राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 101वें स्थापना दिवस पर जानिए नागपुर में हुए विजयादशमी उत्सव की प्रमुख बातें और संघ की विचारधारा, महात्मा गांधी की हत्या, बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा सांप्रदायिक राजनीति से जुड़े सात विवादों का इतिहास।
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) मंगलवार, 20 अक्टूबर को अपना 101वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस अवसर पर महाराष्ट्र के नागपुर स्थित रेशिमबाग मैदान में संघ का पारंपरिक विजयादशमी उत्सव आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया, जबकि स्वयंसेवकों ने निर्धारित मार्ग पर पथ संचलन किया। इस वर्ष का आयोजन संघ के शताब्दी वर्ष के समापन और उसके 101वें वर्ष में प्रवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और मुंबई में इजराइल के महावाणिज्य दूत यानिव रेवाच को भी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया था। उत्सव में पारंपरिक शस्त्र पूजन, स्वयंसेवकों का मार्च और सरसंघचालक का संबोधन प्रमुख कार्यक्रम रहे।
मोहन भागवत का संबोधन
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भारत की विविधता को स्वीकार करने और उसकी रक्षा करने पर जोर दिया। उन्होंने धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र, खानपान और परंपराओं में अंतर के बावजूद सामाजिक एकता बनाए रखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने यह भी कहा कि देश की एकता के लिए लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होना चाहिए। दूसरी ओर, उन्होंने भारत के सामने मौजूद चुनौतियों और देश की वैश्विक भूमिका पर भी विचार रखे।
हालांकि, संघ की स्थापना के साथ जुड़ी इस ऐतिहासिक यात्रा का एक दूसरा पक्ष भी है। RSS की विचारधारा, अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर उसका नजरिया, आजादी की लड़ाई में उसकी भूमिका, गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर लगा प्रतिबंध और बाबरी मस्जिद का विध्वंस जैसे विषय लंबे समय से चर्चा और विवाद का केंद्र रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि इन घटनाओं को संघ की बहुसंख्यक-केंद्रित राजनीति और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों के व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है।
यहां उन सात प्रमुख मुद्दों को समझना जरूरी है, जिनके आधार पर RSS की विचारधारा और उसकी भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।
1. शारीरिक प्रशिक्षण और अनुशासन पर जोर
RSS की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। संगठन की कार्यप्रणाली में नियमित शाखाओं, शारीरिक अभ्यास, सामूहिक गतिविधियों, गणवेश और अनुशासित दिनचर्या को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। शाखाओं में लाठी का अभ्यास, मार्च और शारीरिक प्रशिक्षण भी संघ की पहचान का हिस्सा बने।
संघ इन गतिविधियों को स्वयंसेवकों में अनुशासन, आत्मविश्वास, संगठन क्षमता और सेवा भावना विकसित करने का माध्यम बताता है। उसके अनुसार, शारीरिक प्रशिक्षण का उद्देश्य समाज को संगठित करना और व्यक्तियों में जिम्मेदारी की भावना पैदा करना है।
हालांकि, आलोचक सवाल उठाते हैं कि किसी सांस्कृतिक संगठन में सैन्य शैली से मिलती-जुलती वेशभूषा, सामूहिक मार्च और शारीरिक अनुशासन को इतनी प्रमुखता देने के पीछे क्या उद्देश्य था। उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था एक मजबूत वैचारिक कैडर तैयार करती है, जो संगठन के विचारों के प्रति अनुशासित और प्रतिबद्ध रहता है।
2. गोलवलकर की विवादित पुस्तक
RSS की विचारधारा पर सबसे अधिक चर्चा उसके दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर की पुस्तक We, or Our Nationhood Defined को लेकर होती है। 1939 में प्रकाशित इस पुस्तक में राष्ट्र की अवधारणा को साझा भूभाग के साथ-साथ संस्कृति, धर्म, भाषा और सामूहिक पहचान से जोड़ा गया।

पुस्तक के विवादित हिस्सों में गोलवलकर ने जर्मनी में यहूदियों के प्रति अपनाई गई नाजी नीति का उल्लेख करते हुए नस्ली एकरूपता के विचार की प्रशंसा की थी। उन्होंने भारत में रहने वाले उन समुदायों के संबंध में भी ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान हिंदू बहुसंख्यक से अलग थी। उनके विचार में ऐसे समुदायों को हिंदू संस्कृति और राष्ट्र की अवधारणा के अनुरूप स्वयं को ढालना चाहिए, अन्यथा उन्हें राष्ट्र के जीवन में समान स्थान और अधिकारों का दावा नहीं करना चाहिए।
इन विचारों की आलोचना इसलिए होती है, क्योंकि भारत का संविधान नागरिकता और समान अधिकारों को धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं करता। आलोचकों के अनुसार, गोलवलकर की इस अवधारणा में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्वतंत्र पहचान और समान नागरिकता के सिद्धांत के बीच टकराव दिखाई देता है।
3. स्वतंत्रता आंदोलन में RSS की सीमित भागीदारी
RSS की ऐतिहासिक भूमिका पर तीसरा बड़ा सवाल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चले स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भागीदारी को लेकर है। 1930 और 1940 के दशकों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे बड़े जनांदोलन हुए। इन आंदोलनों में लाखों भारतीयों ने हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
इस दौरान RSS ने अपनी संगठनात्मक गतिविधियों और शाखाओं के विस्तार पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया। संगठन ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले जनांदोलनों में एक संस्था के रूप में व्यापक भागीदारी नहीं की। विशेष रूप से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में RSS की संस्थागत भूमिका सीमित रही।
संघ के आलोचक इसे स्वतंत्रता संघर्ष से दूरी बनाकर रखने और ब्रिटिश शासन के बजाय हिंदू समाज के संगठन को प्राथमिकता देने के निर्णय के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, इससे उस समय की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ व्यापक संघर्ष के बजाय आंतरिक सामाजिक और वैचारिक लामबंदी में लगा।
दूसरी ओर, संघ के समर्थक संगठन के उद्देश्य को राजनीतिक स्वतंत्रता के आंदोलन से अलग बताते हैं और हिंदू समाज के संगठन तथा सामाजिक चरित्र निर्माण पर उसके जोर का उल्लेख करते हैं।
4. महात्मा गांधी की हत्या और RSS पर प्रतिबंध
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की दिल्ली में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हत्या को नाथूराम गोडसे ने अंजाम दिया था। गोडसे का संबंध हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति से रहा था और वह पहले RSS से जुड़ा था, हालांकि उसके संगठनात्मक संबंधों और हत्या के समय उसकी स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए।

गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने 4 फरवरी 1948 को RSS पर प्रतिबंध लगा दिया। उस समय सरकार ने संगठन की गतिविधियों और सांप्रदायिक तनाव से जुड़ी चिंताओं को प्रतिबंध का आधार बनाया।
तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने गोलवलकर को लिखे एक पत्र में संघ के कुछ लोगों के भाषणों में सांप्रदायिक विष होने की बात कही थी और गांधी की हत्या के लिए बने माहौल को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। पटेल के पत्रों का उल्लेख इस विवाद में बार-बार किया जाता है।
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5. संघ परिवार और संगठनों की भूमिका
स्वतंत्रता के बाद RSS ने अपने वैचारिक प्रभाव को विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए उससे जुड़े कई संगठनों के विकास में भूमिका निभाई। इस व्यापक नेटवर्क को ‘संघ परिवार’ कहा जाता है। इसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP), विश्व हिंदू परिषद (VHP), बजरंग दल और भारतीय मजदूर संघ जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय संगठन शामिल हैं।
इन संगठनों की भूमिका और कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं। BJP चुनावी राजनीति में सक्रिय है, VHP धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में और बजरंग दल युवा लामबंदी सहित विभिन्न अभियानों में भाग लेता है। RSS स्वयं को इन संगठनों के लिए वैचारिक प्रेरणा देने वाला संगठन बताता है, जबकि सभी संगठनों के बीच संबंधों की प्रकृति और उनके निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर राजनीतिक बहस होती रही है।
आलोचकों का आरोप है कि यह व्यापक नेटवर्क संघ की विचारधारा को समाज के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने के साथ-साथ आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और सड़क पर लामबंदी की क्षमता भी बढ़ाता है। कुछ मामलों में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं पर सांप्रदायिक हिंसा या अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप लगे हैं।
6. राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद विध्वंस
RSS के इतिहास में राम जन्मभूमि आंदोलन सबसे निर्णायक और विवादास्पद अध्यायों में से एक है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ। RSS, विश्व हिंदू परिषद और BJP सहित संघ परिवार के विभिन्न संगठनों ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। यह घटना देश के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा भड़की और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई।

इस घटना की जांच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े घटनाक्रम और उसमें विभिन्न राजनीतिक नेताओं तथा संगठनों की भूमिका की पड़ताल की। आयोग की रिपोर्ट ने आंदोलन से जुड़े संगठनों और नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।
आलोचकों का कहना है कि धार्मिक पहचान के आधार पर बड़े पैमाने पर लोगों को लामबंद करने से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा और हिंसा की आशंका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनके अनुसार, इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में धार्मिक पहचान को केंद्रीय स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
7. संगठन का पंजीकरण, पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल
RSS की कानूनी स्थिति भी हाल के वर्षों में बहस का विषय रही है। संगठन लंबे समय से एक ऐसे स्वरूप में काम करता आया है, जिसे सामान्य कंपनियों या कुछ अन्य पंजीकृत संस्थाओं की तरह सीधे समझना आसान नहीं है। इसके पंजीकरण, संपत्ति, वित्तीय विवरण और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर राजनीतिक दलों तथा आलोचकों ने सवाल उठाए हैं।
जून 2026 में प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की एक व्याख्यात्मक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रत्येक नागरिक संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने वाला कोई सामान्य कानून नहीं है। RSS का पक्ष रहा है कि संगठन के अस्तित्व और वैधता के लिए पंजीकरण आवश्यक नहीं है।
इसके विपरीत, आलोचकों का तर्क है कि देश के सबसे बड़े सामाजिक संगठनों में शामिल संस्था को अपने वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज के बारे में अधिक पारदर्शिता रखनी चाहिए।
RSS आज भारतीय राजनीति और समाज पर प्रभाव रखने वाला संगठन है। ऐसे में उसकी उपलब्धियों, दावों और विवादों की स्वतंत्र जांच तथा आलोचनात्मक समीक्षा लोकतांत्रिक विमर्श का जरूरी हिस्सा है। स्थापना दिवस पर उसके सौ से अधिक वर्षों के सफर को समझने का अर्थ केवल उत्सव का वर्णन करना नहीं, बल्कि उन सवालों पर भी विचार करना है जो इस संगठन की भूमिका और भारत की बहुलतावादी पहचान से जुड़े हैं।


