2030 फीफा विश्व कप को 64 टीमों तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है फीफा। जानिए इससे भारत, एशिया और विश्व फुटबॉल पर क्या असर पड़ सकता है।
ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड: फीफा विश्व कप 2026 अपने रोमांचक अंतिम चरण में पहुंच चुका है। सेमीफाइनल की दौड़ में अब डिफेंडिंग चैंपियन अर्जेंटीना, फ्रांस, इंग्लैंड और स्पेन के बीच मुकाबले खेले जाएंगे।
अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की संयुक्त मेजबानी में पहली बार 48 टीमों के साथ आयोजित हुए इस टूर्नामेंट ने कई नए रिकॉर्ड बनाए। अधिक देशों की भागीदारी, नए स्टेडियम, बड़े दर्शक वर्ग और अप्रत्याशित नतीजों ने इसे फीफा इतिहास के सबसे बड़े विश्व कप के रूप में स्थापित किया है।
इसी बीच, जब 2026 संस्करण अभी समाप्त भी नहीं हुआ है, तब फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो (Gianni Infantino) ने 2030 विश्व कप के लिए 64 टीमों के प्रस्ताव पर विचार करने की पुष्टि कर फुटबॉल जगत में नई बहस छेड़ दी है।
यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो यह विश्व कप के 96 वर्षों के इतिहास का सबसे बड़ा विस्तार होगा। समर्थकों का मानना है कि इससे अधिक देशों को विश्व मंच मिलेगा, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे टूर्नामेंट की गुणवत्ता, खिलाड़ियों के कार्यभार और आयोजन की जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या 64 टीमों वाला विश्व कप भारत जैसे देशों के लिए पहली बार विश्व कप खेलने का रास्ता आसान बना सकता है?
क्या कहा फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो ने?
हाल ही में फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो ने पुष्टि की कि 2030 फीफा विश्व कप में 64 टीमों की संभावना पर आधिकारिक स्तर पर विचार किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि फीफा किसी भी प्रस्ताव को बिना समीक्षा के खारिज नहीं करता और सभी सुझावों का गंभीरता से मूल्यांकन किया जाता है।
यह प्रस्ताव मूल रूप से दक्षिण अमेरिका की फुटबॉल संस्था CONMEBOL की ओर से सामने आया था। 2030 विश्व कप का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह फीफा विश्व कप की शताब्दी (100 वर्ष) का संस्करण होगा। पहला विश्व कप 1930 में उरुग्वे में आयोजित हुआ था।
2030 टूर्नामेंट की मेजबानी मुख्य रूप से स्पेन, पुर्तगाल और मोरक्को करेंगे, जबकि शताब्दी समारोह के तहत शुरुआती मुकाबले उरुग्वे, अर्जेंटीना और पराग्वे में खेले जाने की योजना पहले ही स्वीकृत हो चुकी है।
कैसे बढ़ी विश्व कप में टीमों?
विश्व कप हमेशा से इतना बड़ा नहीं था। 1930 के पहले टूर्नामेंट में केवल 13 टीमें शामिल हुई थीं। 1982 में यह संख्या 24 हुई। 1998 से 2022 तक लगातार 32 टीमें विश्व कप खेलती रहीं।
इसके बाद फीफा ने 2026 संस्करण के लिए पहली बार टीमों की संख्या बढ़ाकर 48 कर दी। इसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका, ओशिआनिया और CONCACAF जैसे क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व देना था।
अब यदि 2030 में 64 टीमों का प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो केवल आठ वर्षों के भीतर विश्व कप में टीमों की संख्या 32 से बढ़कर दोगुनी हो जाएगी।
64 टीमों के पीछे क्या तर्क है?
इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि फुटबॉल अब केवल यूरोप और दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं रह गया है। एशिया, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका में भी फुटबॉल तेजी से विकसित हो रहा है।
अधिक टीमों के शामिल होने से छोटे देशों को विश्व कप खेलने का अवसर मिलेगा। इससे स्थानीय फुटबॉल संरचना को मजबूती मिलेगी, युवा खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलेगी और वैश्विक स्तर पर खेल का विस्तार होगा।
फीफा का लंबे समय से उद्देश्य “Global Game” की अवधारणा को मजबूत करना रहा है। यही कारण है कि वह लगातार अधिक देशों को विश्व कप से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
इस फैसले की चुनौतियां
हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर कई पूर्व खिलाड़ी, कोच और फुटबॉल विश्लेषक चिंतित भी हैं। सबसे बड़ी चिंता प्रतियोगिता की गुणवत्ता को लेकर है। यदि बहुत अधिक टीमें शामिल होंगी, तो शुरुआती दौर में कई एकतरफा मुकाबले देखने को मिल सकते हैं।
दूसरा बड़ा मुद्दा खिलाड़ियों के बढ़ते कार्यभार का है। क्लब फुटबॉल पहले ही बेहद व्यस्त कैलेंडर से गुजर रही है। यूरोपीय लीग, UEFA Champions League, घरेलू कप और अंतरराष्ट्रीय मैचों के बीच खिलाड़ियों को आराम का समय लगातार कम मिलता जा रहा है।
यदि विश्व कप का आकार और बढ़ता है, तो खिलाड़ियों की फिटनेस, चोटों और मानसिक थकान जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा आयोजन की लागत भी कई गुना बढ़ जाएगी। अधिक टीमों का मतलब अधिक स्टेडियम, अधिक होटल, लंबा टूर्नामेंट, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था और अधिक यात्रा प्रबंधन होगा।
क्या 64 टीमों के आने से घट जाएगा विश्व कप का रोमांच
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी कठिन क्वालिफिकेशन प्रक्रिया रही है। दुनिया की शीर्ष टीमें ही अंतिम टूर्नामेंट तक पहुंचती हैं।
यदि प्रवेश आसान हो जाता है, तो विश्व कप की विशिष्टता (Exclusivity) पर असर पड़ सकता है। हालांकि इसके विपरीत यह तर्क भी दिया जा रहा है कि 2026 में 48 टीमों के बावजूद प्रतियोगिता का स्तर अपेक्षा से बेहतर देखने को मिला है।
इसलिए अंतिम निर्णय काफी हद तक फीफा के विस्तृत अध्ययन और सदस्य देशों की सहमति पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए खुलेगा विश्व कप का रास्ता?
64 टीमों वाले विश्व कप की चर्चा के साथ भारत का नाम भी सोशल मीडिया और खेल जगत में तेजी से सामने आने लगा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अधिक टीमों के शामिल होने पर एशियाई फुटबॉल परिसंघ (AFC) को भी पहले से ज्यादा विश्व कप स्लॉट मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि वास्तविक स्थिति इससे कहीं अधिक जटिल है। केवल टीमों की संख्या बढ़ जाने से भारत अपने आप विश्व कप के लिए क्वालिफाई नहीं कर जाएगा। क्वालिफिकेशन का रास्ता आज भी फीफा रैंकिंग, एशियाई क्वालिफायर में प्रदर्शन और लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नतीजों पर ही निर्भर करेगा।
भारत ने अभी तक अपने इतिहास में केवल एक बार 1950 फीफा विश्व कप के लिए क्वालिफाई किया था। हालांकि भारतीय टीम उस टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी। इसके बाद से भारत कभी भी विश्व कप के मुख्य चरण तक नहीं पहुंच पाया है।

भारत की मौजूदा स्थिति
भारतीय फुटबॉल पिछले कुछ वर्षों में लगातार चुनौतियों से गुजर रहा है। 2026 विश्व कप क्वालिफायर के दूसरे चरण में भारत तीसरे दौर तक पहुंचने में असफल रहा। कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में टीम अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी और अंतिम चरणों की दौड़ से बाहर हो गई।
फीफा रैंकिंग में भी भारत अभी दुनिया की शीर्ष टीमों से काफी पीछे है। एशिया में जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, सऊदी अरब, कतर, उज्बेकिस्तान, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसी टीमें लगातार मजबूत प्रदर्शन कर रही हैं।
ऐसे में यदि अतिरिक्त स्लॉट भी मिलते हैं, तो भारत को पहले इन देशों के स्तर तक पहुंचना होगा। यानी 64 टीमों वाला विश्व कप भारत के लिए अवसर जरूर बढ़ा सकता है, लेकिन सफलता की गारंटी बिल्कुल नहीं है।
भारत को क्या करना होगा?
यदि भारत भविष्य में विश्व कप खेलना चाहता है, तो केवल टूर्नामेंट का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले घरेलू फुटबॉल ढांचे को मजबूत करना होगा। जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोज, बेहतर कोचिंग, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं और आयु वर्ग प्रतियोगिताओं को लगातार मजबूत बनाना होगा।
इंडियन सुपर लीग (ISL) की मजबूत वापसी के अलावा, आई-लीग और युवा विकास कार्यक्रमों को भी अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार हो सकें।
साथ ही भारतीय टीम को मजबूत अंतरराष्ट्रीय टीमों के खिलाफ लगातार मैच खेलने होंगे, जिससे खिलाड़ियों का अनुभव और फीफा रैंकिंग दोनों बेहतर हो सकें।
64 टीमों से किन देशों को सबसे ज्यादा फायदा होगा?
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो सबसे अधिक लाभ उन देशों को मिल सकता है जो लगातार क्वालिफिकेशन के अंतिम चरण तक पहुंचते हैं लेकिन कुछ अंकों के अंतर से विश्व कप खेलने से चूक जाते हैं।
एशिया, अफ्रीका और CONCACAF क्षेत्र के कई देशों को इससे अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं। अफ्रीका लंबे समय से अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। इसी तरह एशिया में भी कई उभरती टीमें लगातार विश्व कप के करीब पहुंच रही हैं।
यूरोप और दक्षिण अमेरिका के पारंपरिक दिग्गजों के लिए शायद ज्यादा फर्क न पड़े, लेकिन विकासशील फुटबॉल देशों के लिए यह ऐतिहासिक अवसर साबित हो सकता है।
टीम की बढ़ोत्तरी से फीफा को फायदा?
FIFA World Cup केवल खेल नहीं बल्कि अरबों डॉलर का वैश्विक आयोजन है। अधिक टीमों का मतलब अधिक मैच, अधिक टिकट बिक्री, अधिक प्रसारण अधिकार, अधिक प्रायोजन और डिजिटल दर्शकों की संख्या में भी वृद्धि।
यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ इस प्रस्ताव को केवल खेल विस्तार नहीं बल्कि व्यावसायिक रणनीति के रूप में भी देखते हैं।
हालांकि FIFA के अनुसार इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक देशों को विश्व फुटबॉल से जोड़ना है।
फुटबॉल के भविष्य के लिए बड़ा कदम या बड़ा जोखिम?
2030 विश्व कप के लिए 64 टीमों का प्रस्ताव फुटबॉल इतिहास के सबसे बड़े बदलावों में से एक साबित हो सकता है। समर्थकों के लिए यह खेल को वास्तव में वैश्विक बनाने का अवसर है, जबकि आलोचकों के लिए यह विश्व कप की प्रतिस्पर्धात्मक गुणवत्ता को कमजोर करने का जोखिम भी है।
भारत जैसे देशों के लिए यह उम्मीद की एक नई किरण जरूर लेकर आया है। यदि अतिरिक्त स्लॉट मिलते हैं, तो क्वालिफिकेशन का रास्ता पहले की तुलना में कुछ आसान हो सकता है। लेकिन केवल टीमों की संख्या बढ़ा देना भारतीय फुटबॉल की समस्याओं का समाधान नहीं है।
इसके लिए मजबूत घरेलू ढांचा, बेहतर खिलाड़ी विकास, उच्च स्तर की कोचिंग और लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन भारत को विश्व कप तक पहुंचा सकते हैं।
फिलहाल दुनिया की नजर फीफा की आगामी बैठकों पर टिकी है। यदि 64 टीमों वाले विश्व कप को मंजूरी मिलती है, तो 2030 का टूर्नामेंट न केवल विश्व कप के 100 वर्ष पूरे होने का जश्न होगा, बल्कि वैश्विक फुटबॉल के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत भी साबित हो सकता है।
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