Thursday, 10 September 2026
ब्रेकिंग न्यूज़
Colonel Sanders Birthday: 40 की उम्र में रोडसाइड सर्विस स्टेशन चलाने वाला व्यक्ति कैसे बना KFC का संस्थापक? UK-Israel Tension: ब्रिटेन ने वेस्ट बैंक की इजरायली बस्तियों से आने वाले सामान पर लगाया प्रतिबंध, 12 देशों का बढ़ता दबाव और इजरायल की जवाबी कार्रवाई Amitabh Bachchan KBC 18: ‘बिग बी’ ने दिए ‘रिटायरमेंट’ के संकेत? कहा- KBC होस्ट करना हो रहा है मुश्किल…! पाकिस्तान क्रिकेट पर फिर मंडराया फिक्सिंग का साया! खिलाड़ियों के फोन हुए जब्त, जानिए पाक क्रिकेट में फिक्सिंग से जुड़े 7 बड़े मामले PNB के करेंसी चेस्ट में ₹17.29 करोड़ की नकली करेंसी! NIA ने बैंक मैनेजर को किया गिरफ्तार, नेपाल कनेक्शन ने बढ़ाई चिंता बिहार-यूएई साझेदारी से फूड प्रोसेसिंग और निवेश को मिलेगी नई गति नई Tata Sierra EV बताकर ग्राहक को दी कार, ओडोमीटर पर दिखी 900 किमी रनिंग; 80 किमी बाद हुई बंद, रिफंड की मांग ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया एल्गोरिदम पर शिकंजा, अब यूजर्स तय करेंगे क्या देखना है! नियम न मानने पर कंपनियों को देना होगा भारी जुर्माना Colonel Sanders Birthday: 40 की उम्र में रोडसाइड सर्विस स्टेशन चलाने वाला व्यक्ति कैसे बना KFC का संस्थापक? UK-Israel Tension: ब्रिटेन ने वेस्ट बैंक की इजरायली बस्तियों से आने वाले सामान पर लगाया प्रतिबंध, 12 देशों का बढ़ता दबाव और इजरायल की जवाबी कार्रवाई Amitabh Bachchan KBC 18: ‘बिग बी’ ने दिए ‘रिटायरमेंट’ के संकेत? कहा- KBC होस्ट करना हो रहा है मुश्किल…! पाकिस्तान क्रिकेट पर फिर मंडराया फिक्सिंग का साया! खिलाड़ियों के फोन हुए जब्त, जानिए पाक क्रिकेट में फिक्सिंग से जुड़े 7 बड़े मामले PNB के करेंसी चेस्ट में ₹17.29 करोड़ की नकली करेंसी! NIA ने बैंक मैनेजर को किया गिरफ्तार, नेपाल कनेक्शन ने बढ़ाई चिंता बिहार-यूएई साझेदारी से फूड प्रोसेसिंग और निवेश को मिलेगी नई गति नई Tata Sierra EV बताकर ग्राहक को दी कार, ओडोमीटर पर दिखी 900 किमी रनिंग; 80 किमी बाद हुई बंद, रिफंड की मांग ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया एल्गोरिदम पर शिकंजा, अब यूजर्स तय करेंगे क्या देखना है! नियम न मानने पर कंपनियों को देना होगा भारी जुर्माना

Colonel Sanders Birthday: 40 की उम्र में रोडसाइड सर्विस स्टेशन चलाने वाला व्यक्ति कैसे बना KFC का संस्थापक?

एक रेसिपी, कार और अमेरिका की सड़कों पर घूमता 65 साल का कारोबारी – यही थी KFC की शुरुआत। जानिए कैसे कर्नल सैंडर्स ने फ्रेंचाइजी मॉडल से अपना चिकन बिजनेस खड़ा किया।

हेनरीविले, इंडियाना: आज अगर दुनिया के किसी भी हिस्से में सफेद सूट, काली टाई, सफेद दाढ़ी और हाथ में छड़ी लिए एक बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर दिखाई दे, तो उसे पहचानने में शायद ही किसी को देर लगे। यह चेहरा किसी अभिनेता या राजनेता का नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे पहचानने योग्य फूड चेन में से एक KFC की पहचान बन चुके कर्नल हारलैंड सैंडर्स का है।

लेकिन इस चेहरे के पीछे की कहानी सिर्फ चिकन की एक रेसिपी और एक सफल कारोबार की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर कई नौकरियां कीं, कई बार असफल हुआ, कारोबार गंवाया और यहां तक कि 65 साल की उम्र में लगभग फिर से शून्य पर पहुंच गया। इसके बाद भी उसने हार नहीं मानी और अपनी रेसिपी लेकर अमेरिका की सड़कों पर निकल पड़ा।

आज KFC दुनिया के सबसे बड़े क्विक-सर्विस रेस्टोरेंट ब्रांड्स में शामिल है। कंपनी की आधिकारिक हिस्ट्री के मुताबिक KFC के अब 150 देशों में 30,000 से ज्यादा रेस्तरां हैं। लेकिन इसकी शुरुआत किसी बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस से नहीं, बल्कि Kentucky के एक छोटे से रोडसाइड रेस्तरां से हुई थी।

9 सितंबर 1890 को इंडीआना के हेनरीविले के पास जन्मे हारलैंड डेविड सैंडर्स ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनका चेहरा एक दिन दुनिया भर में फ्राइड चिकन की पहचान बन जाएगा।

बचपन में ही शुरू हुआ संघर्ष

हारलैंड सैंडर्स का बचपन आर्थिक रूप से आसान नहीं था। उनके पिता की मृत्यु तब हो गई थी जब सैंडर्स सिर्फ पांच साल के थे। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा।

सैंडर्स ने जिंदगी में एक के बाद एक कई काम किए। उन्होंने फार्म हैंड से लेकर स्ट्रिटकार कंडक्टर, रेल कर्मचारी, लोकोमोटिव फायरमैन, बीमा विक्रेता तक के रूप में काम किया। उन्होंने कानून भी खुद पढ़ा और कुछ समय तक वकील के तौर पर काम भी किया। इसके अलावा उन्होंने फैरीबोट ऑपरेटर और दूसरे छोटे कारोबार भी आजमाए।

यानी KFC की कहानी शुरू होने से पहले सैंडर्स के जीवन में कोई सीधी सफलता की रेखा नहीं थी। नौकरी मिली और छूट गई, कारोबार शुरू किया तो चला नहीं, पैसे अधिक समय तक टिके नहीं। लेकिन इस लगातार अस्थिरता ने सैंडर्स को एक चीज जरूर सिखाई, “अगर एक रास्ता बंद हो जाए तो अगला रास्ता तलाशना जरूरी है”।

40 की उम्र में शुरू हुआ असली मोड़

सैंडर्स की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वह Kentucky के Corbin इलाके में एक रोडसाइड सर्विस स्टेशन चला रहे थे।

यह 1930 के आसपास की बात है। यहां आने वाले यात्रियों को सैंडर्स पेट्रोल और दूसरी सेवाएं देते थे। लेकिन एक दिन यात्रियों की खाने को लेकर शिकायत ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

यात्रियों को आसपास अच्छा खाना नहीं मिल रहा था। सैंडर्स ने सोचा कि खाना बनाना वह अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने अपने सर्विस स्टेशन के एक छोटे से हिस्से में खाना बनाना शुरू किया। वहां वह कंट्री हैम, मैश किए हुए आलू, बिस्कुट, फ्राइड चिकन परोसने लगे।

धीरे-धीरे उनकी फ्राइड चिकन की चर्चा बढ़ने लगी। यहीं से वह कारोबार जन्म ले रहा था जिसे आगे चलकर Kentucky Fried Chicken यानी KFC के नाम से जाना गया।

चिकन में स्वाद के साथ तेजी भी

सैंडर्स की सबसे बड़ी चुनौती फ्राइड चिकन को जल्दी तैयार करने की थी।

उस समय पारंपरिक तरीके से चिकन तलने में काफी समय लगता था। यात्रियों के लिए यह परेशानी थी क्योंकि वे सड़क पर सफर कर रहे थे और उन्हें ज्यादा देर इंतजार नहीं करना था।

ऐसे में सैंडर्स ने प्रेशर कूकर तकनीक का इस्तेमाल करके चिकन पकाने का तरीका विकसित किया। इससे चिकन अपेक्षाकृत तेजी से तैयार होने लगा और उसकी निरंतरता भी बनी रही।

इसके साथ उन्होंने मसालों के मिश्रण पर लगातार प्रयोग किए। आखिरकार उनकी पहचान बनी 11 जड़ी-बूटियाँ और मसाले वाली सीक्रेट रेसिपी।

1935 में मिला ‘कर्नल’ का खिताब

सैंडर्स को 1935 में Kentucky के तत्कालीन गवर्नर रूबी लाफून ने ऑनररी टाइटल केंटकी कर्नल प्रदान किया।

यह सैन्य पद नहीं था, बल्कि Kentucky राज्य की ओर से दिया जाने वाला सम्मान था। आगे चलकर सैंडर्स ने इसी उपाधि को अपनी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना लिया।

धीरे-धीरे उनकी सफेद सूट, ब्लैक स्ट्रिंग टाई, गोटी, सदर्न जेंटलमैन वाली छवि उनके ब्रांड का हिस्सा बन गई।

यहां सैंडर्स ने एक महत्वपूर्ण बात साबित की। कभी-कभी किसी उत्पाद को यादगार बनाने के लिए सिर्फ उत्पाद काफी नहीं होता, उसके पीछे एक चेहरा और कहानी भी चाहिए।

सफलता के बीच आया बड़ा झटका

सैंडर्स का रेस्तरां अच्छा चल रहा था। उनकी पहचान बढ़ रही थी। 1939 तक उनकी चिकन रेसिपी और रेस्तरां की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि भोजन और यात्रा लेखक डंकन हाइन्स ने भी सैंडर्स कैफे की तारीफ की थी।

लेकिन जब लगा कि अब सैंडर्स सफलता की स्थायी राह पर पहुंच गए हैं, तभी परिस्थितियां बदल गईं। 1950 के दशक में अमेरिका की सड़क व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। कॉर्बिन के पास से गुजरने वाले पुराने राजमार्ग का रास्ता बदल दिया गया और यातायात नए अंतरराज्यीय मार्ग की ओर चला गया।

इसका सीधा असर सैंडर्स के रेस्तरां पर पड़ा। जो जगह कभी यात्रियों से भरी रहती थी, वहां ग्राहकों की संख्या कम होने लगी। और फिर वह हुआ जिसकी शायद सैंडर्स ने कल्पना नहीं की थी।

65 साल की उम्र में बेचनी पड़ी रेस्तरां

1956 में उन्होंने अपना संघर्ष कर रहा रेस्तरां नीलामी में बेच दिया। यह बिक्री करीब 75 हजार डॉलर में हुई थी। उस समय के लिहाज से यह सैंडर्स के लिए बड़ा आर्थिक झटका था।

यह वह उम्र थी जब ज्यादातर लोग सेवानिवृत्ति के बारे में सोचते हैं। लेकिन सैंडर्स के सामने फिर से अपना भविष्य बनाने की चुनौती थी। और यहीं से उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अध्याय शुरू हुआ।

सैंडर्स के पास अब कोई बड़ा रेस्तरां कारोबार नहीं था। लेकिन उनके पास एक चीज थी। एक ऐसी चिकन रेसिपी जिसे लोग पसंद करते थे।

1952 में सैंडर्स ने साल्ट लेक सिटी के कारोबारी पीट हरमन के साथ मिलकर पहली केएफसी फ्रेंचाइजी शुरू की थी। हरमन ने सैंडर्स की रेसिपी और चिकन पकाने की तकनीक को अपने रेस्तरां में इस्तेमाल किया। यहीं से फ्रेंचाइजी मॉडल का रास्ता खुला।

अब सैंडर्स ने तय किया कि उन्हें खुद हर जगह रेस्तरां खोलने की जरूरत नहीं है। वह दूसरे रेस्तरां मालिकों को अपनी रेसिपी और खाना पकाने की प्रक्रिया देंगे और बदले में फ्रेंचाइजी समझौते के तहत कमाई करेंगे।

यह फैसला KFC की सबसे बड़ी कारोबारी उपलब्धियों में से एक साबित हुआ।

कार में रेसिपी लेकर घूमते थे सैंडर्स

अपना रेस्तरां गंवाने के बाद सैंडर्स ने हार मानने के बजाय अमेरिका की सड़कों पर निकलना शुरू कर दिया। वह छोटे रेस्तरां मालिकों से मिलते। उन्हें अपनी रेसिपी से चिकन बनाकर खिलाते। फिर उन्हें फ्रेंचाइजी समझौते के लिए तैयार करने की कोशिश करते।

रिपोर्टों के मुताबिक सैंडर्स कई बार अपनी कार में सोते थे और अपने साथ प्रेशर कुकर तथा मसालों का मिश्रण रखते थे। वह एक रेस्तरां से दूसरे रेस्तरां तक घूमकर अपने उत्पाद का प्रदर्शन करते थे।

आज किसी नए कारोबारी के लिए यह तरीका असामान्य लग सकता है, लेकिन उस समय यही सैंडर्स की पूरी कारोबार रणनीति थी।

उन्होंने बड़े निवेशकों का इंतजार नहीं किया। उन्होंने सीधे उन छोटे कारोबारियों को अपना लक्ष्य बनाया, जो अपनी दुकान में ऐसा उत्पाद जोड़ना चाहते थे, जिससे उनकी बिक्री बढ़ सके। यहीं से केएफसी का फ्रेंचाइजी नेटवर्क तेजी से बढ़ने लगा।

KFC नाम और बकेट की दिलचस्प कहानी

KFC की पहचान सिर्फ कर्नल सैंडर्स के चेहरे से नहीं बनी। पहली फ्रेंचाइजी के दौर में पीट हरमन ने ब्रांड को एक जैसी पहचान वाले रेस्तरां और घर ले जाकर खाने की व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

हरमन से जुड़ी नई पहलों में बकेट की शुरुआत और “फिंगर लिकिन गुड” जैसी ब्रांड पहचान का विकास भी शामिल था। सैंडर्स के साथ हरमन की साझेदारी ने KFC के शुरुआती विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1957 में KFC बकेट की शुरुआत हुई। कंपनी के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक शुरुआती बकेट में 14 पीस चिकन के साथ रोल और ग्रेवी शामिल थे। आगे चलकर यह बकेट दुनिया भर में केएफसी की पहचान बन गया।

75 साल की उम्र में बेच दी केएफसी

1964 में सैंडर्स ने KF  को निवेशकों के एक समूह को लगभग 20 लाख डॉलर में बेच दिया। लेकिन कंपनी बेचने का मतलब यह नहीं था कि कर्नल सैंडर्स की भूमिका खत्म हो गई। उनका चेहरा और उनकी शख्सियत केएफसी की ब्रांड पहचान का हिस्सा बन चुकी थी।

KFC का स्वामित्व बदल गया, लेकिन सैंडर्स लंबे समय तक कंपनी का सार्वजनिक चेहरा बने रहे। सफेद सूट पहनकर वह रेस्तरां का दौरा करते थे। विज्ञापनों में दिखाई देते थे और KFC के ब्रांड प्रतिनिधि की तरह लोगों के सामने रहते थे।

इससे KFC को एक ऐसा चेहरा मिला जिसे ग्राहक सीधे उसके उत्पाद से जोड़ सकते थे।

90 की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

हारलैंड सैंडर्स का निधन 16 दिसंबर 1980 को 90 वर्ष की उम्र में हुआ। लेकिन उनकी मृत्यु के साथ कर्नल सैंडर्स की कहानी खत्म नहीं हुई।

उनका चेहरा KFC के प्रतीक चिन्ह और ब्रांड पहचान में बना रहा। आज भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में KFC का नाम आते ही कर्नल सैंडर्स की तस्वीर लोगों के दिमाग में आ जाती है।

KFC की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक आज यह यम ब्रांड्स का हिस्सा है और दुनिया भर में 30 हजार से ज्यादा रेस्तरां के साथ इसका व्यापक वैश्विक कारोबार है। यानी जिस व्यक्ति ने एक छोटे सड़क किनारे के कारोबार में खाना बनाकर शुरुआत की थी, उसकी बनाई पहचान एक वैश्विक खाद्य ब्रांड में बदल चुकी है।

कर्नल सैंडर्स की कहानी से क्या सीख मिलती है?

सैंडर्स की जिंदगी को सिर्फ “एक सफल कारोबारी की कहानी” कहना शायद उनकी सबसे बड़ी खासियत को नजरअंदाज करना होगा। उनकी कहानी की असली ताकत सही समय से ज्यादा लगातार कोशिश करते रहने में थी।

उन्होंने 20 या 30 की उम्र में KFC नहीं बनाया। 40 की उम्र में खाना बनाने के कारोबार की शुरुआत की। 60 के दशक में बड़ा झटका देखा और 65 की उम्र में फिर से अपना काम खड़ा करने के लिए निकल पड़े।

उनकी सफलता यह बताती है कि करियर या कारोबार में किसी एक असफलता को अंतिम परिणाम मान लेना जरूरी नहीं है।

सैंडर्स के जीवन की दूसरी बड़ी सीख थी ‘अपनी ताकत पहचानना’। उन्होंने जिंदगी में कई काम किए, लेकिन आखिरकार उन्होंने समझ लिया कि उनकी सबसे बड़ी ताकत खाना बनाना और लोगों को अच्छा भोजन खिलाना है।

तीसरी सीख थी कारोबार को बड़े स्तर तक पहुंचाने का तरीका। उन्होंने खुद हर शहर में रेस्तरां खोलने की कोशिश नहीं की। उन्होंने फ्रेंचाइजी व्यवस्था के जरिए दूसरे कारोबारियों को अपना कारोबार मॉडल अपनाने दिया।

और चौथी सीख थी ब्रांड की पहचान। सफेद सूट, दाढ़ी, बो टाई और कर्नल की कहानी सिर्फ उनका पहनावा नहीं था। यह KFC को दूसरे तले हुए चिकन बेचने वाले रेस्तरां से अलग पहचान देने वाली प्रचार रणनीति बन गई।

ये भी पढ़ें :- Piggly Wiggly Store: जब अमेरिका के एक अनोखे स्टोर ने बदल दिया दुनिया भर में खरीदारी करने का तरीका

Home » Colonel Sanders Birthday: 40 की उम्र में रोडसाइड सर्विस स्टेशन चलाने वाला व्यक्ति कैसे बना KFC का संस्थापक?
शेयर करें: Facebook X WhatsApp

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

// न्यूज़लेटर

हर सुबह सबसे पहले ख़बरें।

अपना ईमेल दर्ज करें — कोई स्पैम नहीं, सिर्फ ज़रूरी खबरें।

Exit mobile version