भारत में क्रिप्टोकरेंसी पर 1% TDS का नियम लागू होने के बावजूद P2P लेनदेन में इसका पालन कराना चुनौती बना हुआ है। जानें विदेशी प्लेटफॉर्म, सीधे भुगतान और टैक्स जिम्मेदारी से जुड़ी समस्याएं।
नई दिल्ली: भारत में क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े लेनदेन पर टैक्स लगाने के लिए सरकार ने स्पष्ट प्रावधान किए हैं। इनका मकसद क्रिप्टो से होने वाली कमाई पर टैक्स वसूलना और लेनदेन की जानकारी टैक्स विभाग तक पहुंचाना है। आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 393(1) के तहत, निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अधीन वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) के हस्तांतरण पर भुगतान की गई राशि का 1 प्रतिशत टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) के रूप में काटना अनिवार्य है।
हालांकि, इन प्रावधानों को जमीन पर लागू करना आसान नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि क्रिप्टो के हर तरह के लेनदेन में भुगतान और डिजिटल एसेट का ट्रांसफर एक ही माध्यम से नहीं होता। ऐसे में यह पहचानना चुनौतीपूर्ण हो जाता है कि टीडीएस काटने की जिम्मेदारी किसकी है और किस भुगतान पर इसकी कटौती होनी चाहिए।
पीयर-टू-पीयर यानी P2P लेनदेन इस जटिलता को समझने का एक उदाहरण है। सामान्य तौर पर क्रिप्टो एक्सचेंज पर खरीद-बिक्री, भुगतान और लेनदेन का रिकॉर्ड रखने जैसी गतिविधियां प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होती हैं। इसके विपरीत, P2P व्यवस्था में प्लेटफॉर्म खरीदार और विक्रेता को आपस में जोड़ने का काम करता है, जबकि भुगतान दोनों पक्ष सीधे करते हैं।
इस प्रक्रिया में प्लेटफॉर्म को खरीदार, विक्रेता और क्रिप्टो ट्रांसफर की जानकारी मिल सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि रुपये के भुगतान पर भी उसका नियंत्रण हो। यही अंतर टीडीएस के नियम लागू करने में परेशानी पैदा करता है।
विदेशी प्लेटफॉर्म पर बढ़ती चुनौती
विदेश में संचालित क्रिप्टो प्लेटफॉर्मों के मामले में यह समस्या और जटिल हो जाती है। किसी प्लेटफॉर्म का कारोबार एक देश में हो सकता है, उसके लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड दूसरे देश में रखे जा सकते हैं और कंपनी का पंजीकरण किसी तीसरे देश में हो सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय अधिकारियों के लिए पूरी जानकारी हासिल करना और देश के टैक्स नियमों का पालन सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।
इस चुनौती के पीछे तीन प्रमुख पहलू हैं। पहला, क्रिप्टो एसेट का ट्रांसफर और उसके बदले किया जाने वाला भुगतान अलग-अलग माध्यमों से हो सकता है। दूसरा, विदेश में स्थित प्लेटफॉर्मों पर भारतीय नियम लागू कराने और उनकी निगरानी करने में व्यावहारिक बाधाएं आती हैं। तीसरा, किसी एक संस्था के पास लेनदेन से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
मसलन, क्रिप्टो प्लेटफॉर्म के पास डिजिटल एसेट के ट्रांसफर का रिकॉर्ड हो सकता है, जबकि रुपये में किए गए भुगतान का विवरण बैंक के पास रहता है। खरीदार और विक्रेता के पास भी सौदे से संबंधित अलग-अलग जानकारियां होती हैं। इन सभी रिकॉर्ड को एक साथ मिलाए बिना यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि किसी क्रिप्टो ट्रांसफर के बदले कितनी रकम दी गई और उस पर जरूरी टीडीएस काटा गया या नहीं।
TDS काटने की जिम्मेदारी किसकी?
भारतीय टैक्स कानून के तहत टीडीएस काटने का दायित्व उस व्यक्ति पर होता है, जो संबंधित भुगतान करने के लिए जिम्मेदार है। इसका अर्थ यह नहीं है कि क्रिप्टो लेनदेन में शामिल होने वाला हर एक्सचेंज अपने आप टीडीएस काटने के लिए जिम्मेदार हो जाता है। इसी तरह, किसी प्लेटफॉर्म का विदेश में पंजीकृत होना या लेनदेन का P2P माध्यम से होना उसे स्वतः भारतीय टैक्स नियमों के दायरे से बाहर नहीं कर देता।
वास्तविक कठिनाई यह समझने में है कि किसी खास लेनदेन में भुगतान कौन कर रहा है, प्लेटफॉर्म की भूमिका क्या है और कानून के तहत टीडीएस काटने का दायित्व किस पर बनता है। अलग-अलग तरह के प्लेटफॉर्म और भुगतान व्यवस्था होने के कारण नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने का तरीका भी अलग हो सकता है।
इसका असर भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों पर भी पड़ सकता है। घरेलू प्लेटफॉर्म टीडीएस काटने, रिकॉर्ड रखने और लेनदेन की रिपोर्टिंग के लिए जरूरी तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्था पर खर्च करते हैं। दूसरी ओर, यदि उपयोगकर्ताओं को लगता है कि विदेशी प्लेटफॉर्म या P2P लेनदेन में टैक्स से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन कम करना पड़ता है, तो वे ऐसे विकल्पों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इससे नियमों का पालन करने वाले घरेलू एक्सचेंजों के लिए प्रतिस्पर्धा का माहौल असमान हो सकता है।
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टैक्स के अलावा पारदर्शिता पर भी असर
P2P लेनदेन में जानकारी अलग-अलग पक्षों के पास बंटी होने का असर केवल सरकार की टैक्स वसूली तक सीमित नहीं रहता। जब किसी सौदे का पूरा रिकॉर्ड एक जगह उपलब्ध नहीं होता, तो टैक्स अधिकारियों के लिए यह जांचना मुश्किल हो सकता है कि संबंधित पक्षों ने नियमों का पालन किया है या नहीं।
इससे क्रिप्टो बाजार में पारदर्शिता प्रभावित होने की आशंका रहती है। किसी लेनदेन को लेकर खरीदार और विक्रेता के बीच विवाद होने पर भी पूरी जानकारी जुटाना कठिन हो सकता है। इसके अलावा, यदि एक जैसी सेवाएं देने वाले घरेलू और विदेशी प्लेटफॉर्मों पर निगरानी और अनुपालन की व्यवस्था अलग-अलग हो, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा का संतुलन भी बिगड़ सकता है।
इसलिए P2P लेनदेन से जुड़ी चुनौती को केवल टीडीएस की कटौती तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसमें लेनदेन की निगरानी, रिकॉर्ड का मिलान, टैक्स अनुपालन और उपभोक्ता सुरक्षा जैसे पहलू भी शामिल हैं।
नियमों को स्पष्ट करना क्यों जरूरी?
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए जरूरी नहीं कि सरकार कोई नया टैक्स लगाए। इसके बजाय मौजूदा प्रावधानों को स्पष्ट करना और उनके अनुपालन की व्यवस्था को मजबूत बनाना अधिक उपयोगी हो सकता है।
सबसे पहले, सरकार को आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 393(1) के तहत अलग-अलग प्रकार के क्रिप्टो लेनदेन पर टीडीएस लागू करने की प्रक्रिया स्पष्ट करनी होगी। इसमें सामान्य एक्सचेंज के जरिए होने वाली खरीद-बिक्री, P2P सौदे, एस्क्रो व्यवस्था और विदेशी प्लेटफॉर्म के माध्यम से किए जाने वाले लेनदेन शामिल होने चाहिए।
नियमों में यह साफ होना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में भुगतान करने वाले व्यक्ति पर टीडीएस काटने की जिम्मेदारी होगी और किन मामलों में प्लेटफॉर्म या किसी अन्य मध्यस्थ की भूमिका बन सकती है। इस संबंध में जारी दिशा-निर्देश मौजूदा कानून के अनुरूप होने चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण कदम लेनदेन की रिपोर्टिंग व्यवस्था को बेहतर बनाना है। ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिससे क्रिप्टो ट्रांसफर, उसके बदले रुपये में किए गए भुगतान और काटे गए टीडीएस के रिकॉर्ड का आपस में मिलान किया जा सके।
तीसरा पहलू विदेशी प्लेटफॉर्मों से जुड़ा है। भारत को यह देखना होगा कि ऐसे प्लेटफॉर्मों के जरिए होने वाले लेनदेन की जानकारी हासिल करने के लिए दूसरे देशों के साथ मौजूदा सहयोग व्यवस्था कितनी प्रभावी है। जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
कानून और उसके अनुपालन के बीच की दूरी
P2P क्रिप्टो लेनदेन भारत के मौजूदा टैक्स ढांचे के सामने मौजूद एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक चुनौती को उजागर करते हैं। कानून में टीडीएस की व्यवस्था तय कर देना एक बात है, लेकिन यह सुनिश्चित करना दूसरी बात है कि हर संबंधित लेनदेन की पहचान हो, भुगतान का विवरण उपलब्ध रहे और निर्धारित व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पूरी करे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल विदेशी प्लेटफॉर्म से जुड़े होने या भुगतान का तरीका अलग होने के कारण P2P लेनदेन पर अतिरिक्त सख्ती की जाए। असल जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें भारतीय उपयोगकर्ताओं के क्रिप्टो लेनदेन पर लागू टैक्स और अनुपालन संबंधी जिम्मेदारियां स्पष्ट हों। चाहे लेनदेन किसी घरेलू एक्सचेंज पर किया जाए या विदेशी प्लेटफॉर्म के जरिए, नियमों के पालन की निगरानी प्रभावी होनी चाहिए।
आखिरकार, भारत के सामने चुनौती नए टैक्स प्रावधान बनाने से ज्यादा मौजूदा कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने की है। इसके लिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि टीडीएस कौन काटेगा, भुगतान कहां और किसे किया गया तथा लेनदेन से जुड़ी जानकारी किस तरह उपलब्ध कराई जाएगी। जब तक इन सवालों का व्यावहारिक समाधान नहीं निकलता, तब तक क्रिप्टो टैक्स नियमों और उनके वास्तविक अनुपालन के बीच अंतर बना रह सकता है।
