Sunday, 13 September 2026
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क्या खत्म हो जाएगा मनरेगा? नए बिल को लेकर देशभर में बहस तेज

मनरेगा खत्म होने के क़रीब? VB-G RAM G Bill पर देशभर में बहस तेज, पढ़ें आसान भाषा में बदलाव, फायदे, समस्याएं और ग्रामीणों पर असर।

नई दिल्ली: ग्रामीण भारत की सबसे अहम योजना मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर देशभर में गहरी बहस छिड़ गई है। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर #SaveMGNREGA ट्रेंड कर रहा है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक नया बिल पेश किया है, जिसके तहत मनरेगा को खत्म कर ‘VB-G RAM G Bill’ (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025) लाया जाएगा।

इस खबर के सामने आते ही विपक्ष ने विरोध तेज कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं—क्या मनरेगा सच में खत्म हो जाएगी, या सिर्फ उसका नाम और ढांचा बदला जा रहा है? आइए, इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।

मनरेगा पिछले 20 साल से करोड़ों गरीब परिवारों के लिए सहारा रही है। सरकार का कहना है कि समय के साथ योजना को बदलना जरूरी है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक फैसला बता रहा है। पूरी बहस को सरल शब्दों में, तथ्यों के साथ समझते हैं।

मनरेगा की शुरुआत: ग्रामीणों का हक, गांधी जी का सपना

मनरेगा कानून 2005 में यूपीए सरकार ने लागू किया था। इसका मकसद था—हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन का मजदूरी वाला काम देना। अगर काम न मिले, तो बेरोजगारी भत्ता देना जरूरी था। यह एक कानूनी अधिकार था, जिसे जरूरत पड़ने पर अदालत में चुनौती दी जा सकती थी।

फायदे क्या रहे?

• पिछले 20 सालों में 32 अरब से ज्यादा व्यक्ति-दिन का काम किया गया।
• साल 2024-25 में करीब 80 लाख परिवारों को इससे फायदा मिला।
• लगभग 55 फीसदी मजदूर महिलाएं हैं, जिससे परिवार की आमदनी बढ़ी।
• तालाब, सड़क, कुएं और अन्य सार्वजनिक निर्माण जैसे करीब 15 करोड़ काम हुए।

समस्याएं क्या हैं?

• औसतन परिवार को सिर्फ 42 दिन का काम मिलता है।
• मजदूरी (220–300 रुपये प्रतिदिन) महंगाई की तुलना में कम है।
• करीब 12,000 करोड़ रुपये के भुगतान अटके हैं, खासकर कुछ राज्यों में।
• आधार से जुड़ी दिक्कतों के कारण करीब 10 फीसदी लोग योजना से बाहर रह जाते हैं।

कोविड महामारी के समय मनरेगा ग्रामीण लोगों के लिए बड़ी राहत बनी थी। उस समय काम की मांग 50 फीसदी तक बढ़ गई थी। सरकार का तर्क है कि अब गांवों में हालात बदल गए हैं—लगभग हर घर में बिजली और बैंक खाते हैं—इसलिए नई योजना की जरूरत है।

नए बिल से मनरेगा में बदलाव: दिन बढ़े, अधिकार घटे

VB-G RAM G Bill के प्रस्ताव के अनुसार मनरेगा को खत्म कर इसे एक “मिशन” के रूप में चलाया जाएगा। इसके मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:

• काम के दिन बढ़ेंगे: 100 की जगह 125 दिन की गारंटी। आपदा वाले इलाकों में और अधिक दिन मिल सकते हैं।
• फंडिंग का नया तरीका: पहले मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र देता था। अब केंद्र और राज्य का हिस्सा 60:40 होगा। इससे गरीब राज्यों पर दबाव बढ़ सकता है।
• मांग के अनुसार काम की जगह अब कोटा आधारित होगा: पहले जहां जरूरत थी, वहां काम मिलता था। अब राज्यों को तय कोटा मिलेगा।
• खेती के मौसम में ब्रेक: बुआई और कटाई के समय 60 दिन तक काम रोका जा सकता है।
• डिजिटल व्यवस्था: आधार से भुगतान, जीपीएस से निगरानी और एआई से ऑडिट। पारदर्शिता बढ़ाने का दावा है।
• नाम में बदलाव: योजना से महात्मा गांधी का नाम हटा दिया जाएगा, जिस पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है।

ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि यह बदलाव “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य के लिए जरूरी है। आलोचकों का कहना है कि इससे मजदूरों का कानूनी हक कमजोर हो जाएगा।

पुरानी योजना और नए बिल की प्रमुख अंतर बातें

• काम के दिन:
o पुरानी मनरेगा (2005): 100 दिन
o नया VB-G RAM G Bill (2025): 125 दिन (+ आपदा वाले इलाकों में ज्यादा)

• फंडिंग:
o पुरानी मनरेगा (2005): केंद्र 100% मजदूरी
o नया VB-G RAM G Bill (2025): केंद्र और राज्य का हिस्सा 60:40

• ढांचा:
o पुरानी मनरेगा (2005): हक आधारित
o नया VB-G RAM G Bill (2025): मिशन आधारित

• खेती में ब्रेक:
o पुरानी मनरेगा (2005): कोई प्रावधान नहीं
o नया VB-G RAM G Bill (2025): बुआई और कटाई के समय 60 दिन तक काम रोक सकते हैं

• तकनीक:
o पुरानी मनरेगा (2005): सीमित डिजिटल व्यवस्था
o नया VB-G RAM G Bill (2025): पूरी तरह डिजिटल (आधार, जीपीएस, एआई ऑडिट)

• नाम:
o पुरानी मनरेगा (2005): महात्मा गांधी का नाम शामिल
o नया VB-G RAM G Bill (2025): गांधी जी का नाम नहीं

राजनीतिक हलचल: विपक्ष का विरोध, सरकार का जवाब

बिल की खबर आते ही विपक्ष ने तेज विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस, टीएमसी, सीपीआई(एम) और समाजवादी पार्टी ने इसे मजदूरों के अधिकार पर हमला बताया। सोशल मीडिया पर हजारों पोस्ट आए और #मनरेगा ट्रेंड करने लगा।

सरकार का कहना है कि यह बदलाव ग्रामीण विकास को नई दिशा देगा, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बेरोजगारी और असमानता बढ़ सकती है।

ग्रामीणों पर असर: चिंता और सवाल

देश में करीब 7 करोड़ रजिस्टर्ड मनरेगा मजदूर हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं, दलित और आदिवासी शामिल हैं। कई मजदूरों को डर है कि अगर राज्यों के पास पैसा नहीं हुआ, तो 125 दिन की गारंटी भी केवल कागजों तक रह सकती है। आधार और डिजिटल टेक्नोलॉजी के कारण कुछ लोग योजना से बाहर भी रह सकते हैं।

क्या मनरेगा पूरी तरह खत्म होगी?

फिलहाल तुरंत नहीं। छह महीने का बदलाव का समय तय किया गया है। काम की गारंटी बनी रहेगी, लेकिन कानूनी अधिकार कमजोर हो सकते हैं। बिल संसद में पास हो सकता है, लेकिन इस पर और बहस और कानूनी चुनौती की संभावना भी है।

बहस अभी भी जारी, ग्रामीणों की निगाहें भविष्य पर

यह नया बिल सुधार है या पीछे जाने वाला कदम, यह इसके लागू होने पर ही साफ होगा। ग्रामीण मजदूरों की सबसे बड़ी मांग आज भी वही है—काम समय पर मिले और मजदूरी बढ़े। जैसा एक मजदूर ने कहा, “हमें काम चाहिए, नाम नहीं।” विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा, जब गांव मजबूत होंगे। मनरेगा को लेकर चल रही यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है।

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Mansi Sharma

लेखक

Mansi Sharma is a journalist covering Global Affairs, and wellness, known for turning complex ideas into sharp, engaging narratives. Her work is driven by curiosity, depth, and a constant urge to question and explore. When she’s not writing, you’ll often find her diving into new ideas—preferably with a cup of coffee in hand, one sip at a time.

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