Thursday, 05 November 2026
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‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय’ के गुजराती संस्करण का विमोचन, एकात्म मानव दर्शन पर राष्ट्रीय सेमिनार

100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत, भारतीय चिंतन और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन पर देशभर के विद्वानों ने किया मंथन

अहमदाबाद, गुजरात: गुजरात विश्वविद्यालय परिसर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, समर्पण और योगदान पर आधारित पुस्तक ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय’ के गुजराती संस्करण का विमोचन किया गया। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम के साथ ‘एकात्म मानव दर्शन’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार भी आयोजित हुआ।

देशभर से विद्वानों ने लिया हिस्सा

राष्ट्रीय सेमिनार में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों, चिंतकों, शोधकर्ताओं और वरिष्ठ प्राध्यापकों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

सेमिनार के दौरान शोधकर्ताओं ने 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन शोध-पत्रों में भारतीय चिंतन, संस्कृति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, अर्थनीति और मानव-केंद्रित विकास जैसे विषयों पर विचार रखे गए।

लेखक चन्दन कुमार ने दिया सुझाव

पुस्तक के लेखक श्री चन्दन कुमार ने बताया कि ‘समर्पण: दीनदयाल उपाध्याय’ का भारत की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

उन्होंने गुजरात विश्वविद्यालय से आग्रह किया कि वह सेमिनार में प्रस्तुत शोध-पत्रों का प्रकाशन भी करे। उन्होंने कहा कि इससे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और एकात्म मानव दर्शन को व्यापक स्तर तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

पुरुषोत्तम रूपाला ने बताया एकात्म मानव दर्शन का महत्व

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री पुरुषोत्तम रूपाला ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को आधुनिक भारत के महान चिंतकों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के शुरुआती दौर में उपाध्याय ने पश्चिमी राजनीतिक चिंतन की सीमाओं को समझाते हुए भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित मौलिक विचार प्रस्तुत किया।

रूपाला ने कहा कि पश्चिमी चिंतन में व्यक्तिवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और राष्ट्रवाद जैसी विचारधाराएं अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं। इसके विपरीत, एकात्म मानव दर्शन व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को एक-दूसरे से जोड़कर देखता है।

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को जोड़ता है दर्शन

रूपाला ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार व्यक्ति और समाज, व्यक्ति और राष्ट्र तथा विभिन्न राष्ट्रों के हितों को परस्पर विरोधी नहीं मानते। वे इन्हें एक-दूसरे का पूरक मानते हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन संघर्ष के बजाय संवाद, पारस्परिक स्नेह, विश्व बंधुत्व और वैश्विक एकता पर जोर देता है। उनके अनुसार, इन मूल्यों की झलक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में भी दिखाई देती है।

कुलपति डॉ. जगदीशभाई जोशी ने किया स्वागत

गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जगदीशभाई जोशी ने कार्यक्रम में स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि देशभर से आए विद्वानों, चिंतकों और वरिष्ठ प्राध्यापकों का विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र होना संस्थान के लिए गौरव की बात है।

उन्होंने बताया कि सेमिनार के आगामी सत्रों में प्रस्तुत शोध-पत्रों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। इससे विद्यार्थियों को पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और भारतीय दर्शन को समझने का अवसर मिलेगा।

भारत 2047 के संकल्प में युवाओं की भूमिका

डॉ. जोशी ने कहा कि भारतीय चिंतन और मूल्यों से प्रेरित युवा पीढ़ी ‘भारत 2047—श्रेष्ठ भारत, विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

उन्होंने सेमिनार के सफल आयोजन के लिए प्रो. डॉ. हितेशभाई पटेल और उनकी टीम के साथ विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि गणमान्य अतिथियों के प्रेरक संबोधनों ने प्रतिभागियों को नई ऊर्जा, प्रेरणा और मार्गदर्शन दिया।

भारतीय संस्कृति से मानव-केंद्रित विकास तक चर्चा

राज्यशास्त्र विभाग ने इस राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए शोधकर्ताओं और विद्वानों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

शोध-पत्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रवाद, अर्थनीति और मानव-केंद्रित विकास समेत कई विषयों पर व्यापक अकादमिक विमर्श हुआ।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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