उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में अब बिना अनुमति फोटो-वीडियो नहीं बना सकेंगे YouTubers, जानिए क्यों लगी रोक और इससे स्कूलों की कमियां सामने आने को लेकर क्या बहस शुरू हुई है।
अयोध्या/ बलरामपुर: उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूल इन दिनों सिर्फ पढ़ाई को लेकर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर सामने आ रही तस्वीरों और वीडियो को लेकर भी चर्चा में हैं। कहीं बच्चे शिक्षकों की कमी की शिकायत लेकर सड़क पर उतर रहे हैं, कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क की मांग हो रही है और कहीं सरकारी स्कूलों की बदहाल सुविधाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इसी बीच राज्य के कई जिलों में स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की बिना अनुमति एंट्री पर रोक लगाने के आदेश सामने आए हैं।
अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा विभाग ने 19 अगस्त को आदेश जारी कर परिषदीय स्कूलों में बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों के प्रवेश को पूर्व अनुमति के बिना प्रतिबंधित कर दिया। इसके साथ ही स्कूल परिसर में फोटो और वीडियो बनाने पर भी रोक लगाई गई है। इससे पहले बलरामपुर और बलिया में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
अधिकारियों का कहना है कि अनधिकृत तरीके से स्कूलों में प्रवेश और शूटिंग से पढ़ाई प्रभावित हो रही है तथा शिक्षकों की गरिमा और विभाग की छवि पर असर पड़ रहा है।
अयोध्या में जारी हुआ आदेश
अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी लाल चंद की ओर से बुधवार, 19 अगस्त को जारी आदेश में कहा गया कि परिषदीय स्कूलों में बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना प्रवेश नहीं दिया जाएगा। स्कूल परिसर में फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए भी पहले अनुमति लेना जरूरी होगा।
विभाग के अनुसार, कुछ बाहरी लोग स्कूलों में प्रवेश कर शिक्षकों और स्कूल की गतिविधियों की तस्वीरें और वीडियो बना रहे थे और बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे। अधिकारियों का कहना है कि ऐसी गतिविधियों से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और शिक्षक समुदाय की गरिमा पर भी असर पड़ सकता है। आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
अयोध्या में जारी निर्देश में यह भी कहा गया है कि स्कूलों के निरीक्षण और निगरानी के लिए सरकार तथा प्रशासन की ओर से पहले से अधिकारी नियुक्त हैं। यानी विभाग का तर्क है कि स्कूलों की जांच और कमियों की निगरानी के लिए एक आधिकारिक व्यवस्था मौजूद है।
बलरामपुर में भी लगी रोक
अयोध्या से पहले बलरामपुर जिले में भी बेसिक शिक्षा विभाग ने इसी तरह का कदम उठाया था। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विकास चंद्र श्रीवास्तव ने 17 अगस्त को आदेश जारी कर अनधिकृत बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश पर रोक लगाई।
आदेश में कहा गया कि कुछ लोग बिना अनुमति परिषद के स्कूलों में पहुंच रहे थे और स्कूलों तथा कर्मचारियों की तस्वीरें और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे थे। विभाग के मुताबिक इससे पढ़ाई प्रभावित होने के साथ-साथ शिक्षकों की गरिमा और विभाग की छवि पर असर पड़ रहा था।
बलरामपुर के आदेश में छात्रों की सुरक्षा और हितों को भी प्रतिबंध का आधार बताया गया। शिक्षकों को निर्देश दिया गया कि वे बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति किसी बाहरी व्यक्ति, YouTuber या सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्ति को फोटो या वीडियो बनाने के लिए स्कूल में प्रवेश न दें। हालांकि, स्कूलों का निरीक्षण करने वाले अधिकृत अधिकारियों को विजिटर रजिस्टर में अपनी उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था रखी गई है।
बलिया में भी पहले जारी हो चुका है निर्देश
बलिया में यह प्रक्रिया इससे भी पहले शुरू हो चुकी थी। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष सिंह के मुताबिक, 7 अगस्त को जारी आदेश में सरकारी और सहायता प्राप्त बेसिक शिक्षा स्कूलों में अनधिकृत बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। बिना अनुमति फोटो या वीडियो बनाने की भी इजाजत नहीं थी।
प्रशासन ने कहा था कि इस कदम का उद्देश्य पढ़ाई में बाधा को रोकना और शिक्षण पेशे की गरिमा बनाए रखना है। बीएसए ने यह भी स्पष्ट किया था कि अधिकृत मीडिया प्रतिनिधि संबंधित अधिकारी या खंड शिक्षा अधिकारी से संपर्क करके अनुमति के बाद स्कूलों का दौरा कर सकते हैं।
बलिया में आदेश के पीछे एक स्थानीय घटना का भी उल्लेख किया गया। जिले के बैरिया क्षेत्र में एक सोशल मीडिया चैनल ने कथित तौर पर एक शिक्षक के देर से स्कूल पहुंचने का वीडियो साझा किया था। इसके बाद प्रशासन ने अनधिकृत तरीके से स्कूलों में प्रवेश और रिकॉर्डिंग को लेकर सख्ती दिखाई।
सरकार के इस कदम की वजह
सरकारी विभागों का मुख्य तर्क है कि स्कूल पढ़ाई के लिए होते हैं और बिना अनुमति कैमरा लेकर पहुंचने वाले लोग कक्षाओं तथा स्कूल की नियमित गतिविधियों में बाधा डाल सकते हैं।
स्कूल परिसर में लगातार वीडियो बनाना शिक्षकों और छात्रों के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। खासकर छोटे बच्चों से जुड़े मामलों में उनकी निजता और सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी बच्चे की तस्वीर या वीडियो सोशल मीडिया पर किस संदर्भ में इस्तेमाल होगा और वह कितने लोगों तक पहुंचेगा, इसे स्कूल प्रशासन नियंत्रित नहीं कर सकता।
इसके अलावा, किसी शिक्षक या कर्मचारी का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डालने से पहले उसका पूरा संदर्भ सामने न आने की स्थिति में भी विवाद पैदा हो सकता है। विभाग का कहना है कि शिकायतों और स्कूलों की कमियों की जांच के लिए प्रशासनिक तंत्र मौजूद है।
लेकिन दूसरी ओर, यही तर्क इस सवाल को भी जन्म देता है कि अगर विभागीय निगरानी पर्याप्त है तो सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए स्वतंत्र सामाजिक निगरानी की भूमिका क्या होगी?
सोशल मीडिया पर वायरल होती स्कूल की तस्वीरें
इन आदेशों का समय भी महत्वपूर्ण है। अगस्त 2026 में उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में सरकारी स्कूलों से जुड़ी शिकायतों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आए। बच्चों ने खुद शिक्षक की कमी, खराब भोजन, पेयजल और स्कूल तक पहुंचने जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर आवाज उठाई।
हमीरपुर में स्कूली बच्चे और उनके परिजन स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर जिला प्रशासन के कार्यालय तक पहुंचे। बच्चों ने तिरंगा लेकर प्रदर्शन किया और बताया कि बारिश के दौरान खराब रास्ते के कारण स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इस प्रदर्शन के वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए।
इसी तरह 14 अगस्त को लखनऊ के जय प्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के छात्रों ने शिक्षकों की कमी और स्कूल से जुड़ी अन्य समस्याओं को लेकर सड़क पर प्रदर्शन किया। पुलिस के मुताबिक छात्रों ने शिक्षकों की कमी को अपनी पढ़ाई प्रभावित होने की वजह बताया। उत्तर प्रदेश के मंत्री असीम अरुण भी मौके पर पहुंचे और छात्रों की शिकायतें सुनीं।
उन्नाव में भी छात्रों ने शिक्षकों की कमी और मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन किया। इन घटनाओं ने सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और निगरानी से जुड़े सवालों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का प्रभाव
इसी दौर में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 15 अगस्त से ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। इस अभियान का उद्देश्य गांवों के सरकारी स्कूलों की स्थिति को सामने लाना और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सवाल उठाना है।
अभियान की घोषणा से पहले दीपके ने हमीरपुर में स्कूल तक पक्की सड़क की मांग कर रहे बच्चों के प्रदर्शन का समर्थन भी किया था। उन्होंने कहा था कि ग्रामीण बच्चों को आजादी के इतने वर्षों बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए।
15 अगस्त के बाद इस अभियान के तहत अलग-अलग राज्यों में सरकारी स्कूलों की स्थिति को दस्तावेज करने की कोशिशें भी सामने आईं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अभियान से जुड़े स्वयंसेवकों ने स्कूलों में शौचालय, पेयजल, शिक्षक और बुनियादी ढांचे जैसी समस्याओं को रिकॉर्ड करने का दावा किया।
शिक्षा विशेषज्ञों ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
बलरामपुर के आदेश के बाद शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के पूर्व डीन राजेश कुमार सिंह ने इसे कठोर कदम बताते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों की स्थिति जानने के लिए सार्वजनिक निगरानी जरूरी है। उनके मुताबिक, अगर आम लोगों को स्कूलों में जाने से रोका जाएगा तो वे कैसे पता लगाएंगे कि बच्चों को सही शिक्षा मिल रही है या उन्हें गुणवत्तापूर्ण मध्यान्ह भोजन मिल रहा है।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष अरविंद कुमार द्विवेदी ने भी सार्वजनिक निगरानी को जरूरी बताया। उनका तर्क था कि इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि शिक्षक नियमित रूप से स्कूल आ रहे हैं या नहीं, बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं और स्कूल की इमारत सुरक्षित है या नहीं।
उनका कहना था कि सरकार और प्रशासन में अधिक पारदर्शिता से लोगों का भरोसा बढ़ सकता है। यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूलों में जनता की निगरानी और विभागीय निगरानी के बीच संतुलन इस पूरे विवाद का केंद्रीय मुद्दा बन गया है।
सोशल मीडिया पर स्कूलों की कमियां दिखाना निगरानी या दखल?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की भूमिका को किस नजरिए से देखा जाए।
एक तरफ ऐसे लोग हैं जो बिना किसी औपचारिक अधिकार के स्कूलों में पहुंचकर वीडियो बनाते हैं, शिक्षकों से सवाल करते हैं और फिर कुछ मिनट के वीडियो के आधार पर पूरे स्कूल या विभाग पर टिप्पणी कर देते हैं। इससे गलत जानकारी, अधूरी तस्वीर या सनसनीखेज प्रस्तुति का खतरा बना रहता है।
दूसरी तरफ सोशल मीडिया ने कई ऐसे मुद्दों को भी सामने लाने का काम किया है, जो लंबे समय से स्थानीय स्तर पर मौजूद थे लेकिन व्यापक चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाए थे। किसी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, शौचालय बंद है, बच्चों को साफ पानी नहीं मिल रहा या स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है। ऐसी समस्याओं की तस्वीर या वीडियो कई बार प्रशासन का ध्यान तेजी से खींच सकता है।
यही वजह है कि इस पूरे विवाद को केवल ‘YouTubers बनाम सरकार’ के रूप में देखना आसान समाधान नहीं होगा। असल चुनौती यह तय करने की है कि स्कूलों की निगरानी कैसे हो, बच्चों की निजता कैसे सुरक्षित रहे और अनियमितताओं की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से सामने आती रहे।
क्या पत्रकारों और अभिभावकों पर भी गिरेगी गाज?
इन आदेशों में मुख्य जोर अनधिकृत बाहरी लोगों और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों पर है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर बाहरी व्यक्ति या हर पत्रकार के लिए स्कूल के दरवाजे स्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं।
बलिया के बीएसए मनीष सिंह ने स्पष्ट किया था कि अधिकृत मीडिया प्रतिनिधि संबंधित अधिकारी या खंड शिक्षा अधिकारी से संपर्क करके अनुमति लेकर स्कूल जा सकते हैं।
बलरामपुर में भी सामाजिक कार्यकर्ता देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि ऐसे बाहरी लोगों को रोकना उचित हो सकता है जिनकी मौजूदगी पढ़ाई में बाधा डालती है, लेकिन अभिभावकों को स्कूल आने से नहीं रोका जाना चाहिए। उन्होंने नियमित रूप से अभिभावक-शिक्षक बैठकों की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।
इसलिए मौजूदा आदेशों का मूल फोकस बिना अनुमति प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर है, न कि स्कूल और समाज के बीच हर तरह के संपर्क को खत्म करना।
क्या सरकार के पास निगरानी के पर्याप्त साधन मौजूद?
यही सवाल अब सबसे महत्वपूर्ण बनकर सामने आ रहा है। विभाग का कहना है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर अधिकारियों को स्कूलों के निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी पहले से दी गई है। अयोध्या और बलरामपुर दोनों के आदेशों में इसी व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
लेकिन सरकारी निरीक्षण और स्वतंत्र सामाजिक निगरानी दोनों की प्रकृति अलग होती है। सरकारी अधिकारी नियमों के तहत निरीक्षण करते हैं, जबकि अभिभावक, स्थानीय समुदाय और पत्रकार स्कूलों की स्थिति को अपने अनुभव और दृष्टिकोण से सामने ला सकते हैं।
ऐसे में बेहतर व्यवस्था यह हो सकती है कि बिना अनुमति किसी को स्कूल में प्रवेश और शूटिंग की अनुमति न हो, लेकिन शिकायत, निरीक्षण और मीडिया कवरेज के लिए स्पष्ट और पारदर्शी अनुमति प्रक्रिया मौजूद हो। इससे स्कूल की सुरक्षा और पढ़ाई भी प्रभावित नहीं होगी और सार्वजनिक जवाबदेही भी बनी रहेगी।
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