Thursday, 15 October 2026
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जब 71 सांसदों ने एक साथ दिया इस्तीफा, जानिए क्या है संसद में भूचाल लाने वाले ‘बोफोर्स घोटाले’ की कहानी

क्या था बोफोर्स घोटाला, जिसने राजीव गांधी सरकार को सबसे बड़े राजनीतिक संकट में डाल दिया? जानिए 71 सांसदों के सामूहिक इस्तीफे, जांच और चुनावी असर की पूरी कहानी।

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिन्होंने केवल सरकारों की दिशा नहीं बदली, बल्कि जनता के राजनीतिक विश्वास को भी गहराई से प्रभावित किया।

24 जुलाई 1989 ऐसा ही एक दिन था, जब 71 विपक्षी सांसदों ने एक साथ लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ अभूतपूर्व राजनीतिक संदेश दिया। संसद के इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक इस्तीफे की यह पहली घटना थी।

विपक्ष का आरोप था कि सरकार बोफोर्स तोप सौदे में कथित रिश्वतखोरी की निष्पक्ष जांच से बच रही है और संसद में जवाबदेही निभाने में असफल रही है।

इस सभी आरोपों के बावजूद राजीव गांधी ने उस समय प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया था। वे नवंबर 1989 के आम चुनाव तक पद पर बने रहे। बाद में कांग्रेस चुनाव हार गई और 2 दिसंबर 1989 को वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने।

क्या था बोफोर्स सौदा?

1980 के दशक के मध्य तक भारतीय सेना को ऐसी आधुनिक 155 मिमी हॉवित्जर (Howitzer) तोपों की आवश्यकता महसूस हो रही थी, जो लंबी दूरी तक अधिक सटीकता से गोले दाग सकें।

कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के बाद 24 मार्च 1986 को भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी AB Bofors के साथ लगभग 1,437 करोड़ रुपये (लगभग 1.4 अरब अमेरिकी डॉलर) का समझौता किया।

इस अनुबंध के तहत भारतीय सेना को 410 FH-77B 155 मिमी हॉवित्जर तोपें और उनसे जुड़ी तकनीक उपलब्ध कराई जानी थी। उस समय इसे भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा था।

दिलचस्प बात यह है कि बाद के वर्षों में 1999 के कारगिल युद्ध में इन्हीं बोफोर्स तोपों ने भारतीय सेना की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वीडिश रेडियो के खुलासे ने मचाया तूफान

16 अप्रैल 1987 को स्वीडन के सरकारी रेडियो Sveriges Radio ने एक रिपोर्ट प्रसारित की। रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत के बोफोर्स सौदे में कुछ भारतीय नेताओं, रक्षा बिचौलियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को गुप्त कमीशन (Kickbacks) दिया गया।

यहीं से वह विवाद शुरू हुआ जिसने अगले कई वर्षों तक भारतीय राजनीति को झकझोर कर रखा। शुरुआती दिनों में भारत सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन विपक्ष ने इसे गंभीर भ्रष्टाचार का मामला बताते हुए संसद से लेकर सड़कों तक आंदोलन शुरू कर दिया।

वी.पी. सिंह बने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का चेहरा

उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में से थे। वे पहले राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री और बाद में रक्षा मंत्री रह चुके थे।

सरकार से अलग होने के बाद वी.पी. सिंह ने बोफोर्स मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सौदे से जुड़े वास्तविक लाभार्थियों के नाम छिपा रही है। उनके नेतृत्व में जन मोर्चा और बाद में विपक्षी दलों ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनआंदोलन का रूप दे दिया।

धीरे-धीरे बोफोर्स केवल एक रक्षा सौदे का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही का राष्ट्रीय मुद्दा बन गया।

जब 71 सांसदों ने दे दिया इस्तीफा

लगातार विरोध, संसद में गतिरोध और जांच की मांग के बीच आज से ठीक 37 साल पहले, 24 जुलाई 1989 को विपक्ष ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया।

जनता दल, तेलुगु देशम पार्टी (TDP), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), असम गण परिषद (AGP) और कुछ अन्य विपक्षी दलों के 71 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को सामूहिक रूप से अपने इस्तीफे सौंप दिए।

उनका कहना था कि जब तक बोफोर्स मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होगी और सरकार जवाबदेह नहीं बनेगी, तब तक संसद में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। यह कदम तत्कालीन सरकार पर राजनीतिक और नैतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा था।

किन नेताओं ने निभाई प्रमुख भूमिका?

इस आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा वी.पी. सिंह थे। उनके साथ विपक्ष के कई बड़े नेता सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे।

इनमें प्रमुख रूप से—

  • वी.पी. सिंह
  • अरुण नेहरू
  • आरिफ मोहम्मद खान
  • एन.टी. रामाराव (तेलुगु देशम पार्टी के संस्थापक और विपक्षी गठबंधन के प्रमुख चेहरे)
  • जनता दल और अन्य विपक्षी दलों के अनेक सांसद

इन नेताओं ने बोफोर्स मुद्दे को चुनावी बहस का केंद्र बना दिया। विपक्ष का दावा था कि यदि सरकार निर्दोष है तो उसे स्वतंत्र जांच से डरना नहीं चाहिए।

संसद से सड़क तक छिड़ी राजनीतिक जंग

71 सांसदों के सामूहिक इस्तीफे ने तब की राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार पर जबरदस्त राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास किया। विपक्ष का आरोप था कि बोफोर्स सौदे में कथित रिश्वत लेने वालों के नाम सामने आने के बावजूद सरकार जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।

संसद का मानसून सत्र लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहा था। विपक्ष की मांग थी कि मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा सभी संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।

हालांकि कांग्रेस सरकार ने इन आरोपों को लगातार खारिज किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर कहा कि उनकी सरकार ने किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं किया है और बोफोर्स सौदा पूरी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया था। सरकार का यह भी कहना था कि विपक्ष बिना ठोस प्रमाणों के राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है।

CBI और अंतरराष्ट्रीय जांच

जनता के बढ़ते दबाव के बीच 22 जनवरी 1990 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बोफोर्स मामले में औपचारिक एफआईआर दर्ज की। तब तक केंद्र में वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) सरकार सत्ता में आ चुकी थी।

CBI ने स्वीडन, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और अन्य देशों की एजेंसियों से सहयोग मांगा। जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्विस बैंकों में कथित रूप से जमा धन और उससे जुड़े बैंक खातों तक पहुंचना था। इसके लिए भारत सरकार को वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

स्विट्जरलैंड की अदालतों में लंबी सुनवाई के बाद भारत को कई महत्वपूर्ण बैंक दस्तावेज मिले। इन दस्तावेजों के आधार पर जांच आगे बढ़ी और कथित बिचौलियों के वित्तीय लेनदेन की जांच की गई।

किन लोगों के नाम सामने आए?

जांच के दौरान कई भारतीय और विदेशी नागरिकों के नाम सामने आए। इनमें प्रमुख रूप से—

  • विन चड्ढा (Win Chadha) – भारत में बोफोर्स कंपनी के पूर्व प्रतिनिधि।
  • ओत्तावियो क्वात्रोच्ची (Ottavio Quattrocchi) – इतालवी कारोबारी, जिनके गांधी परिवार से निकट संबंध होने के आरोप विपक्ष लगाता रहा।
  • मार्टिन आर्डबो (Martin Ardbo) – बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन अध्यक्ष।
  • हिंदुजा बंधु (S.P., G.P. और Prakash Hinduja) – जिनके नाम बाद के वर्षों में आरोपपत्र में शामिल किए गए।

इन सभी मामलों में अलग-अलग समय पर जांच और अदालती कार्यवाही चली। हालांकि अधिकांश मामलों में या तो आरोप सिद्ध नहीं हो सके, या पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में कार्यवाही समाप्त हो गई।

राजीव गांधी के खिलाफ क्या स्थिति रही?

CBI ने 1999 में दाखिल आरोपपत्र में राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया था, लेकिन तब तक 21 मई 1991 को उनकी हत्या हो चुकी थी।

भारतीय कानून के अनुसार किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा आगे नहीं चलाया जा सकता। इसलिए उनके विरुद्ध कोई न्यायिक सुनवाई पूरी नहीं हुई और न ही किसी अदालत ने उन्हें बोफोर्स मामले में दोषी ठहराया।

इसी कारण यह कहना कि “राजीव गांधी बोफोर्स मामले में दोषी सिद्ध हुए थे” ऐतिहासिक और कानूनी दृष्टि से सही नहीं माना जाता।

केस से जुड़ी अदालती प्रक्रिया

बोफोर्स मामला भारत के सबसे लंबे समय तक चलने वाले कानूनी मामलों में शामिल रहा।

  • दिल्ली हाई कोर्ट ने 2004 में हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों को पर्याप्त साक्ष्य न होने के आधार पर खारिज कर दिया।
  • ओत्तावियो क्वात्रोच्ची के खिलाफ इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ, लेकिन वे भारत नहीं लाए जा सके।
  • 2007 में अर्जेंटीना में उनकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन भारत का प्रत्यर्पण अनुरोध सफल नहीं हो पाया।
  • बाद में उनके बैंक खातों को फ्रीज और डी-फ्रीज करने को लेकर भी विवाद हुआ।
  • आखिरकार 2011 में CBI ने क्वात्रोच्ची के खिलाफ कार्यवाही बंद करने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

करीब ढाई दशक तक चली जांच के बावजूद बोफोर्स मामले में किसी भी प्रमुख आरोपी के खिलाफ अंतिम आपराधिक दोषसिद्धि नहीं हो सकी।

1989 के चुनाव पर बोफोर्स का असर

बोफोर्स विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर 1989 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्ड 414 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया था, लेकिन महज पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

बोफोर्स मुद्दा चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा हथियार बन गया। विपक्ष ने इसे भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक बताया। हालांकि राजीव गांधी ने इन आरोपों को लगातार नकारा और कहा कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है, लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग पर इन आरोपों का असर पड़ा।

1989 के आम चुनाव में कांग्रेस 197 सीटों पर सिमट गई, जबकि जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सत्ता में आया और 2 दिसंबर 1989 को वी.पी. सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बोफोर्स विवाद उन प्रमुख कारणों में से एक था, जिसने कांग्रेस की लोकप्रियता को गहरा नुकसान पहुंचाया।

भारतीय राजनीति पर बोफोर्स का स्थायी प्रभाव

बोफोर्स कांड ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। इसके बाद रक्षा खरीद में पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय सौदों की निगरानी और संसदीय जवाबदेही पर अधिक जोर दिया जाने लगा।

इस घटना ने यह भी दिखाया कि मीडिया की खोजी पत्रकारिता और विपक्ष की राजनीतिक रणनीति किसी भी सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकती है। बाद के वर्षों में हवाला कांड, 2G स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, कोयला आवंटन और अगस्ता वेस्टलैंड जैसे मामलों की तुलना भी अक्सर बोफोर्स से की जाती रही।

आज भी भारतीय राजनीति में जब किसी बड़े रक्षा सौदे पर सवाल उठते हैं, तो सबसे पहले जिस मामले का नाम लिया जाता है, वह बोफोर्स ही है।

हालांकि तीन दशक से अधिक समय बाद भी बोफोर्स की पहचान केवल अदालतों के फैसलों से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक प्रभाव से अधिक याद की जाती है। इस प्रकरण ने राजीव गांधी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया, 1989 के चुनाव की दिशा बदल दी और भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के मुद्दे को स्थायी चुनावी विमर्श का हिस्सा बना दिया।

यही कारण है कि Bofors Scam आज भी भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित और सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विवादों में गिना जाता है।

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MD Faijan

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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