बराक ओबामा के कार्यकाल में ‘Don’t Ask, Don’t Tell’ को खत्म करने की प्रक्रिया निर्णायक चरण में पहुंची। जानिए 1993 में यह समझौता क्यों बना और समय के साथ इसका विरोध क्यों हुआ।
वॉशिंगटन डी.सी.: सोचिए, किसी देश के सैनिक को उसके देश के लिए लड़ने की इजाजत तो दी जाए, लेकिन उससे उसकी पहचान छिपाने की अपेक्षा भी की जाए। अमेरिका में एक समय सेना की नीति कुछ ऐसी ही थी।
करीब 17 साल तक अमेरिकी सशस्त्र बलों में “Don’t Ask, Don’t Tell” (DADT) नाम की नीति लागू रही। इसके तहत समलैंगिक और उभयलिंगी सैन्यकर्मी अपनी यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) को सार्वजनिक रूप से जाहिर नहीं कर सकते थे और सेना उनके बारे में सीधे सवाल नहीं कर सकती थी। अगर उनकी पहचान सामने आती या उन पर समलैंगिक संबंधों से जुड़ा आचरण साबित होता, तो उन्हें सेना से अलग किया जा सकता था।
20 सितंबर 2011 को यह नीति आधिकारिक रूप से खत्म हो गई। आज DADT के अंत के 15 साल पूरे हो रहे हैं। यह सिर्फ एक सैन्य नियम के खत्म होने की तारीख नहीं थी, बल्कि अमेरिकी सेना में LGBTQ लोगों की खुले तौर पर सेवा के अधिकार को लेकर दशकों से चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
क्या थी ‘Don’t Ask, Don’t Tell’ नीति?
DADT को समझने के लिए 1993 से पहले की अमेरिकी सैन्य व्यवस्था को समझना जरूरी है। अमेरिकी सशस्त्र बलों में लंबे समय तक समलैंगिक लोगों की सैन्य सेवा पर प्रतिबंध रहा।
राष्ट्रीय अभिलेखागार के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में सेना ने समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं को भर्ती से रोकने की व्यवस्था अपनाई थी और यह नीति बाद के दशकों तक अलग-अलग रूपों में जारी रही।
1990 के दशक की शुरुआत में इस व्यवस्था को बदलने की मांग तेज हुई। तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बिल क्लिंटन ने खुले तौर पर समलैंगिक लोगों को सेना में सेवा करने की अनुमति देने का समर्थन किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें कांग्रेस, सैन्य नेतृत्व और समाज के एक हिस्से से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।सइसी टकराव से एक समझौता सामने आया, जिसे बाद में Don’t Ask, Don’t Tell के नाम से जाना गया।

सरल शब्दों में इसका अर्थ था, सेना किसी सैनिक से उसकी यौन पहचान के बारे में नहीं पूछेगी, लेकिन सैनिक भी सार्वजनिक रूप से अपनी समलैंगिक पहचान या समान-लिंग संबंधों को प्रकट नहीं करेगा। यदि यह जानकारी सामने आती और नीति के तहत कार्रवाई का आधार बनती, तो सैन्य सेवा समाप्त की जा सकती थी।
नीति का पूरा शुरुआती ढांचा केवल “Don’t Ask, Don’t Tell” तक सीमित नहीं था। इसमें “Don’t Pursue” और बाद में “Don’t Harass” जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए थे, जिनका उद्देश्य जांच की सीमा और उत्पीड़न से सुरक्षा से जुड़े नियम तय करना था।
अमेरिका में ऐसी नीति की जरूरत क्यों महसूस हुई?
1993 में DADT किसी एक विचार से पैदा नहीं हुई थी। यह उस समय के अमेरिकी राजनीतिक और सैन्य माहौल में समझौते के रूप में सामने आई थी।
इसके समर्थकों का तर्क था कि सेना में खुले तौर पर समलैंगिक लोगों की मौजूदगी से सैन्य इकाइयों की एकजुटता, अनुशासन और मनोबल प्रभावित हो सकता है। 1993 में पारित कानून की भाषा में भी खुले तौर पर समलैंगिकता को सैन्य मनोबल, अनुशासन तथा एकजुटता के लिए जोखिम बताया गया था।
दूसरी ओर, LGBTQ अधिकार समर्थकों का तर्क था कि किसी व्यक्ति की यौन पहचान को सैन्य सेवा की योग्यता से जोड़ना भेदभावपूर्ण है। उनके लिए DADT पूर्ण समानता नहीं थी, बल्कि पुराने प्रतिबंध को एक अलग रूप में बनाए रखने जैसा था।
यानी DADT की बुनियाद दो विरोधी विचारों के बीच समझौते पर रखी गई।
17 साल तक सैनिकों का अनुभव कैसा रहा?
DADT का सबसे बड़ा प्रभाव उन सैनिकों पर पड़ा जिन्हें अपनी पहचान छिपाकर सैन्य सेवा करनी पड़ती थी।
किसी सैनिक को अपने साथी, दोस्तों या वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी निजी जिंदगी के बारे में सच बोलने में डर हो सकता था। समान-लिंग वाले साथी के साथ रिश्ते को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना या अपनी यौन पहचान बताना सैन्य करियर के लिए जोखिम बन सकता था। नीति के तहत सेवा सदस्यों को अपनी पहचान छिपाकर रखने की मजबूरी थी और जानकारी सामने आने पर अलग किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी।
मानवाधिकार संगठनों और पूर्व सैन्यकर्मियों ने लंबे समय तक यह तर्क दिया कि इस व्यवस्था ने सैनिकों को दोहरी जिंदगी जीने की स्थिति में डाल दिया।
Human Rights Campaign के अनुसार, DADT ने LGBTQ सैन्यकर्मियों को खुले तौर पर सेवा करने से रोका और हजारों लोगों को उनकी यौन पहचान सामने आने के बाद सेना से अलग किया गया।
यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि DADT के दौरान सेना से अलग किए गए हर व्यक्ति का अनुभव एक जैसा नहीं था। कुछ सैन्यकर्मी सम्मानजनक तरीके से अलग हुए, जबकि कुछ मामलों में डिस्चार्ज की श्रेणी और उसके बाद के करियर पर प्रभाव अलग रहा।
कितने लोगों पर पड़ा इसका असर?
DADT के प्रभाव का एक बड़ा पैमाना इसके तहत हुए सैन्य डिस्चार्ज से समझा जा सकता है।
Human Rights Campaign ने 2007 में लगभग 12,000 सैन्यकर्मियों के सम्मान में एक अभियान चलाया था, जिन्हें तब तक DADT के तहत सेना से बाहर किया जा चुका था। बाद के रक्षा विभागीय आंकड़ों में यह संख्या 13,000 से अधिक बताई गई।
हालांकि केवल डिस्चार्ज की संख्या से पूरी कहानी सामने नहीं आती। DADT की वजह से कितने लोगों ने सेना में भर्ती होने से परहेज किया या अपनी पहचान छिपाकर सेवा जारी रखी।
इसलिए नीति का प्रभाव सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं था जिन्हें औपचारिक रूप से सेना से बाहर किया गया। आलोचकों के मुताबिक, इसका व्यापक प्रभाव सैन्य संस्कृति और LGBTQ कर्मचारियों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ा।
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क्यों बढ़ता गया विरोध?
समय के साथ अमेरिकी समाज और सेना में LGBTQ लोगों की सैन्य सेवा को लेकर दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा।
DADT के आलोचकों का सवाल था कि यदि किसी सैनिक की यौन पहचान उसके सैन्य कर्तव्यों या प्रदर्शन को प्रभावित नहीं करती, तो उसे अपनी पहचान छिपाने के लिए मजबूर क्यों किया जाए। इस नीति के खिलाफ कानूनी चुनौतियां भी सामने आईं और इसे व्यक्तिगत अधिकारों तथा समानता के सवाल से जोड़कर देखा गया। कांग्रेस में भी इसे खत्म करने के लिए लगातार प्रयास होते रहे।
इस बहस को आगे बढ़ाने में अमेरिकी रक्षा विभाग की आंतरिक समीक्षा भी महत्वपूर्ण रही। फरवरी 2010 में तत्कालीन रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने DADT को समाप्त किए जाने की स्थिति में उसके संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन शुरू कराया।
समीक्षा में सैन्य तैयारी, यूनिट कोहेशन, नेतृत्व, भर्ती, सैनिकों को बनाए रखने की क्षमता और परिवारों पर संभावित प्रभाव जैसे पहलुओं का अध्ययन किया गया। गेट्स ने यह भी कहा था कि 1993 के बाद अमेरिकी समाज और सेना में समलैंगिकता को लेकर दृष्टिकोण में काफी बदलाव आया है।
इस समीक्षा ने नीति को लेकर बहस को केवल सामाजिक या राजनीतिक मुद्दा रहने के बजाय सैन्य प्रभावशीलता और व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर भी परखने का आधार दिया। दिसंबर 2010 में जारी व्यापक समीक्षा के बाद DADT को समाप्त करने की प्रक्रिया निर्णायक चरण में पहुंची।
बराक ओबामा के दौर में आया बड़ा बदलाव
अमेरिकी राजनीति में DADT के अंत की प्रक्रिया राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में निर्णायक चरण में पहुंची।
जनवरी 2010 में ओबामा ने अपने State of the Union संबोधन में DADT को खत्म करने के लिए कांग्रेस के साथ काम करने की बात कही। इसके बाद रक्षा विभाग ने व्यापक समीक्षा शुरू की।
दिसंबर 2010 में ओबामा ने Don’t Ask, Don’t Tell Repeal Act of 2010 पर हस्ताक्षर किए। लेकिन कानून ने उसी दिन नीति को समाप्त नहीं किया। उसने कुछ शर्तें तय कीं, जिन्हें पूरा करने के बाद ही इसे प्रभावी तरीके से हटाया जाना था।

22 जुलाई 2011 को राष्ट्रपति ओबामा, रक्षा मंत्री और Joint Chiefs of Staff के अध्यक्ष की ओर से आवश्यक प्रमाणन पूरा किया गया। इसके बाद घोषणा हुई कि नीति 60 दिनों में, यानी 20 सितंबर 2011 को खत्म हो जाएगी।
17 साल पुरानी नीति का अंत
20 सितंबर 2011 को DADT आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई। इसके बाद अमेरिकी सैन्यकर्मियों को अपनी यौन पहचान छिपाकर सेवा करने की कानूनी बाध्यता नहीं रही।
व्हाइट हाउस ने उस समय कहा था कि बदलाव के बाद सैन्यकर्मी अपने परिवार और निजी जीवन के बारे में अधिक खुले तौर पर रह सकेंगे और सेना को उन लोगों की क्षमताओं से वंचित नहीं होना पड़ेगा जो केवल अपनी यौन पहचान के कारण पहले खुलकर सेवा नहीं कर सकते थे।
इसके बाद खुले तौर पर समलैंगिक और लेस्बियन सैन्यकर्मियों की सेवा अमेरिकी सेना की सामान्य व्यवस्था का हिस्सा बन गई।

बाद के वर्षों में समान-लिंग विवाह से जुड़े सैन्य लाभों का मुद्दा भी सामने आया। 2013 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा Defense of Marriage Act के एक प्रमुख प्रावधान को असंवैधानिक ठहराए जाने के बाद समान-लिंग वाले सैन्य जीवनसाथियों के लिए भी कई संघीय सैन्य लाभों का रास्ता साफ हुआ।
15 साल बाद DADT की कहानी इस बात का दस्तावेज है कि कानून और संस्थागत नीतियां सिर्फ नियम नहीं बनातीं—वे उन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, करियर और अपनेपन की भावना को भी प्रभावित करती हैं, जो उन नियमों के भीतर काम करते हैं।


