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World Sickle Cell Awareness Day: जब शरीर में मौजूद Red Blood Cells ही बन जाएं दुश्मन, जानें सिकल सेल रोग से जुड़ी सारी बातें

भारत समेत दुनिया के लाखों लोग सिकल सेल रोग से जूझ रहे हैं। विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस पर जानिए इस बीमारी का कारण और इसके बचाव के तरीके।

नई दिल्ली: किसी बच्चे का जन्म हो और जन्म के साथ ही उसके शरीर में ऐसी आनुवंशिक समस्या (Genetic Problem) मौजूद हो, जो उसे बार-बार असहनीय दर्द दे, खून की कमी पैदा करे, अंगों को नुकसान पहुंचाए और जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) तक को प्रभावित कर दे।

यह किसी दुर्लभ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि दुनिया भर में लाखों लोगों की हकीकत है। इसी बीमारी को Sickle Cell Disease कहा जाता है।

हर साल 19 जून को विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस (World Sickle Cell Awareness Day) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस Genetic Blood Disease के बारे में जागरूकता बढ़ाना, समय पर जांच को प्रोत्साहित करना और मरीजों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग को मजबूत करना है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने 2008 में Sickle Cell Disease को एक गंभीर वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या माना और 19 जून को इसके प्रति जागरूकता फैलाने के लिए समर्पित किया। पहला आधिकारिक विश्व सिकल सेल दिवस 2009 में मनाया गया।

आखिर क्या है सिकल सेल बिमारी?

Sickle Cell Disease एक वंशानुगत (Genetic) रक्त विकार है। यह तब होता है जब किसी व्यक्ति को माता और पिता दोनों से असामान्य हीमोग्लोबिन जीन विरासत में मिलते हैं।

सामान्य स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं (Red Blood Cells) गोल और लचीली होती हैं, जिससे वे रक्त वाहिकाओं में आसानी से बहती हैं। लेकिन सिकल सेल रोग में ये कोशिकाएं दरांती (Sickle) या चांद के आकार (Crescent “C” Shape) की हो जाती हैं।

उनका आकार असामान्य होने के कारण वे रक्त वाहिकाओं में फंस जाती हैं, जिससे शरीर के विभिन्न हिस्सों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है। यही कारण है कि मरीजों को तेज दर्द, एनीमिया, संक्रमण, स्ट्रोक, अंगों की क्षति और कई अन्य जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार सिकल सेल रोग दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण आनुवंशिक बीमारियों (Genetic Disorders) में से एक है। यह विशेष रूप से अफ्रीका, मध्य पूर्व, भूमध्यसागरीय क्षेत्रों और दक्षिण एशिया में अधिक पाया जाता है।

साल 2021 में वैश्विक स्तर पर लगभग 7.74 मिलियन लोग Sickle Cell Disease से पीड़ित थे, जिनमें 5 लाख 15 हजार नवजात शिशु शामिल थे। इस बीमारी का सबसे बड़ा केंद्र उप-सहारा अफ्रीका है, जहाँ दुनिया के करीब 80% मामले पाए जाते हैं।

यह बीमारी छोटे बच्चों के लिए बेहद जानलेवा है। साल 2021 में 5 वर्ष से कम उम्र के 81,100 बच्चों की मौत इसी कारण हुई, जिससे यह इस आयु वर्ग में मौत का 12वां सबसे बड़ा कारण बन गया है।

चिंता की बात यह है कि पारंपरिक रिकॉर्ड में इसके वास्तविक प्रभाव को काफी कम करके आंका जाता है। डेटा के अनुसार, सिकल-सेल से होने वाली वास्तविक मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 11 गुना अधिक हैं, जहाँ दर्ज की गई 34,400 मौतों के मुकाबले वास्तविक संख्या 3,76,000 थी।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि हर साल दुनिया में तीन लाख से अधिक बच्चे सिकल सेल से जुड़े विकारों के साथ जन्म लेते हैं। भारत भी उन देशों में शामिल है जहां इस बीमारी का बोझ काफी अधिक है।

भारत में स्थिति कितनी गंभीर?

पूरी दुनिया में Sickle Cell Disease का दूसरा सबसे बड़ा असर भारत में देखा जाता है। देश में स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ हर साल 15,000 से लेकर 25,000 तक ऐसे बच्चे पैदा होते हैं जो इस बीमारी से पीड़ित होते हैं।

भारत में सिकल सेल रोग विशेष रूप से आदिवासी समुदायों में अधिक पाया जाता है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, झारखंड, ओडिशा और कुछ अन्य राज्यों में इसके मामले अपेक्षाकृत ज्यादा हैं।

भारत सरकार का बड़ा लक्ष्य: 2047 तक उन्मूलन

सिकल सेल रोग की चुनौती को देखते हुए भारत सरकार ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। केंद्रीय बजट 2023-24 में सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (Sickle Cell Anemia Elimination Mission) की घोषणा की गई थी। इसका उद्देश्य 2047 तक इस बीमारी के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा में काम करना है।

मिशन के तहत प्रभावित क्षेत्रों में करोड़ों लोगों की स्क्रीनिंग, जागरूकता अभियान और जेनेटिक काउंसलिंग पर जोर दिया जा रहा है। विशेष ध्यान आदिवासी आबादी वाले इलाकों पर केंद्रित है।

बीमारी के प्रमुख लक्षण

सिकल सेल रोग के लक्षण हर मरीज में अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य संकेत इस प्रकार हैं:

  • बार-बार खून की कमी (एनीमिया)
  • असहनीय दर्द के दौरे
  • हाथों और पैरों में सूजन
  • बार-बार संक्रमण
  • कमजोरी और थकान
  • दृष्टि संबंधी समस्याएं
  • बच्चों में विकास की धीमी गति
  • सांस लेने में कठिनाई

WHO के अनुसार कई मरीजों को स्ट्रोक, किडनी की समस्या और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का भी सामना करना पड़ सकता है।

Pain Crisis इसका सबसे दर्दनाक पहलू

Sickle Cell Disease की सबसे गंभीर विशेषताओं में से एक है “Pain Crisis” यानी दर्द का संकट।

जब असामान्य रक्त कोशिकाएं छोटी रक्त वाहिकाओं में फंस जाती हैं, तो शरीर के किसी हिस्से में रक्त प्रवाह रुक सकता है। इससे अचानक तेज दर्द शुरू हो जाता है, जो कई घंटों या कई दिनों तक रह सकता है।

कई मरीजों के लिए यही बीमारी का सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू होता है।

क्या इसका इलाज संभव है?

वर्तमान में सिकल सेल रोग का पूर्ण इलाज सीमित मामलों में ही संभव है।

विशेषज्ञों के अनुसार बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant) या स्टेम सेल ट्रांसप्लांट कुछ मरीजों में स्थायी उपचार प्रदान कर सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया महंगी, जटिल और सभी के लिए उपलब्ध नहीं होती।

इसके अलावा मरीजों को कई तरह की दवाएं, रक्त चढ़ाना (Blood Transfusion), संक्रमण नियंत्रण और नियमित चिकित्सा निगरानी की आवश्यकता पड़ सकती है।

क्यों जरूरी है समय पर स्क्रीनिंग?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि Sickle Cell Disease की रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका समय पर स्क्रीनिंग है।

यदि किसी व्यक्ति को यह पता चल जाए कि वह सिकल सेल जीन का वाहक है, तो विवाह और परिवार नियोजन के दौरान सही निर्णय लिए जा सकते हैं। कई विशेषज्ञ प्री-मैरिटल स्क्रीनिंग और एंटीनेटल स्क्रीनिंग (गर्भावस्था के दौरान जांच) को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं।

झारखंड, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में चिकित्सक गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में प्रभावित बच्चों की संख्या कम की जा सके।

सिकल सेल ट्रेट और सिकल सेल रोग में अंतर

बहुत से लोग इन दोनों स्थितियों को एक जैसा समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है।

सिकल सेल ट्रेट (Trait) का अर्थ है कि व्यक्ति के पास केवल एक असामान्य जीन है। ऐसे लोग अक्सर सामान्य जीवन जीते हैं और उनमें गंभीर लक्षण नहीं होते।

लेकिन यदि माता-पिता दोनों सिकल सेल जीन के वाहक हों, तो बच्चे में सिकल सेल रोग विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए जेनेटिक जांच और काउंसलिंग बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

SCD की सामाजिक चुनौतियां

बीमारी केवल शारीरिक समस्या नहीं है। इससे जुड़े सामाजिक और मानसिक प्रभाव भी गंभीर होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई मरीजों को भेदभाव, गलतफहमियों और सामाजिक कलंक (Stigma) का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि डॉक्टर और स्वास्थ्य संगठन लोगों से इस बीमारी पर खुलकर बात करने की अपील कर रहे हैं।

जागरूकता की कमी के कारण कई परिवार समय पर इलाज नहीं करा पाते और मरीज अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करते हैं।

2026 की थीम क्या है?

इस वर्ष विश्व सिकल सेल दिवस के मौके पर वैश्विक स्तर पर “Closing the Survival Gap: Equity in Sickle Cell Disease” विषय पर जोर दिया जा रहा है। इसका मुख्य संदेश यह है कि दुनिया के सभी मरीजों को समान स्वास्थ्य सुविधाएं और उपचार उपलब्ध होने चाहिए, चाहे वे किसी भी देश, क्षेत्र या आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हों।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दिया संदेश

अंतरराष्ट्रीय सिकल सेल दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विश्वास जताया कि भारत 2047 के निर्धारित लक्ष्य से पहले ही सिकल सेल रोग पर प्रभावी नियंत्रण हासिल कर सकता है।

उन्होंने कहा कि इस दिशा में सरकार और समाज के संयुक्त प्रयास लगातार सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं। राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत चल रहे स्क्रीनिंग अभियान को दुनिया के सबसे बड़े Genetic Disorder जांच कार्यक्रमों में से एक बताया।

उनके अनुसार, अब तक नवजात शिशुओं से लेकर 40 वर्ष तक की आयु के करीब 7 करोड़ लोगों की जांच की जा चुकी है। उन्होंने विशेष रूप से आदिवासी समुदायों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं क्षेत्रों में देखा जाता है, इसलिए जागरूकता और समय पर जांच बेहद जरूरी है।

जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार

विशेषज्ञ भी मानते हैं कि Sickle Cell Disease के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामुदायिक स्तर पर जागरूकता, स्कूलों और कॉलेजों में स्क्रीनिंग, विवाह पूर्व जांच, गर्भावस्था के दौरान परीक्षण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है।

भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी अभी भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी से वंचित है, वहां जागरूकता अभियान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

ये भी पढ़ें :- Stockholm Syndrome: जब बंधक को ही होने लगे किडनैपर से लगाव, जानिए क्या है स्टॉकहोम सिंड्रोम और इसके लक्षण

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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