KLS के दौरान मरीज कई घंटे सोने के बाद भी सामान्य महसूस नहीं करता। जागने पर भ्रम, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, असामान्य व्यवहार और कुछ मामलों में मतिभ्रम जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
नई दिल्ली: आमतौर पर नींद शरीर और दिमाग को आराम देने का जरिया मानी जाती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति लगातार कई घंटों तक सोता रहे, जागने पर भी भ्रमित या सुस्त रहे और कुछ समय बाद फिर ऐसी ही स्थिति दोबारा लौट आए, तो यह सिर्फ ज्यादा सोने की आदत नहीं हो सकती।
Kleine-Levin Syndrome (KLS) एक ऐसी ही बेहद दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल और स्लीप डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति को समय-समय पर अत्यधिक नींद के लंबे एपिसोड आते हैं। इन दौरान नींद के साथ व्यवहार, सोचने-समझने और खाने की आदतों में भी बदलाव हो सकता है।
इसी वजह से KLS को आम बोलचाल में ‘Sleeping Beauty Syndrome’ भी कहा जाता है। हालांकि यह किसी परी-कथा जैसी लंबी नींद नहीं, बल्कि एक वास्तविक और जटिल चिकित्सकीय स्थिति है। कई मरीज एपिसोड के दौरान दिन में 16 से 20 घंटे तक सो सकते हैं। कुछ मामलों में यह स्थिति कई दिनों या हफ्तों तक बनी रह सकती है।
क्या है Kleine-Levin Syndrome?
Kleine-Levin Syndrome को रीकरेंट हाइपरसोमनिया यानी बार-बार होने वाली अत्यधिक नींद की स्थिति के रूप में समझा जाता है। इसमें व्यक्ति को अचानक ऐसे एपिसोड आते हैं, जिनमें वह सामान्य से बहुत अधिक सोता है और जागने के दौरान भी उसकी मानसिक और शारीरिक सक्रियता काफी कम हो सकती है।
वैज्ञानिक साहित्य के मुताबिक KLS मुख्य रूप से किशोरों में दिखाई देता है और पुरुषों में इसके मामले अधिक पाए गए हैं। हालांकि महिलाएं भी इससे प्रभावित हो सकती हैं। यह बीमारी इतनी दुर्लभ है कि इसकी अनुमानित दर करीब 10 लाख लोगों में 1 से 2 मामले बताई जाती है।
इस बीमारी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके लक्षण लगातार मौजूद नहीं रहते। मरीज एक एपिसोड के दौरान काफी प्रभावित हो सकता है, लेकिन एपिसोड समाप्त होने के बाद वह कई हफ्तों या महीनों तक सामान्य रह सकता है। यही कारण है कि KLS को पहचानना कई बार मुश्किल होता है।
कितनी देर तक सोता है मरीज?
KLS के एपिसोड में मरीज दिन में 16 से 20 घंटे तक सो सकता है। हालांकि हर मरीज में अवधि और गंभीरता एक जैसी नहीं होती। कुछ एपिसोड कुछ दिनों तक रहते हैं, जबकि दूसरे कई हफ्तों तक जारी रह सकते हैं। Cleveland Clinic के मुताबिक एपिसोड की औसत अवधि करीब 10 दिन बताई गई है, हालांकि कुछ मामलों में यह कई हफ्तों तक चल सकती है।
पुराने चिकित्सकीय अध्ययनों में भी बताया गया है कि एपिसोड कुछ दिनों से लेकर एक-दो महीने तक चल सकते हैं और इनके बीच मरीज पूरी तरह सामान्य दिखाई दे सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज लगातार बिना किसी क्षण जागे सोता रहता है। कई बार वह खाने, पानी पीने या बाथरूम जाने के लिए थोड़ी देर के लिए जाग सकता है, लेकिन उस समय उसकी चेतना और व्यवहार सामान्य नहीं होते।
क्या हैं इसके लक्षण?
KLS को सिर्फ ‘बहुत ज्यादा सोने की बीमारी’ मानना सही नहीं होगा। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
इनमें प्रमुख हैं:
- अत्यधिक नींद और जागे रहने में परेशानी
- भ्रम और दिशाबोध में कमी
- ध्यान और सोचने की क्षमता में बदलाव
- चिड़चिड़ापन या असामान्य व्यवहार
- उदासीनता और भावनात्मक प्रतिक्रिया में कमी
- वास्तविकता से अलग महसूस करना
- कुछ मरीजों में मतिभ्रम
- जरूरत से ज्यादा खाना या अचानक बहुत अधिक भूख लगना
- कुछ मामलों में यौन व्यवहार में असामान्य वृद्धि
एपिसोड के दौरान मरीज कैसा महसूस करता है?
KLS का अनुभव सिर्फ नींद तक सीमित नहीं होता। मरीज जागने के बाद भी बेहद सुस्त, भ्रमित और उदासीन दिखाई दे सकता है। उसे बातचीत करने, निर्णय लेने या सामान्य गतिविधियां करने में परेशानी हो सकती है।
कुछ मरीजों को बाद में एपिसोड के दौरान हुई घटनाएं याद भी नहीं रहतीं। यही कारण है कि परिवार के सदस्यों को मरीज की देखभाल करनी पड़ सकती है।
पुराने अध्ययनों के अनुसार मरीज एपिसोड के दौरान कभी-कभी बच्चे जैसी हरकतें, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, भ्रम या वास्तविकता से अलग महसूस करने जैसी समस्याएं भी दिखा सकते हैं।
निकोल डेलियन का मामला क्यों हुआ चर्चित?
Kleine-Levin Syndrome के सबसे चर्चित मामलों में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया की निकोल डेलियन का मामला है। 2012 में जब वह 17 साल की थीं, तब उनके मामले ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा।
रिपोर्टों के मुताबिक निकोल दिन में लगभग 18 से 19 घंटे तक सोती थीं। जागने पर वह खाने या दूसरी जरूरतों के लिए थोड़ी देर उठती थीं, लेकिन उनकी मां के अनुसार उस दौरान वह नींद में चलने जैसी अवस्था में रहती थीं और बाद में उन्हें उन घटनाओं की याद नहीं रहती थी।
उनका सबसे लंबा दर्ज किया गया एपिसोड 64 दिनों का था। इस दौरान वह बेहद लंबी अवधि तक इसी बीमारी से जुड़ी नींद की स्थिति में रहीं। इस वजह से वह परिवार के साथ थैंक्स-गिविंग और क्रिसमस जैसे महत्वपूर्ण मौकों में भी शामिल नहीं हो सकीं।
उनकी मां विकी डेलियन ने मीडिया को बताया था कि निकोल के एपिसोड के दौरान उन्हें रोजमर्रा के कई कामों के लिए मदद की जरूरत होती थी। बीमारी ने उनकी पढ़ाई, पारिवारिक कार्यक्रमों और सामान्य किशोर जीवन को प्रभावित किया।
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निकोल को बीमारी का पता कैसे चला?
निकोल के परिवार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल सिर्फ बीमारी के एपिसोड नहीं थे, बल्कि सही निदान तक पहुंचना भी था।
रिपोर्टों के मुताबिक परिवार ने कई अस्पतालों से संपर्क किया। आखिरकार पिट्सबर्ग के Allegheny General Hospital के एक डॉक्टर ने उनके लक्षणों को Kleine-Levin Syndrome से जोड़कर पहचान की।
उस समय निकोल की कहानी सामने आने का एक बड़ा उद्देश्य इस दुर्लभ बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाना था, ताकि दूसरे परिवार ऐसे लक्षणों को केवल आलस्य, व्यवहार संबंधी समस्या या सामान्य किशोरावस्था का हिस्सा न समझें।
क्या इसका इलाज संभव है?
फिलहाल Kleine-Levin Syndrome का कोई सर्वमान्य और निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है। दुर्लभ बीमारी होने के कारण इस पर बड़े स्तर के क्लिनिकल ट्रायल भी बहुत सीमित हैं। एक कोक्रेन समीक्षा में KLS के लिए दवाओं की प्रभावशीलता को साबित करने वाले पर्याप्त उच्च-गुणवत्ता वाले रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल नहीं मिले।
इलाज आमतौर पर मरीज के लक्षणों और जरूरत के अनुसार किया जाता है। कुछ मामलों में नींद कम करने के लिए जागरूकता बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया गया है।
कुछ शोधों और क्लिनिकल अनुभवों में लिथियम का इस्तेमाल एपिसोड की आवृत्ति कम करने के लिए किया गया है, जबकि कुछ गंभीर या लंबे एपिसोड में अन्य दवाओं पर विचार किया जाता है। लेकिन किसी दवा को सभी मरीजों के लिए निश्चित रूप से प्रभावी नहीं माना गया है।
एपिसोड के दौरान परिवार की भूमिका
KLS के दौरान मरीज की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। अत्यधिक नींद और भ्रम के कारण मरीज सामान्य गतिविधियां सुरक्षित तरीके से नहीं कर पाता। ऐसे समय में उसे अकेले ड्राइविंग, मशीन चलाने या बिना निगरानी बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
स्कूल या काम से अस्थायी छुट्टी या समय में बदलाव भी जरूरी हो सकता है। परिवार को मरीज को पर्याप्त आराम, सुरक्षित वातावरण और नियमित निगरानी रखनी पड़ सकती है।
क्या बीमारी हमेशा रहती है?
KLS का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आम तौर पर एपिसोडिक बीमारी है। यानी मरीज हमेशा बीमार नहीं रहता। एपिसोड खत्म होने के बाद वह सामान्य नींद और व्यवहार में लौट सकता है।
हालांकि बीमारी का पूरा सफर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार इसके एपिसोड समय के साथ कम और हल्के हो सकते हैं और बीमारी का औसत कोर्स करीब 14 साल बताया गया है।
वहीं हालिया शोध ने इस धारणा पर भी सवाल उठाए हैं कि एपिसोड के बीच मरीजों पर बीमारी का कोई प्रभाव नहीं रहता। कुछ अध्ययनों में एपिसोड के बीच हल्के संज्ञानात्मक बदलाव और मस्तिष्क में रक्त प्रवाह से जुड़े अंतर देखे गए हैं। हालांकि इस क्षेत्र में अभी और शोध की जरूरत है।
क्यों जरूरी है जागरूकता?
Kleine-Levin Syndrome बेहद दुर्लभ है, इसलिए कई डॉक्टरों और परिवारों के लिए भी इसे पहचानना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही कारण है कि बार-बार आने वाले अत्यधिक नींद के एपिसोड को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर किसी किशोर या युवा को बार-बार कई दिनों तक असामान्य रूप से ज्यादा नींद आती है और उसके साथ भ्रम, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक भूख या दूसरी असामान्य गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो विशेषज्ञ से चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
हर ज्यादा सोने वाला व्यक्ति KLS से पीड़ित हो, यह जरूरी नहीं है। स्लीप एपनिया, नार्कोलेप्सी, डिप्रेशन, दवाओं का प्रभाव, हार्मोनल समस्याएं और कई अन्य स्थितियां भी अत्यधिक नींद का कारण बन सकती हैं। इसलिए सही निदान के लिए विशेषज्ञ की जांच जरूरी है।
Kleine-Levin Syndrome आज भी चिकित्सा विज्ञान के लिए एक रहस्य बना हुआ है। बीमारी के कारण, इसके अचानक शुरू होने और अपने आप कम होने की प्रक्रिया को पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। लेकिन निकोल डेलियन जैसे मामलों और लगातार हो रही रिसर्च ने इस दुर्लभ बीमारी को पहचानने और इसके मरीजों की मुश्किलों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिलहाल सबसे जरूरी चीज है सही पहचान, सुरक्षित देखभाल और मरीज व उसके परिवार के प्रति संवेदनशील रवैया।


