नई दिल्ली: भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (वीडीए) को लेकर पिछले कुछ वर्षों में एक स्पष्ट विरोधाभास देखने को मिला है। इस क्षेत्र पर भारी कर लगाया गया और निगरानी भी बढ़ाई गई, लेकिन इसके लिए अब तक एक स्पष्ट और व्यापक नियामक ढांचा नहीं बन पाया है। ‘पहले कर, बाद में नियमन’ की इस नीति ने बाजार के व्यवहार को प्रभावित किया है। अब घरेलू नियामक इस चुनौती से सीधे जूझ रहे हैं, खासकर डिजिटल एसेट्स की निगरानी को लेकर संसद में चल रही समीक्षाओं के बीच।
वित्त अधिनियम, 2022 के तहत वीडीए से होने वाले लाभ पर 30 प्रतिशत की दर से कर और हर लेनदेन पर 1 प्रतिशत टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (टीडीएस) लागू किया गया। इसका उद्देश्य लेनदेन का रिकॉर्ड तैयार करना और पारदर्शिता बढ़ाना था। हालांकि, इस व्यवस्था का एक असर बाजार के बंटने के रूप में भी सामने आया है।
आंकड़े इस बदलाव को बिल्कुल साफ तरीके से दिखाते हैं: घरेलू एक्सचेंज वित्त वर्ष 2024-25 में कुल ट्रेडिंग वॉल्यूम का केवल करीब 8-10 प्रतिशत हिस्सा संभाल रहे हैं, जो लगभग 45,000 करोड़ रुपये है। इसके मुकाबले विदेशी एक्सचेंजों पर ट्रेडिंग वॉल्यूम वित्त वर्ष 2023-24 के 2.63 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 4.88 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह बदलाव केवल उपयोगकर्ताओं की पसंद का मामला नहीं है, बल्कि नीतिगत ढांचे में निहित एक संरचनात्मक खामी को दिखाता है।
एक ही तरह का लेनदेन करने वाले कारोबारी को भारतीय प्लेटफॉर्म पर शुरुआत में ही 1 प्रतिशत टीडीएस का सामना करना पड़ता है, जबकि विदेशी एक्सचेंज के जरिए कारोबार करने पर ऐसी कोई तत्काल कटौती नहीं होती। अधिक मात्रा में या तेजी से होने वाले कारोबार में यह निर्णायक अंतर साबित होता है।
इस स्थिति ने टैक्स अनुपालन की एक असमान व्यवस्था बना दी है। घरेलू एक्सचेंज टीडीएस जमा करने का एकमात्र प्रभावी माध्यम बन गए हैं। उन्होंने वित्त वर्ष 2022-23 और 2023-24 में करीब 338 करोड़ रुपये का टीडीएस जमा किया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह राशि अकेले करीब 450 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। दूसरी ओर, बड़ी संख्या में भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं देने वाले विदेशी एक्सचेंज न तो टीडीएस काटते हैं और न ही भारतीय अधिकारियों के साथ उपयोगकर्ता स्तर का विस्तृत डेटा लगातार साझा करते हैं।
इससे दो अलग-अलग व्यवस्थाएं बन गई हैं — एक घरेलू व्यवस्था जो नियमों का पालन करती है लेकिन कारोबारी रूप से नुकसान में है, और दूसरी विदेशी व्यवस्था जिसमें अधिक कारोबार है लेकिन नियामकों के लिए उसकी गतिविधियां कम दिखाई देती हैं।
नीति-निर्माता अब इस असंतुलन के राजस्व पर पड़ने वाले असर को पहले से बेहतर समझ रहे हैं। कारोबार का विदेशी एक्सचेंजों की ओर जाना केवल नियमन से जुड़ी कमी नहीं है, बल्कि इससे संभावित कर राजस्व का नुकसान भी होता है। संसद में हुई चर्चाओं में ‘गंवाए गए कर राजस्व’ और सीमा पार होने वाले वीडीए लेनदेन की प्रभावी निगरानी न कर पाने को लेकर चिंता जताई गई है। वहीं, प्रवर्तन एजेंसियों ने भी बड़े सीमा-पार लेनदेन से जुड़े मामलों में निगरानी बढ़ाई है। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा व्यवस्था असली हालात में दबाव से गुजर रही है।
इस बीच, मौजूदा नियामक व्यवस्था और व्यापक कानून के बीच अंतर को कम करने के लिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर सेल्फ-रेगुलेटरी ऑर्गनाइजेशन (एसआरओ) का विचार सामने आया है। ऐसा संगठन मौजूदा नियामकों की निगरानी में काम कर सकता है। इसके साथ ही भारत के रिपोर्टिंग मानकों को वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप बनाने पर भी जोर बढ़ रहा है, खासकर उपयोगकर्ता स्तर के डेटा साझा करने और टैक्स रेजिडेंसी की जानकारी से जुड़े मामलों में। इससे संकेत मिलता है कि नीति का ध्यान केवल लेनदेन पर कर लगाने से आगे बढ़कर उनकी प्रभावी निगरानी की व्यवस्था बनाने पर जा रहा है।
आगे की दिशा मौजूदा संसदीय सत्र के तीन प्रमुख मुद्दों से तय हो सकती है। पहला, दिशा स्पष्ट रूप से एक सुविचारित नियामक व्यवस्था की ओर है, जिसमें अंतरिम तौर पर एसआरओ आधारित ढांचे की भूमिका हो। दूसरा, मौजूदा टैक्स व्यवस्था, खासकर 1 प्रतिशत टीडीएस की सीमाओं को अब व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है, जिससे इसमें बदलाव का रास्ता खुल रहा है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, विदेशी एक्सचेंजों को भारत की नियामक और कर व्यवस्था के दायरे में लाना एक स्पष्ट नीतिगत जरूरत है।
इसके लिए पंजीकरण, रिपोर्टिंग की अनिवार्यता या बाजार में पहुंच से जुड़ी शर्तें लागू की जा सकती हैं। यदि संसद के मौजूदा सत्र में दिखा यह जोर ठोस नीतिगत कदमों में बदलता है, तो भारत के पास अपने वीडीए और क्रिप्टो बाजार में बेहतर संतुलन वापस लाने का अवसर है, और साथ ही नियामकीय पारदर्शिता और आर्थिक लाभ, दोनों को फिर से हासिल करने का भी।




