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया पर उठने वाला कोई भी सवाल सीधे युवाओं के भविष्य और व्यवस्था में उनके भरोसे से जुड़ जाता है।
अगर छात्रों को लगता है कि परीक्षा व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है या उनकी मेहनत का उचित मूल्यांकन नहीं हो रहा, तो यह असंतोष व्यापक आंदोलन का रूप ले सकता है।
इसी संदर्भ में वकीलों द्वारा संविधान की प्रस्तावना पढ़ना छात्रों के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाने वाली प्रतीकात्मक घटना के रूप में देखा जा सकता है।
जंतर-मंतर का आंदोलन आगे किस दिशा में जाता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन इस बीच संविधान की प्रस्तावना का पाठ एक बार फिर उस मूल सवाल को सामने लाता है कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को किस तरह सुना जाए और नागरिक अधिकारों तथा कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
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